गठबंधन के सहारे कांग्रेस लगी किनारे

जैसा उत्सव और प्रचार है वैसी सफलता मिली है.....?

लोकसभा के आम चुनाव में कोई भी विपक्षी दल सैंकड़ा नहीं लगा पाया। कांग्रेस को 2019 में 42, 2019 में 52 सीट मिलीं थी। इन सांसदों में विपक्ष का नेता बनने की क्षमता भी प्राप्त नहीं हो सकती थी। 2024 के चुनाव में पूरी ताकत और बड़ा विपक्षी गठबंधन बनाने के बाद भी कांग्रेस 99 पर अटक गई। देश के तीन राज्यों में कांग्रेस की सरकार है। तीनों ही राज्यों में उसका प्रदर्शन निराशाजनक रहा है। हिमाचल में तो उसे एक भी लोकसभा सीट नहीं मिली। एक थी वह भी हाथ से चली गई। किसी भी राज्य में कांग्रेस ने पुरूषार्थ से चुनाव जीता हो ऐसा लग नहीं रहा है। सबसे अधिक 14 सीटें केरल में जीती है जहां गठबंधन के दलों से ही मुकाबला था। महाराष्ट्र में महाअघाड़ी की सबसे छोटा साथी होने के बाद लोकसभा चुनाव में सबसे अधिक 13 सीटें जीत कर भाजपा को कम हराया उद्धव ठाकरे को बड़ा गच्चा दे दिया। इसलिए कांग्रेस को बड़ा लाभ गठबंधन से हुआ है। उसे दक्षिण में गठबंधन के अलावा भाजपा की वहां अनुपस्थिति का लाभ मिला है। इतने समीकरण पक्ष में होने के बाद भी दशकों देश पर राज करने वाली कांग्रेस 99 सांसद ही सदन में पहुंचा पाई। दो निदर्लियों का समर्थन मिल रहा है जिससे यह संख्या बढ़ सकती है। भाजपा भी गठबंधन के साथ मैदान में तीसरी बार सरकार बनाने की मंशा से उतरी थी। वह 240 सदस्यों के साथ सबसे बड़ी पार्टी। तीसरी बार सरकार तो राजग की बनी लेकिन भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं मिल पाया। देश के राजनीतिक इतिहास में इस प्रकार की ही सही किसी भी एक नेता के नेतृत्व में तीसरी बार सरकार नहीं बनी है। राहुल गांधी को विजेता बताने का प्रयास हो रहा है? पार्टी जश्न मना रही है? मीडिया भी पूरे मनोयाेग से साथ दे रहा है। भाजपा को छोड़कर कोई भी दल दहाई को पार नहीं कर पाया। केवल छह दल ऐसे हैं जिन्हें दहाई के आंकड़े का सुख मिला है। समूचा इंडी गठबंधन मिलकर भी भाजपा के बराबर सांसद नहीं ला पाया और जश्न ऐसा मनाया जा रहा है जैसे जीत कर सरकार बनाने जा रहे हैं?

18वीं लोकसभा में भाजपा 240 सांसदों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी है। उसके साथ चुनाव पूर्व का राजग गठबंधन 293 सदस्यों के साथ सरकार बना चुका है। इसमें टीडीपी 16 और जदयू 12 सांसदों के साथ दहाई वाले दल हैं। बाकी एकल संख्या वाले दल हैं। मतलब भाजपा को 53 सांसदों की संख्या में कई दलों का समर्थन है। कांग्रेस के सांसदों की संख्या 99 है। चुनाव पूर्व बने इंडी गठबंधन के सांसदों की संख्या 232 है। इस प्रकार कांग्रेस को 133 सहयोगी सांसदों का समर्थन मिल रहा है। इसमें कांग्रेस के अलावा दहाई वाले तीन दल हैं। एक टीएमसी है जिसकी मंशा समर्थन देना तो है लेकिन साथ बैठकर नहीं बाहर से? चुनाव परिणाम के बाद कांग्रेस ने खासा शोर मचाया कि वह सरकार बनाने का दावा करने वाले हैं जबकि अन्य की संख्या मिलाने के बाद भी राजग को तोड़े बिना ऐसा संभव नहीं था जिसकी संभावना कहीं भी नहीं थी। मीडिया आज भी हर दिन ऐसी उम्मीद भरी खबरे चलाता है और राहुल-प्रियंका सरकार में आने के सपने देखने लग जाते हैं।

सवाल यह उठता है कि कांग्रेस 99 सांसद पाकर जीत जैसा जश्न क्यों मना रही है। पहला कारण यह हो सकता है कि रिवर्स गेयर में चल रही कांग्रेस दूसरे गेयर में चलने जैसी हो गई? दूसरा यह कि मोदी को तीसरी बार पूर्ण बहुमत प्राप्त करने से रोक दिया। इसमें दूसरा कारण अधिक प्रभावशाली दिख रहा है। क्योंकि कांग्रेस को प्राप्त 99 सीटों में गठबंधन का सहारा अधिक हे पुरूषार्थ कहीं भी दिखाई नहीं दिया। भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं मिलने का आधार यूपी और महाराष्ट्र में सीटों का कम हो जाना है। जबकि समूचे देश में मोदी की धूम रही है। मणिपुर के कारण ने पूर्वोत्तर में भाजपा के सांसद कम किये हैं। इसका लाभ कांग्रेस को मिला है। कांग्रेस की तीन राज्यों में सरकार है। कर्नाटक जहां मुस्लिम मतदाताओं का एकतरफा समर्थन मिलने से राज्य में सरकार तो बन गई लेकिन लोकसभा चुनाव में 28 सीटों में से भाजपा को 17, जेडीएस को दो और कांग्रेस को मिली हैं। भाजपा ने अपनी ताकत का अहसास करा दिया। हिमाचल की सभी चार सीटें भाजपा ने ही जीतीं हैं। तीसरा राज्य तेलंगाना जहां कांग्रेस की सरकार है। वहां की 17 लोकसभा सीटों में कांग्रेस भाजपा को 8-8 सीटें मिली हैं जबकि ओबैसी अपनी सीट भर जीत पाये। यहां भाजपा ने अपनी शक्ति दो गुणा की है। यही तथ्य है जो कांग्रेस की जीत को पुरूषार्थ की जीत की बजाए गठबंधन की जीत सिद्ध करता है।

कांग्रेस को दक्षिण के राज्यों में ज्यादा स्थान मिला है। वहां क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन को लाभ मिला है। दक्षिण से कांग्रेस को 44 सांसद मिले हैं। यहां गठबंधन के अलावा मित्र दलों के साथ आमना-सामना था। गठबंधन के कारण कांग्रेस को 40 सीटें मिलीं हैं। महाराष्ट्र में वह सबसे बड़ा दल होकर 13 सीटें जीतीं जबकि महाअघाड़ी में सबसे कम विधायकों वाला दल है। पंजाब और केरल में मित्र दलों के साथ लड़ाई थी। यहां भाजपा का प्रभाव नहीं हे। केरल में भाजपा में पहली बार खाता खेला है जबकि किसान आन्दोलन के प्रभाव से पंजाब में भाजपा जीत नहीं पाई। लेकिन उसे अपेक्षा से अधिक वोट मिले हैं। कई स्थानों पर तो वह दूसरे नम्बर पर रही है। महज 15 सीटें ही कांग्रेस अपने दम पर जीती हैं जिसमें राजस्थान की 8 और पूर्वोत्तर की चार सीटें शामिल हैं। एक लद्दाख है। एक गुजरात और एक गोवा के अलावा राजस्थान की 8 सीटों को ही कांग्रेस की पुरूषार्थ वाली जीत कहा जा सकता है शेष तो उपहार में मिली सीटें हैं। पूर्वोत्तर में मणिपुर का प्रभाव साफ दिखाई दिया है। कांग्रेस सहित विपक्ष को जश्न मनाने का मौका केवल यूपी में हुए चमत्कार के कारण ही मिलता है। यूपी का गणित जितनी बार भी समझने का प्रयास किया जायेगा वहां देशी विदेशी समीकरण ही सामने आयेंगे? इन समीकरणों का आधार नरेन्द्र मोदी की लोकसभा सीट वाराणसी है। 2019 से 2024 के बीच जहां 2 लाख 13 हजार वोट बढ़े हैं इसके बाद भी मोदी को 2024 में मिले वोटों में 2019 की तुलना में 61 हजार 694 वोट कम मिले हैं। यह किसी योजना या साजिश के बिना संभव नहीं हो सकता कि प्रधानमंत्री को पिछले चुनाव से भी कम वोट मिलें?

यूपी के चुनावी समीकरण में अखिलेश अधिक प्रभावी फैक्टर रहे हैं। उनका समाज यादव और मुसलमान वोट हर सीट पर फैविकोल से चिपके हैं। प्रत्याशी के वोटों ने इसमें शक्ति का संचय किया। आरक्षण खत्म करने और बाबा साहब का संविधान खत्म करने जैसी अफवाहों ने दलित वोटों में भी सेंधमारी की है। इसलिए भाजपा 33 पर आकर अटक गई औा सपा अप्रत्याशित रूप से 37 पर आ गई। इसी समीकरण से कांग्रेस को 6 सीटों की झूठन मिल गई। इस एमवाय समीकरण को एकत्र करने के लिए सीमापार से संदेश आने की चर्चा है। इसका प्रमाण यही है कि मोदी के शपथ ग्रहण के समय आतंकी हमला हुआ। वह भी धार्मिक यात्रियों वाली बस में। इस प्रकार का आतंकी प्रमाण अमरनाथ यात्रा का तो रहा है लेकिन वैष्णों देवी जाने वालों पर पहली बार ऐसा हुआ है। इसका राजनीतिक मतलब यही है कि देश के हिन्दू मतदाताओं का एक साथ आने वाला का विरोध सीमापार से हुआ और मतदान के रूप में विरोध यूपी में हुआ। मुस्लिम मतदाता के साथ एक साथ वोट डालने का समीकरण बंगाल में भी भाजपा के समीकरणों को ध्वस्त कर गया। चुनाव प्रचार के बीच में मोदी को वोट जिहाद का उल्लेख अपने भाषणों में करना ही पड़ा था।

कांग्रेस के रणनीतिकार राहुल गांधी को विजेता सिद्ध करने का अभियान चलाये हुए हैं जबकि चुनाव के परिणामों का विश्लेषण कांग्रेस के बारे में अभी भी यही प्रमाणित करता है कि वह बैसाखियों के सहारे 99 पर पहुंची है। पटना की बैठक के बाद जैसे इंडी गठबंधन पर कब्जा किया था यदि ऐसा नहीं करते तो इस चुनाव में भी कांग्रेस नेता प्रतिपक्ष के विहिन ही रहती। पार्टी के रूप में और नेतृत्व के रूप में जितनी सीटें मिली हैं उस प्रकार का कोई आकर्षण मतदाता में कांग्रेस का नहीं है। भाजपा की जीत तो हुई है लेकिन बहुमत से दूर होने का सबसे बड़ा कारण यह है कि मोदी पर केन्द्रीत हो जाना और उसके लिए कार्यकर्ता और क्षेत्रीय नेताओं का समर्थन न मिल पाना है। अन्यथा इस बार जितना जश्न कांग्रेस मना रही है वह अवसर नहीं मिलता? संवाद इंडिया
(लेखक हिंदी पत्रकारिता फाउंडेशन के चेयरमैन हैं)

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