असत्य को स्थापित करना नेताओं का कौशल तब… केजरीवाल ऐसे में छाप छोड़ पाएंगे?

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की अपनी राजनीतिक शैली है। यह शैली अन्य नेताओं से जुदा है। अन्ना आन्दोलन के यज्ञ से जिस राजनीतिक पार्टी उदभव हुआ था उसकी सोच भी अलग थी और शैली भी अलग थी। लेकिन केजरीवाल ने उसे अपने हिसाब से तैयार कर लिया।

सुरेश शर्मा। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की अपनी राजनीतिक शैली है। यह शैली अन्य नेताओं से जुदा है। अन्ना आन्दोलन के यज्ञ से जिस राजनीतिक पार्टी उदभव हुआ था उसकी सोच भी अलग थी और शैली भी अलग थी। लेकिन केजरीवाल ने उसे अपने हिसाब से तैयार कर लिया। आम आदमी पार्टी ने दिल्ली और पंजाब से कांग्रेस की सरकारों को उखाड़ा तब यह संदेश चला गया कि कांग्रेस का नैतिक पतन होने की स्थिति में आप उसका स्थान ले लेगी। लेकिन वह भाजपा का विकल्प बनने की स्थिति की प्रतीक्षा कर रही है। विधानसभा में खुद केजरीवाल ने ऐसा ही सपना देखा कि वह 2029 में भाजपा का विकल्प बन जायेंगे। इस असंभव को संभव कैसे बनाया जायेगा यह केजरीवाल के मन में ही समाया हुआ है और धीरे-धीरे इसे क्रियान्तिव करने की दिशा में वे बढ़ेंगे? भाजपा के पास विजन है। उसके पास कार्यकर्ता हैं और इससे खास बात यह है कि मोदी जैसा नेतृत्व है जिसको देश का जनमानस स्वीकारता भी है और उसकी बात को मानता भी है। ऐसे में केजरीवाल मोदी का विकल्प बनने की दिशा में जिस विचार का सहारा ले रहे हैं वह असत्य को स्थापित करने जैसा है। मोदी के विचारों में स्पष्ट दिशा और विश्वास रहता है जबकि केजरीवाल के विचारों में गंभीर कुटिलता ढलकती है। वे उसे छुपा नहीं पाते हैं। हर बार उसी कुटिलता का प्रयोग करते हैं और जनमानास की समझ में आ जाता है कि यह वाली कुटिलता धूर्तता तक पहंच रही है। अगला प्रयोग फिर वैसा ही होता है। ऐसे में भाजपा का और मोदी का विकल्प बनने की संभावना दिखाई नहीं दे रही है।

अरविंद केजरीवाल का दिल्ली के उप राज्यपाल से हर समय पंगा रहा है। इस लिए निर्वाचन के बाद विधानसभा का सत्र आहुत करने के लिए जो अधिसूचना जारी होती है उसे वे पांच साल तक जिंदा रखते हैं। देश के किसी भी राज्य की विधानसभा प्रत्येक सत्र के बाद अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दी जाती है। अगली बार के लिए नई अधिसूचना जारी होती है। विधानसभा सचिवालय सरकार की सलाह पर राज्यपाल को आग्रह करती है और सत्र बुला लिया जाता है। अभी तक ऐसा कोई इतिहास नहीं है कि किसी भी राज्यपाल ने सत्र बुलाने के लिए इंकार किया हो। हां विशेष सत्र के लिए वह कई बार देर कर देता है। लेकिन सत्र तो आहुत होता ही है। लेकिन अपने हर कार्यकाल में केजरीवाल ने दोबारा सत्र आहुत करने की स्थिति ही नहीं बनाई। जब इच्छा होती है और केन्द्र सरकार को गरियाना होता है तब सत्र बुलाया और जो कहना है कह देते हैं। केन्द्रीय मीडिया उसे प्रसारित भी करता है। इस घटनाक्रम से यह प्रमाणित होता है कि केजरीवाल को व्यवस्था पर भरोसा नहीं है या उप राज्यपाल के साथ उनका टकराव इतना अधिक है कि वे सत्र बुलाने के समय में उनकी मदद नहीं करने वाले हैं। इसलिए पहला ऐसा संदेश है जो कुटिलता को प्रमाणित करता है। उप राज्यपाल निर्धारित सत्रों को आहुत करने से इंकार नहीं सकता है लेकिन केजरीवाल सत्र का उपयोग राजनीतिक कृत्यों के लिए करते हैं इसलिए उन्हें सत्र का अवसान नहीं करने में बेहतरी दिखाई देती है।

सदन में बोली गई कोई भी बात मानहानि की क्षेणी में नहीं आती है। केजरीवाल अपने आरोपों के कारण मानहानि के मामलों में लगातार फंसते रहे हैं। आम आदमी पार्टी के गठन के समय कितने एनजीओ वाले एक साथ आये थे। उनका अपना नाम था और अपने-अपने क्षेत्र में वे प्रभुता भी रखते थे। दिल्ली की सरकार पाने के बाद केजरीवाल ने सबको अपने साथ से जुदा करना शुरू किया। प्रशान्त भूषण बड़े वकील आप में थे, योगेन्द्र यादव चुनावी गणित के माहिर उनके साथ थे, लोकप्रिय कवि कुमार विश्वास उनके साथ अब हर आयोजन में केजरीवाल को कोसते हैं। ऐसे अनेकों नाम हैं जिनकी चर्चा की जा सकती है। केवल मनीष सिसोदिया को छोड़कर पुराने लगभग नाम चले गये। मनीष को आखिरकार जेल हो गई और वे भी पटल से औझल होते जा रहे हैं। सभी साथियों को एक के बाद एक करके साथ से जाने देना भी राजनीतिक कुटिलता जैसा प्रतीत होता है। कोई भी राजनीतिक दल अपने विस्तार के लिए हर राज्यों में प्रभावशाली नाम साथ लेता है जबकि केजरीवाल मोदी की तरह अपने नाम से चुनाव जीतना चाहते हैं। पंजाब में उन्हें यह सफलता मिली भी। नरेन्द्र मोदी अपने व्यक्तित्व में किसी भी प्रभावशाली व्यक्ति को समाहित कर लेते हैं लेकिन केजरीवाल में यह गुण भी नहीं है और क्षमता भी नहीं है। आप के नेताओं को ईमानदारी का प्रतीक बताने का प्रयास हुआ। केजरीवाल के कथनों पर देश ने भरोसा किया। केजरीवाल और मोदी का एक साथ देश की राजनीति में आना हुआ था। नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री से देश के प्रधानमंत्री के लिए आये और केजरीवाल आन्दोलन से दिल्ली से राजनीति शुरू करने वाले थे। उस समय देश में बन रहे वातावरण में यह तय किया गया था कि देश के लिए मोदी और दिल्ली के लिए केजरीवाल का प्रचार किया जाये। जिन शक्तियों का प्रभाव बन गया था उनके समझौते को केजरीवाल ने पहले दिन ही भंग कर दिया था और बनारस से मोदी के सामने चुनाव लड़ लिये थे। जनता ने मुगालते सुधार दिये, उस चुनाव में केजरीवाल को पता चल गया कि मोदी का मतलब क्या होता है?

तभी से मन में बैठा विचार केजरीवाल को असंयमित करता गया और मोदी को विश्व में स्थान मिल गया और केजरीवाल का इंमानदारी का तगमा ही छिनता गया। भ्रष्टाचार के आरोप में नेताओं को एक के बाद दूसरे को जेल होती जा रही है। मनीष सिसोदिया, संजय सिंह के बाद निशाने पर खुद केजरीवाल आ चुके हैं। जिस शातिर दिमाग से बचने का प्रयाय किया जा रहा है वह आम व्यक्ति की समझ में आ रहा है। किस प्रकार के आर कितने हथकंडे अपनाये जा रहे हैं कोई आम व्यक्ति तो समझ ही नहीं पा रहा है। वह दिन कौन भूल सकता है जब केजरीवाल को जेल भेजा गया था और जनमानस ने हंगामा कर दिया था। उन्हें छोडऩा पड़ा था। वह आत्मविश्वास आज क्यों नहीं है? कारण यह है कि केजरीवाल का वह रूप सामने आ गया जिसकी आड़ लेकर वे राजनीति में आये थे। जिस दिन व समय ईडी नहीं न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने का आदेश था उसी समय विश्वास प्रस्ताव का आयोजन किया गया। जिस सदन में विपक्ष के मात्र पांच-दस सदस्य हों वहां केवल कुछ विषयों को सामने लाने के अलावा अविश्वास प्रस्ताव का कोई औचित्य नहीं होता है। ऐसे में विश्वास का मत रखना केवल परिस्थितियों को टालने के अलावा कोई और कारण नहीं हो सकता। वह न्यायालय के सामने पेश होने से डरना मात्र है। न्यायालय को उन कारणों को बताया जा सकता है जिनके कारण वे ईडी के सामने पेश होना चाहते हैं। लेकिन ऐसा कुछ नहीं है केवल आरोपों का सामना करने से बचना एक मकसद मात्र है। सवाल यह उठता है कि क्या इस प्रकार की कुटिल धारा से मोदी का मुकाबला किया जा सकता है? अन्ना आन्दोलन का मकसद भ्रष्टाचार को खत्म करना था। उसके आरोपियों को जेल में डालना था। मोदी आज उसी विचार को आगे बढ़ा रहे हैं तब साथ देने की बजाए बचने के लिए कुटिलता का सहारा लेना क्या केजरीवाल का मोदी से मुकाबला करना साध्य बन पायेगा?

यह सच है कि केजरीवाल ने आप के माध्यम से कांग्रेस की कमजोरी का विकल्प बनना शुरू कर दिया है। जिस चमक और धमक के साथ यह प्रयास शुरू किया था वह धीरे-धीरे कम होती गई है। कांग्रेस का नेतृत्व कमजोर, अनुभवहीन और हल्के स्तर पर आ चुका है। ऐसे में केजरीवाल को मदद मिल सकती है। लेकिन वही स्तर यदि आप नेतृत्व का हो जायेगा तब जनता के सामने नया विकल्प आयेगा। मोदी का मुकाबला करने के लिए किसी और को भी मोदी ही बनना होगा। मोदी जैसा विजन, विजन को क्रियान्वयन की क्षमता और हिम्मत। सभी दिशाओं में बराबर दृष्टि और दृष्टि में तीखा प्रतिकार करने की क्षमता। अचूक निशाना और निशाने में किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं होना। भारत का सर्वोपरी होना जिसमें संस्कृति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा सभी का समावेश होना चाहिए। तब कोई मोदी जैसा दिखाई दे सकता है। कुटिलता से साथियों को दूर करने्र उद्योगपतियों को राज्यसभा में भेजने का खेला करने के साथ भ्रष्टाचार से बचने के लिए हल्के रास्ते अपनना और मोदी को विधानसभा के भीतर अधिकारों का लाभ लेकर गालियां निकाल कर आत्म सन्तुष्टि पा लेने का भाव मोदी से मुकाबला नहीं करवा सकता है। एक स्पष्ट नीति और विजन की जरूरत सबसे जरूरी है। (लेखक हिंदी पत्रकारिता फाउंडेशन के चेयरमैन हैं) संवाद इंडिया

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