‘आन्दोलन’ कोई भी हो आन्दोलनजीवी कर लेते हैं ‘शिकार’

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किसान आन्दोलन के समय संसद में कहा था कि आन्दोलनजीवी लोग किसी भी आन्दोलन में बिल बुलाये मेहमान की भांति घुस आते हैं और आन्दोलन हाईजैक हो जाता है।

(सुरेश शर्मा), भोपाल। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किसान आन्दोलन के समय संसद में कहा था कि आन्दोलनजीवी लोग किसी भी आन्दोलन में बिल बुलाये मेहमान की भांति घुस आते हैं और आन्दोलन हाईजैक हो जाता है। यही बात इन दिनों दिल्ली में पहलवानों के आन्दोलन में हो रही है। यह आन्दोलन भी आन्दोलजीवियों का शिकार हो रहा है। नेतागण राजनीति करने चले आते हैं और सहानुभूति राजनीतिक बदले की भावना से ग्रस्त हो जाती है। राहुल की बजाए अब प्रियंका वाड्रा समर्थन देने पहुंची तब उनके निज सचिव को लेकर विवाद हो गया। उसी पर पुराने मामले उछल गये। सत्यपाल मलिक के पहुंचे पर राजपूत समाज ने बृजभूषण सिंह का समर्थन करना शुरू कर दिया। मामला जातिवादी हो गया। तथ्य पीछे रह गये और राजनीति आगे आ गई। कट्टर ईमान केजरीवाल भी धरने को समर्थन देने पहुंच गये। इस प्रकार यह पहलवानों वाला आन्दोलन भी किसान आन्दोलन की भांति होता चला जा रहा है। उस समय जाट नेता टिकैत के आंसू काम आ गये थे अब खिलाडिय़ों के आंसू तो रूक ही नहीं रहे हैं। पहले आंसुओं में सदभावना की अपील थी इसलिए देश को सच समझने की जरूरत ही नहीं थी। समर्थन खिलाडिय़ों के प्रति दिया जा रहा था। लेकिन जब से आन्दोलनजीवियों ने इसमें नरेन्द्र मोदी को गालियां देना शुरू की हैं आन्दोलन के आंसुओं की सूरत बदल रही है।

ऐसा क्यों होता है जब भी देश में किसी बात का विरोध होता है? किसी घटना के प्रति आक्रोश होता है? कुछ समय बाद गालियां प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को निकालना शुरू कर दी जाती हैं। सीएए, किसान आन्दोलन से लगाकर पहलवानों के आन्दोलन तक आते-आते ही यही सब दिखाई दे रहा है। एक प्रकार के लोग आते हैं, राजनीतिक दलों का एक जैसा चेहरा होता है, जिनकी राजनीतिक दुकानें बंद हो गई वे अधिक मुखरता के साथ सामने आते हैं और तस्वीर का असल चेहरा सामने आ जाता है। यौन शोषण का मामला अब राजनीतिक शोषण का शिकार हो चला है। विवाद बृजभूषण सिंह के व्यवहार और स्थापित खिलाड़ी परिवार के बीच का था। लेकिन अब वह केन्द्र सरकार बनाम असन्तुष्टों के बीच होता जा रहा है। यह किसी भी आन्दोलन को परिणाम तक नहीं पहुंचने देता है। विषय बदल कर दो पक्ष हो जाते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने जब आदेश दे दिया है तब प्रधानमंत्री के बारे में अपशब्दों का इस्तेमाल का मतलब समझना होगा। यह विशुद्ध राजनीतिक बदले की भावना से प्रयोग होने वाले शब्द हैं।

मोदी काल में देश ने अपनी नई दिशा तय की है। कुछ लोगों को यह लाइन नहीं सुहाती है। इसलिए वे हर बात और घटना के लिए मोदी पर निशान साधते हैं। अभिव्यक्ति का उपयोग करते हैं लेकिन देश समझता है कि आखिर यह पीड़ा क्यों है? मोदी ने खुद ही कह दिया है कि भ्रष्टाचार पर लगाम कसने के बाद गालियां तो मिलेगी यह पता था। लेकिन पहलवानों का आन्दोलन भी आन्दोलनजीवियों की पहुंच में आयेगा और विरोधी नेता समर्थन के नाम पर मंच का उपयोग करेंगे यह तो लगता नहीं था। लेकिन हो गया। यही कारण है कि आरोप पर न बोलने वाला कुश्ती संघ का अध्यक्ष भी ऐसे सवाल खडा गया कि आन्दोलन की हवा ही निकल गई?

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