‘गारंटी’ देने वालों की आखिर क्या है ‘गारंटी’?

बड़ा सवाल यह है कि देश की राजनैतिक पार्टियां जिस प्रकार के वादे करती हैं तब उन वादों के पूरा होने गारंटी क्या है? चुनाव घोषणा पत्र के वादे कितने पूरे किये गये? विचारधारा के आधार पर कितने वादे किये गये थे उनमें से कितने पूरे किये गये?

सुरेश शर्मा, भोपाल। बड़ा सवाल यह है कि देश की राजनैतिक पार्टियां जिस प्रकार के वादे करती हैं तब उन वादों के पूरा होने गारंटी क्या है? चुनाव घोषणा पत्र के वादे कितने पूरे किये गये? विचारधारा के आधार पर कितने वादे किये गये थे उनमें से कितने पूरे किये गये? इसका आंकलन कौन करता है? वादों के पूरा होने के प्रतिशत को आंकने का पैमाना क्या है? यही कारण है कि राजनीतिक दलाें और उनके नेताओं द्वारा किये जाने वादों पर भरोसा कम ही है। यह जुमला प्रचलन में आया कि यह तो चुनावी वादे हैं कर लिए गये हैं इनके पूरा होने की कोई गारंटी नहीं है? तब से विश्वास की स्थिति कमजोर होने लग गई। अब तो कोई इस बात पर ही भरोसा नहीं करता कि चुनाव के समय कही बात को पूरा भी किया जायेगा। इसलिए यह जरूरी है कि चुनाव आयोग इस बारे में कुछ विचार करे? कोई ऐसा मैकेनिज्म तैयार करे जो राजनीतिक पार्टियों और उनके नेताओं द्वारा समय के हिसाब से जितने वादे या भरोसा दिलाया जाते हैं उनके बारे में संज्ञान लें। उनके बारे में यह तय किया जाये कि उनके सत्ता में आने पर कितने वादों को पूरा किया गया। विधानसभा में आश्वासन समिति का प्रावधान होता है वह सरकार द्वारा किये गये वादों का रिकार्ड रखती है और उन्हें देखती भी है।

चुनाव से पहले राजनीतिक दलों के अपने घोषणा पत्र आते हैं। वे रिकार्ड के रूप में चुनाव आयोग को दिये जाते हैं। आम जनता या मीडिया के पास भी रिकार्ड के रूप में उपलब्ध होते हैं। समय-समय पर चुनाव की सभाओं में स्थानीय स्तर पर भी वादे किये जाते हैं। उनकी एक सूची तैयार करने के लिए कोई न कोई व्यवस्था की जाना चाहिए। सरकार में आने वाले दल से पूछा जाना चाहिए कि वह उनके पूरे करने के प्रतिशत की जानकारी आयोग को सौंपे? जिन राजनीतिक दलों ने सरकार में आने से पहले बड़े-बड़े वादे किये लेकिन उसके बाद भी सरकार में नहीं आये। उन दलों से भी यह पूछा जाना चाहिए कि आपके द्वारा किये गये इन वादों को पूरा करने का तरीका क्या है? कैसे पूरा करते यदि सरकार में आ जाते तो? इस प्रकार के सवालों से राजनीतिक दलों पर अनावश्यक वादे करने की परम्परा पर रोक लगेगी। वे ही वादे किये जा सकेंगे जिनको पूरा किया जा सकता है। एमएसपी पर कानून बनाने का वादा ऐसा ही वादा है जब भी कोई दल सरकार में आता है उसे पूरा करने की स्थिति में नहीं होता और विपक्ष में होता है?

आर्थिक पक्ष का समायोजन करके किये जाने वाले वादों का आिखर क्या परिणाम होता है? उसके बारे में भी सवाल पूछने की व्यवस्था होना चाहिए। यही कारण है कि आज गारंटी पर बहस हो रही है। दलों के नेता कह रहे हैं कि यह गारंटी के पूरा होने की गारंटी है। मतलब ही साफ है कि गारंटी पर भरोसा घट गया उस पर भरोसा करने के िलए यह सब कहा जा रहा है। इस भरोसे के घटने का आधार ही यही है कि वादे किये गये लेकिन पूरे करने की जरूरत नहीं समझी गई। अब वादों की कितनी गांरटी है इसका मूल्यांकन की व्यवस्था होना चाहिए।

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