लोकसभा चुनाव परिणाम में विपक्ष हुआ ताकतवर…समझना होगा विरोध और शत्रुता का फर्क

लोकतंत्र की यही खूबसूरती है कि सत्ता का हस्तान्तरण हो जाता है लेकिन खून खराबा नहीं होता? एक समूह जीत जाता है और दूसरा पराजित लेकिन जीतने वाला अंधा नहीं होता और हारने वाले को भी अपने दायित्वों को बोध होता है। जनादेश के साथ ही यह भी तय हो जाता है कि किस दल और किस समूह को िकस प्रकार आ आदेश जनता ने दिया है। वह उसी प्रकार की भूमिका में आ जाता हे।

सुरेश शर्मा। लोकतंत्र की यही खूबसूरती है कि सत्ता का हस्तान्तरण हो जाता है लेकिन खून खराबा नहीं होता? एक समूह जीत जाता है और दूसरा पराजित लेकिन जीतने वाला अंधा नहीं होता और हारने वाले को भी अपने दायित्वों को बोध होता है। जनादेश के साथ ही यह भी तय हो जाता है कि किस दल और किस समूह को िकस प्रकार आ आदेश जनता ने दिया है। वह उसी प्रकार की भूमिका में आ जाता हे। लेकिन सभी समूहों का मकसद देश की प्रगति करना है। लोकतंत्र में सदन में सभी का आमना सामना होता है और अपने विचार और देश का विकास करने के तौर तरीकों पर बहस होती है। यहां सरकार का उत्तरदायित्य भी तय है कि उसे प्रतिपक्ष की भावना को भी महत्व देना होता है। जब इस भावना को क्षरण होता है तब विरोध की भावना प्रबल होती है। विपक्ष इसलिए विकास में अपनी भागीदारी दिखाना चाहता है क्योंकि उसे अगले पांच साल बाद फिर से जनादेश लेने जाना है तो वह भी अपनी बात जनता को की पाये? लेकिन लोकतंत्र के परिचालन में आ रही गिरावट के कारण िवरोध कठोर विरोध में बदल रहा है और कई बार लगता है कि शत्रुता के करीब भी पहुंच रहा है। जब विपक्षी दलों के सांसदों की संख्या ठीक ठाक हो तब िवरोध में दबाव का मिश्रण हो जाता है जिससे सरकार को सन्तुलन बनाने में परेशानी आती है। 18वीं लोकसभा के परिणाम कुछ इसी प्रकार का संदेश देते हुए दिख रहे हैं। फिर भी विरोध को प्रखर विरोध में बदलने का अधिकार तो विपक्ष को मिलता है लेकिन विरोध को शत्रुता के रेखा से पार कराने का अधिकार नहीं मिल पाता। यहां आकर लोकतंत्र अपनी मर्यादा का हनन देखता है। सलाह यही है कि इससे बचने की कौशिश करना चाहिए।

लोकसभा चुनाव के प्रचार के समय जितना भ्रम और झूठ फैलाया गया उसके बारे में कई बार लिखा जा चुका है। ऐसा नहीं है कि यह अकेले विपक्ष ने ही किया है? सत्तापक्ष को यह अति विश्वास था कि उसकी पूर्ण बहुमत से सरकार बन रही है तब उसने भी सीमाओं को लांधा है? विपक्ष ने भी। विपक्ष तो इस रेखा को कई बार पार किया है। उसके पास इसी प्रकार का विकल्प रहता है कि वह जनता की आंखों पर चढ़े पक्ष के चश्में को उतारकर नया कुछ देखने के लिए आकर्षित करे। ऐसा उसने किया लेकिन इसमें वह सब भी हो गया जिसका खामियाजा देश लम्बे समय तक भुगतने वाला है। इससे विपक्षी दलों को एक फायदा हुआ कि नरेन्द्र मोदी तीसरी बार बहुमत की सरकार बनाने में कामयाब नहीं हो पाये। अपितु गठबंधन की सरकार बनाई। यह सरकार किसी भी गठबंधन सरकार से अिधक ताकतवर है। लेकिन विपक्षी गठबंधन कमजोर नहीं है। तीन चुनाव के बाद विधिवत विपक्ष का नेता सदन को मिलने वाला है।

चुनाव परिणाम के बाद यह वातावरण बनाने का प्रयास किया गया कि सरकार बनने की समस्या आयेगी? लेकिन कोई समस्या नहीं आई। मंत्री बनने में समस्या आयेगी? लेकिन वह भी नहीं आई। विभागों का बंटवारा करने में भाजपा सन्तुलन नहीं बना पायेगी? लेिकन वह सन्तुलन भी बन गया। इस प्रकार की भ्रमपूर्ण राजनीति से सरकार को कोई अन्तर नहीं पड़ रहा है लेकिन देश का मतदाता कन्फयूज हो रहा है। वह अपने द्वारा दिये जनादेश को लेकर भी भ्रमित है। ताकतवर विपक्ष सरकार के काम को नियंत्रित करे यह जनादेश में अन्तर्निहित है लेकिन सरकार को चलने ही न दे और विरोध नीतियों की बताए व्यक्तिगत हो जाये तब लोकतंत्र की भावनाओं का प्रभावित करेगा। लेकिन विपक्ष यह भी कह सकता है कि जब विपक्ष कमजोर था तब उनके नेताओं को भ्रष्टाचार के मामले में ईडी से प्रताड़ित करवाकर जो राह दिखाई थी उसी राह पर विपक्ष्ाी दल चल रहे हैं? तब सरकार के पास बचाव को एक ही रास्ता होगा कि भ्रष्टाचार पर सरकार की नीति जीरो टालरेंस की है। अब विपक्ष ने आक्रामक रूख अपनाया है। यह समय की जरूरत है लेकिन इसके लिए उतनी ही प्रमाणिकता की जरूरत है। विपक्ष ने कुछ मामले पिछले दिनों उठाये हैं। यदि उन मामलों को ही ले लें तब यही संदेश जाता है कि विपक्ष और विशेष कर कांग्रेस जल्दबाजी में है। उसे तथ्यों को संभालने और परखने की और जरूरत है।

शेयर बाजार को नुकसान पहुंचाने वाले सवाल को कहीं भी भाव नहीं मिला। न तो शेयर बाजार ने उसे गंभीरता से लिया और न ही निवेशकों ने। नीट मामले में सरकार सर्वोच्च न्यायालय और आन्दोलन दो पाटों के बीच में फंसी हुई है। जिस प्रकार से तथ्य उसके सामने आ रहे हैं वह उस पर कार्यवाही करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय की तरफ देख रही हे। इसमें सरकार को कटघरे में खड़ा करना सर्वोच्च न्यायालय को भी साथ में लपेटना हो जायेगा? हालांकि सरकार ने जिस प्रकार की सख्ती अभी दिखाई है उसे वह पहले दिन से दिखा सकती थी। यिद न्यायालय में जाने वाले थोड़ा रहम करते? आज कल न्यायालय के माध्यम से सरकार चलाने का चलन बढ़ रहा है। इसमें न्यायालय को भी मजा आता है? वह सरकार को काम करने देने से पहले ही अपने फरमान जारी कर देता है? इसलिए सर्वोच्च न्यायालय को भी सरकार को कुछ करने देने से पहले की किसी याचिका पर इतना सक्रिय नहीं होना चाहिए।

लोकसभा का सत्र शुरू हो रहा है। यह सभी को पता है कि लोकसभा अध्यक्ष के चुनाव में आजादी से आज तक चली आ रही निर्विरोध निर्वाचन की परम्परा को भंग किया जा सकता है? विपक्ष दबाव बना रहा है कि उपाध्यक्ष का पद उसे मिलना चाहिए। ऐसी परम्परा भी रही है। लेकिन इस समय दो गठबंधन हैं जिसमें एक सरकार में है और दूसरा विपक्ष में। सरकार इसमें राजनीति कर जाती है कि वह अपने ही सहयोगी दल को उपाध्यक्ष दे देती है और यह प्रचारित भी हो जाता है कि सत्तधरी दल ने विपक्ष को उपाध्यक्ष दिया है। अब विपक्षी गठबंधन का दबाव है और वह दबाव बनाने की स्थिति में है तब सरकार की ओर से नया फार्मूला निकाला जा रहा है। विपक्षी गठबंधन में शामिल गैर कांग्रेसी दल को यह पद दिया जा सकता है? इससे कांग्रेस और भड़की हुई है। राजनीति इस कदर हो गई है कि उसने प्रेटेम स्पीकर मामले में ही विवाद खड़ा कर दिया है। विरोध के रूप में उनकी गठबंधन के सदस्य सहयोग नहीं करेंगे? प्रोटेम स्पीकर के साथ विभिन्न दलों के पांच सांसदों को सभापति तालिका में रखा गया है, वे सभी प्रोटेम स्पीकर की मदद करेंगे। विपक्ष ने इस मदद के लिए इंकार कर दिया है। इस प्रकार के विरोध या असहयोग का जनता में कोई बड़ा संदेश जाता है? अनेकाें अवसरों पर यह लगता है कि यह विरोध न होकर खीज है, जो सदन में निर्वाचित होने वालों की गंभीरता पर सवाल उठाती है? यहां सरकार के तर्क को नकारा नहीं जा सकता है। विपक्ष जिस केरल के सांसद कोडिकुन्निल सुरेश को प्रोटेम स्पीकर बनाये जाने का तर्क दे रहा है सरकार कह रही है कि वे आठ बार के सांसद तो हैं लेकिन दाे बार वे पराजित हो गये थे जबकि भृतहरि महताब लगातार सात बार के सांसद हैं।

इसमें हुई राजनीति में समझने वाली बात यह है कि प्रोटेम स्पीकर का काम केवल नव निर्वाचित सांसदों शपथ दिलाना भर नहीं है। इस बार लोकसभा स्पीकर का चुनाव कराना भी मुख्य दायित्व है। पूरा चुनाव झूठ और फरेब की राजनीति पर आधारित रहा है। एक दूसरे पर भरोसा कम हुआ है।आरोप तो यहां तक आ रहे हैं कि चुनाव को विदेशी शक्ितयों ने प्रभावित करने का प्रयास किया है। ऐसे में स्पीकर के चुनाव में विरोधी पक्ष का प्रोटेम स्पीकर कोई भी स्थिति निर्मित कर सकता है। यह अविश्वास आपस में ठीक नहीं हे। सदन में मर्यादा और परम्पराओं को बड़ा स्थान है। अब भाजपा ने कह दिया कि जिसे सांसद कोडिकुन्निल सुरेश को कांग्रेस प्रोटेम स्पीकर बनवाना चाहती है वह उन्हें नेता प्रतिपक्ष बनाये? तब दलित की भावना समझ में आयेगी? अब भारत की राजनीति की राजनीति विरोध और एक्सपोज से आगे निकल कर शत्रुता तक पहुंचती हुई दिखाई दे रही है। तीसरी बार बनी मोदी सरकार अपने मिशन को पूरा करने के िलए जब कोई भी प्रस्ताव लायेगी तब देखने में आयेगा कि यह विरोध शत्रुता तक कितने कदम बढ़ रहा है। हालांकि यह न तो लोकतंत्र के लिए अच्छे संकेत हैं और न ही भारत विकास गाथा के लिए?

संवाद इंडिया (लेखक हिंदी पत्रकारिता फाउंडेशन के चेयरमैन हैं)

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