‘राहुल’ की सजा बरकरार रखने के दो बड़े ‘मायने’

मोदी समाज के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करके राहुल गांधी इस समय कानूनी पेचीदगियों में फंसे हुए हैं। गुजरात उच्च न्यायालय ने उनको दी गई दो साल की सजा को बरकरार रखा है। साथ में गंभीर टिप्पणियां भी की हैं। अब मामला सर्वोच्च न्यायालय का रूख करेगा। यह हो सकता है कि सर्वोच्च न्यायालय कोई अलग भी निर्णय दे दे और यह भी हो सकता है कि दो न्यायालयों की अपराध के प्रति भावना और कानून से आये निर्णयों को अपनी सहमति दे

सुरेश शर्मा, भोपाल। मोदी समाज के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करके राहुल गांधी इस समय कानूनी पेचीदगियों में फंसे हुए हैं। गुजरात उच्च न्यायालय ने उनको दी गई दो साल की सजा को बरकरार रखा है। साथ में गंभीर टिप्पणियां भी की हैं। अब मामला सर्वोच्च न्यायालय का रूख करेगा। यह हो सकता है कि सर्वोच्च न्यायालय कोई अलग भी निर्णय दे दे और यह भी हो सकता है कि दो न्यायालयों की अपराध के प्रति भावना और कानून से आये निर्णयों को अपनी सहमति दे। फिर भी इस मामले में गुजरात उच्च न्यायालय के आदेश के बाद फिर से समीक्षा करनी चाहिए। पहली बात तो कानून की है। कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति या समुदाय के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करता है तो उसे सजा दी जाना चाहिए। जब अपमानजनक टिप्पणी करने वाला व्यक्ति किसी जिम्मेदारी के पद पर हो और प्रभावशाली व्यक्ति हो तब अपराध की प्रवृत्ति बदल जाती है और वह अधिक गंभीर हो जाती है। इसलिए कांग्रेस जैसे विशाल संगठन का अध्यक्ष रह चुका व्यक्ति इस प्रकार का अपराध करता है तब वे स्वभाविक रूप से अधिक गंभीर हो जाता हैं। यदि भावनाओं के आधार पर विषय को देखते हैं तब समाज की भावनाएं आहत होंगी यह तो स्वभाविक बात है लेकिन इससे राजनीति के स्वभाव भी प्रभावित हो जाता है। इसलिए गुजरात उच्च न्यायालय का आदेश खुद में गंभीर हो जाता है।

आम जनता हो या फिर देश की न्याय व्यवस्था सभी इस बात से परेशान है कि 2014 में नरेन्द्र मोदी की सरकार बनने के बाद से राजनीति में भाषा की गिरावट आई है। यह कहा जा सकता है कि यह गिरावट सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों में समानरूप से या कुछ अन्तर के साथ आई है, लेकिन आई जरूर है। जनता वोट के आधार पर उसे सुधारने का प्रयास करती है और उसने लगातार दो बार स्पष्ट बहुमत की सरकार देकर नेताओं को अपना संदेश दे दिया है। लेकिन नेताओं की भाषा में जनादेश और जनता की अदालत से आये निर्णय का कोई असर नहीं हुआ। इसके बाद अदालत का नम्बर आया है। देश के प्रमुख नेताओं में से एक राहुल गांधी ने मोदी समाज को लेकर अभद्र और गैर जरूरी टिप्पणी की। चूंकि यह नरेन्द्र मोदी का अपमान करने की अगली कड़ी थी इसलिए इसका गंभीर होना स्वभविक था। चौकीदार चोर है, राफेल में भ्रष्टाचार की कहानी, लाखों का सूट सहित ऐसे मामले हैं जो गैर राजनीतिक हैं या गैर राजनीतिक को राजनीतिक दिखाने का प्रयास किया गया। जब मोदी सारे मोदी चोर हैं कहा गया तो समाज ने इसे लपक लिया। इसे छोड़ा भी जा सकता था और पहले की अपमानजनक टिप्पणियों की भांति वह भी समय के साथ अदृश्य हो जाता। लेकिन कहीं तो रोकना भी जरूरी था?

अब न्यायालय की भूमिका शुरू हुई। मामला कर्नाटक में हुआ लेकिन चला गुजरात में। यह कानूनी अड़चन नहीं है। अब सजा का सिलसिला और राजनीतिक बनाने का प्रसंग एक साथ चलता रहा। कांग्रेस पार्टी ने राहुल को शहीद बनाने की योजना बनाई। वह इसमें सफल नहीं हुई और राहुल गांधी सडक़ पर आते गये। जब उच्च न्यायालय का आदेश आया तब यह साफ हो गया कि राहुल के अपराध की सजा को कम नहीं किया जा सकता है। इसलिए राहुल फंस गये और कांग्रेस की समस्याएं बढ़ गईं।

आमतौर पर न्यायालय मानहानि मामले में आरोपी को माफी मांगने का अवसर देती है। इसके बाद मामला खत्म भी कर दिया जाता है। राहुल को भी ऐसा मौका दिया लेकिन उन्होंने न्यायालय को ही चकित कर दिया। मैं सावरकर नहीं हूं जो माफी मांग लूं, यह न्यायालय के प्रश्र का सही उत्तर होने की बजाए उस दंभ का परिचायक था जो नरेन्द्र मोदी के खिलाफ किया जाकर मोदी समाज तक पहुंच गया। अब न्यायालय ने सजा को बरकरार रखना ही उचित समझा। अब सवाल यह उठता है कि क्या अभिव्यक्ति की आजादी वाला शब्द इतना विस्तार वाला है कि कुछ भी कहा जा सकता है और उसे अभिव्यक्ति में समेटा जा सकता है? शायद यही समझने का अन्तर कानून और राहुल गांधी में रह गया। इसलिए उनकी लोकसभा से सदस्यता भी चली और कई मानहानि मामलों में फंस भी गये। जब समय बदलता है तब वे सभी बातें सामने आती हैं जिनको अपने प्रभाव से रोका हुआ होता है। गांधी परिवार का वह आवरण हट रहा है जिसके कारण वह खुद को कानून से ऊपर समझता रहा है। अब देश में कानून का राज है यह संदेश भी देना जरूरी है। इसलिए गुजरात उच्च न्यायालय का आदेश केवल कानून तक सीमित नहीं रखा जा सकता है इसे राजनीति में शुचिता और चुनाव सुधार के लिहाज से भी देखा जाना चाहिए।

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