‘क्षेत्रीय’ दलों में चल रहा लालच व विघटन का ‘दौर’

लोकतंत्र के चारों स्तंभों में नैतिक गिरावट का सिलसिला चल निकला है। कहीं ज्यादा तो कहीं कम। हालांकि सभी स्तंभ अपने यहां की गिरावट को कम करके आंक रहे हैं या इससे इंकार भी कर रहे हैं। दबी जुबान में अब तो स्वीकारा भी जाने लगा है। इन सबके बाद राजनीति में नैतिकता की जितनी गिरावट इन दिनों देखने में आ रही है इससे पहले के दौर में कभी देखने में नहीं आई थी। जिस प्रकार से राजनीतिक दलों में भगदड़ मच रही है वह इस नैतिकता को और नीचे ले जायेगी।

सुरेश शर्मा, भोपाल। लोकतंत्र के चारों स्तंभों में नैतिक गिरावट का सिलसिला चल निकला है। कहीं ज्यादा तो कहीं कम। हालांकि सभी स्तंभ अपने यहां की गिरावट को कम करके आंक रहे हैं या इससे इंकार भी कर रहे हैं। दबी जुबान में अब तो स्वीकारा भी जाने लगा है। इन सबके बाद राजनीति में नैतिकता की जितनी गिरावट इन दिनों देखने में आ रही है इससे पहले के दौर में कभी देखने में नहीं आई थी। जिस प्रकार से राजनीतिक दलों में भगदड़ मच रही है वह इस नैतिकता को और नीचे ले जायेगी। क्षेत्रीय दलों का अपना एजेंडा और महत्व होता है। लेकिन वे राष्ट्रीय परिपक्ष्य में उतने प्रभावी नहीं हो पाते जितने वे अपने राज्य के हिसाब से हो जाते हैं। उनका एक नेता होता है जिसका प्रदेशव्यापी प्रभाव हो जाता है। जीतिगत समीकरण उसके पक्ष में होते हैं। उसकी भाषण शैली में प्रदेश के लोगों को उत्तेजित करने की क्षमता आ जाती है तब स्थानीय लोग भावनाओं पर काबू नहीं रख पाते हैं और उसे अपना समर्थन दे देते हैं। कमोवेश भारत के क्षेत्रीय दलों की ऐसी ही स्थिति है। लेकिन जब भी क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय राजनीति करने का प्रयास करते हैं तब उनमें इसी प्रकार का पराभव होता है। कुछ समय देश में इन्हीं क्षेत्रीय दलों के कारण मिलीजुली सरकारों का दौर आया था लेकिन देश ने इसके परिणाम भी भुगते थे?

इन दिनों क्षेत्रीय दलों के पराभव का दौर है। लालच के कारण कुछ नेता अपना चरित्र बदल रहे हैं। लालच में सत्ता भी हो सकती है और आर्थिक लाभ लेने की लालसा भी। क्षेत्रीय दलों में एक दौर तो यह है कि जिन नेताओं ने इनकी स्थापना की थी वे या तो चले गये या उम्र उनका साथ नहीं दे पा रही है। इसलिए उनका प्रभाव कम हो रहा है। नेतृत्व बदलाव को जो तरीका अपनाया जा रहा है वह भी क्षेत्रीय दलों की साख को प्रभावित कर रहा है। महाराष्ट्र का घटनाक्रम वही संदेश दे रहा है। बाला साहब ठाकरे ने अपने सक्रिय भतीजे की बजाए बेटे को महत्व दिया। आज शिवसेना टूटकर विचार शून्य हो गई। उद्धव ठाकरे कांग्रेस के साथ खड़े हैं जबकि बाला साहब कभी इस विचार के थे ही नहीं। आज शरद पवार भी भतीजे और बेटी के भंवर में साख गंवा रहे हैं। मुलायम को जिस अंदाज में अखिलेश ने अध्यक्ष पद से हटाकर संगठन पर कब्जा किया था आज भी उसका उदाहरण दिया जाता है। लालू यादव के किये का खामियाजा तेजस्वी भोग रहे हैं। चार्जसीट में नाम आ गया। अन्य दलों की हालत भी ऐसी ही हो रही है। सभी का मकसद अपना और अपना दल रह गया है न तो प्रांत और न ही देश कहीं प्राथमिकता में नहीं है।

नरेन्द्र मोदी के युग में एक आरोप यह लगता है कि जाचं एजेंसियों का सहारा लेकर विरोधियों को प्रताडि़त किया जाता है। यह आरोप नया नहीं है। इससे पहले की सरकारें भी ऐसा ही करती रही हैं। इंदिरा काल में 356 के प्रयोग से सरकारों को गिरा दिया जाता था। बाद के काल में भी सपा- बसपा का समर्थन लेने के लिए यही फार्मूला अपनाया जाता था। मोदी का युग बहुमत की सरकार का युग है। देश में नये विचार का युग है। अल्पसंख्यक वाद की राजनीति के समाप्त होकर बहुसंख्यक वाद की राजनीति का समय है इसलिए यह भगदड़ है।

पहले देश में अल्पसंख्यकवाद को प्रधानता के साथ बहसंख्यकवाद के विरोध की राजनीति होती थी। इसका मतलब यह होता था जो भी देश के बहुंसख्यक मतदाता का साथ लेने या देने का प्रयास करता था उसे साम्प्रदायिक कह कर अपमानित किया जाता था। आज वह अपमान का समय चला गया। पहले इसी कारण भाजपा के पास बैठने में तोहमत लगती थी। आज वह दौर खत्म हो गया। इसलिए नेताओं और छोटे दलों में भाजपा का साथ देने और साथ मिलने की होड़ मची है। यहीं से शुरू होता है राजनीति के नये अध्याय का सूत्रपात। अब स्थापित पुराने नामों को छोडक़र हर कोई भाजपा के विचार के साथ खडे होना चाहता है। उसे भी समझ में आ गया कि बहसंख्यक वोट ही अब सत्ता का निर्धारण करेगा। इसलिए या तो दल के साथ केन्द्र की सरकार का समर्थन दिया जा रहा है या पुराने नेताओं से विच्छोह करके युवा लॉबी भाजपा के साथ आने का प्रयास कर रही है। इसलिए आपको महाराष्ट्र भी दिखाई देगा और बिहार भी। राष्ट्रीय राजनीतिक दल जब ताकतवर होता है तब ऐसी ही स्थिति बनती है। अब हम कांग्रेस के उस कालखंड की याद कर सकते हैं या अब भाजपा के आज के कालखंड की। अपने बचाव में खूब कहा जायेगा कि यह लालच है लेकिन यह विघटन तो है ही।

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