‘सुशासन’ का परिणाम जेल से बाहर आ रहा है ‘आनंद’

सुशासन बाबू का नाम तो सुना ही होगा। कहते हैं वस्तु स्थान बदलने पर अपना स्वभाव भी बदल देती है। वहीं हो रहा है बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ। उनका नारा था सुशासन और विकास। बिहार ने ऐसा किया भी।

भोपाल। सुशासन बाबू का नाम तो सुना ही होगा। कहते हैं वस्तु स्थान बदलने पर अपना स्वभाव भी बदल देती है। वहीं हो रहा है बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ। उनका नारा था सुशासन और विकास। बिहार ने ऐसा किया भी। इन दिनों नीतीश बाबू लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद के साथ मिलकर सरकार चला रहे हैं। चुनाव के समय वे इसके विरोध में थे लेकिन बाद में भाजपा का साथ छोड़कर सरकार बनाने चले गये। उस समय सपना था देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को चुनौती पेश करना। वे यही सोच कर राजद की शरण में गये थे। सोचा था समूचा विपक्ष उन्हें हाथों हाथ लेगा? प्रधानमंत्री पद के लिए विपक्ष का संयुक्त उम्मीदवार बना देगा। ग्रह जब घर बदलते हैं तब चाल भी बदल जाती है और उनका प्रभाव भी। ऐसा कुछ भी नहीं हुआ और नीतीश दर-दर भटक रहे हैं प्रधानमंत्री पद के लिए उनका नाम चलाना तो दूर की बात है कोई उनके कहे पर एकता की बात करने को तैयार नहीं हो रहा है। समझ में आ गया, अच्छे खासे थे पाला बदलते ही सबकुछ बदल गया। पलटूराम की उपमा मिल गई और हाथ कुछ भी नहीं आया। खैर! यहां आकर आराम से सरकार चलाने का सुख मिल जाता तो भी ठीक था? क्या पता था कि एक तोहमत भी माथे पर लग जायेगी।

नीतीश बाबू की पार्टी से सांसद रहे हैं बाहुबली आनंद मोहन सिंह। गोपाल गंज के कलेक्टर जी कृष्णैया की हत्या के मामले में आजीवन करावास की सजा काट रहे थे। उनके बेटे चेतन मोहन राजद से विधायक हैं। उनकी सगाई हो रही है तब आनंद पेरोल पर आये हुए हैं। राजनीति की खिचड़ी पकी और सरकार ने एक अध्यादेश जारी कर दिया। इस अध्यादेश से 27 लोगों को समय से पहले जेल से रिहा होने का रास्ता साफ हो गया। इसमें एक आनंद मोहन सिंह हैं। यह नीतीश के सुशासन का नया संस्करण है। ग्रह ने स्थान बदला तो मारक क्षमता खत्म हो गई। तेजस्वी के दबाव में सुशासन फुर्रर हो गया। भाजपा और बसपा ने सवाल उठा दिये। बसपा सुप्रीमों मायावती ने नीतीश को चेताया कि एक दलित और ईमानदार अधिकारी की हत्या में शामिल बाहुबली को कानून में राहत देकर जेल से निकालने का प्रयास अनुचित है। इसका पुरजोर विरोध मायावती ने किया है। लेकिन दो दिन बाद बाहुबली आनंद मोहन जेल से बाहर आ जायेगा और नीतीश के सुशासन की छवि को बट्टा लग जायेगा। वह तो उसी समय लग गया था जब लालू की शरण में नीतीश कुमार पहुंच गये थे।

राजनीति के हमाम में सभी नंगे हैं यह कहावत यूं ही नहीं बनी। जिसे मौका मिलता है वह ऐसा ही करता है लेकिन जिसने सुशासन बाबू का दावा किया था। खुद को प्रस्तुत किया था उसके राज में इस प्रकार का कारनामा होना आलोचना को आमंत्रित तो करेगा ही। किसी असहाय, बेसहारा या जरूरतमंद व्यक्ति के लिए नियमों में बदलाव किया जाता तो समझा भी जा सकता है लेकिन दलित अधिकारी की हत्या में शामिल व्यक्ति वो भी दबंग है कानून बदल कर जेल से बाहर निकालने का प्रयास विवाद तो पैदा करेगा ही। तभी तो लोग कह रहे हैं कि हर कोई बाबा थोड़े ही हो सकता है। नीतीश तो विचार और दल से पलटूराम की उपाधी पहले ही पा चुके हैं।

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