‘सवाल’ तो है 20 बरस की सत्ता और कार्यकर्ता ‘कुंठित’

भोपाल। न सरकार बोल रही और न ही संगठन। चुनाव हैं इसलिए कार्यकर्ता बोल रहा है। समाचार पत्रों में यह खबर भी आ रही है। लिखा जा रहा है कि सह संगठन महामंत्री शिवप्रकाश केन्द्रीय नेताओं को फीडबैक देंगे कि मध्यप्रदेश का कार्यकर्ता कुंठित हो रहा है। बीस बरस की सरकार के बाद तो तर मलाईदार होना चाहिए था फिर वह कुंठित क्यों हो रहा है? यही वह सवाल था जिसको नेता सुनना नहीं चाहते और कार्यकर्ता कह नहीं पा रहा था। अब जब चुनाव सामने आ गये हैं और फीडबैक लेने के लिए केन्द्रीय नेतृत्व ने टीम भेजी है। तब इसी प्रकार की बातें सामने आ रही हैं। एक सच्चाई को कोई समझना नहीं चाहता। जिसे कहने कोई जाता है उसे नकारात्मक मान कर अनसुना कर दिया जाता है। एक समय था भाजपा के पास विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाले कार्यकर्ता हुआ करते थे आज भाड़े के लोग वो ही काम कर रहे हैं। सूचना पहले मिलकर दी जाती थी। विस्तार हुआ तो प्रमुख लोगों को सूचना मिलकर, बाकी को संचार माध्यमों से। फिर वाटसएप का माध्यम आया। अब कॉल सेंटर सूचना देते हैं। जिसकी पीढ़ियां संगठन बनाने में लगी हैं उसको कॉलसेंटर से भाजपा का संदेश सुनाया जाता है तब उसकी क्या हालत होगी समझा जा सकता है? संक्षेप में कहें तो भाजपा का काम उनके लोग नहीं भाड़े के लोग कर रहे हैं?

कुशाभाऊ ठाकरे का संगठन, सुन्दरलाल पटवा और कैलाश जोशी के इस संगठन के पास आज अपने पुराने नेताओं सूची तक उपलब्ध नहीं है। दूसरे विचारों के महापुरूषों से काम चलाने वाला संगठन दीनदयाल और अटल बिहारी वाजपेयी को बमुश्किल महापुरूष बना पाया। लेकिन समाज के विभिन्न विभागों में काम करने की क्षमता रखने वाले योग्य कार्यकर्ता और विचारकों के होते हुए आयातित लोग उन स्थानों पर समायोजित हैं। वे अब भी पुरानों ठिकानों के वफादार हैं और सूचनाओं का आदान-प्रदान करते हैं। इसलिए जब फीडबैक देने का समय आया तब कार्यकर्ता ने नेतृत्व को सही संदेश भिजवा दिया। यह शब्द अनुचित है कि कार्यकर्ता कुंठित है वह तो बीस बरस की सत्ता के बाद भी कुपोषित होकर उस संगठन धर्म का पालन कर रहा है जो उसे कुशाभाऊ ठाकरे, प्यारेलााल खंडेलवाल और नारायण प्रसाद गुप्ता से विरासत में मिला है। सत्ता की चकाचौंध में प्रदेश का नेतृत्व उसे भूल रहा है यह दूसरी बात है। प्रदेश की जनता भाजपा के पक्ष में है। इसका कारण यह है कि उसे योजनाओं का लाभ मिला है। देश-प्रदेश में वे काम हुए हैं जो उसे गौरव प्रदान करते हैं।

राज को तो फिर भी प्राप्त किया जा सकता है पर कार्यकर्ता के दिल पर राज करने पर विचार नेतृत्व करना चाहिए। नारे तो लगते ही हैं। सत्ता है और उसकी चमक है तब नारे तो लगेंगे ही। लेकिन दिल से स्वर आना और होठों से आने वाले स्वर का अन्तर समझने की जरूरत है। गुजरात में टिकिट काटने पर मौन और कर्नाटक की बगावत में जो संदेश छुपा है नेतृत्व को उसे पढ़ने की जरूरत है। फीडबैक तो सन्तुष्ट करने का तरीका है मन की बात निकलने से गुस्सा आधा हो जाता है। आधा वोट डलवाने के समय परिस्थितियां खत्म कर देती हैं। फिर मिलने वाली सत्ता की चमक पांच साल बाद फीडबैक का और अवसर प्रदान कर देती है। यह तो चलेगा।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button