बिहार में नीतीश कुमार पर हावी हो रहे हैं तेजस्वी यादव, इन 3 फैसलों से मिल रहे संकेत

पटना
अगले साल लोकसभा चुनाव होने वाले हैं। इसके बाद 2025 में विधानसभा चुनाव का बिगुल बजेगा। इसे देखते हुए बिहार में भी सियासी गहमागहमी तेज होती जा रही है। 2024 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ विपक्ष को एकजुट करने की मुहिम पर निकले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने हाल के दिनों में ताबड़तोड़ फैसले लिए हैं। इनमें से तीन निर्णय ऐसे हैं, जिनसे यह साबित होता है कि सरकार में धीरे-धीरे तेजस्वी यादव की दखलअंदाजी बढ़ती जा रही है।

इस महीने की शुरुआत में मोतिहारी में जहरीली शराब पीने से हुई 30 लोगों की मौत की घटना के बाद नीतीश कुमार थोड़े बैकफुट पर आए। अपने पुराने स्टैंड को संसोधित करते हुए वह पीड़ित परिवार को मुआवजा देने के लिए तैयार हो गए। आपको बता दें कि बीजेपी ने जब विधानसभा में शराब पीने से मरने वाले लोगों के परिजनों के लिए आर्थिक मदद की मांग की थी तो नीतीश कुमार आगबबूला हो गए थे। उन्होंने भगवा पार्टी की मांग को सिरे से खारिज कर दिया था। हालांकि, महागठबंधन की सहयोगी आरजेडी जब विपक्ष में थी तो शराबबंदी कानून के खिलाफ मुखर होकर बोलती थी। शायद यही वजह है कि सत्ता परिवर्तन के बाद नीतीश कुमार का भी हृदय परिवर्तन हुआ है।

इसके अलावा, 10 अप्रैल को नीतीश कुमार की सरकार ने बिहार जेल नियमावली, 2012 में संशोधन किया। "ड्यूटी के दौरान लोक सेवक की हत्या" खंड को उन मामलों की सूची से हटा दिया, जिनके लिए सजा की अवधि में छूट पर विचार नहीं किया जा सकता है। सरकार के इस फैसले के बाद 27 कैदियों की रिहाई की सूचना जारी कीगई है, जिनमें गोपालगंज के तत्कालीन डीएम की हत्या के दोषी राजपूत नेता आनंद मोहन सिंह का नाम भी शामिल था। सरकार के इस फैसले के बाद वह जेल से रिहा हो चुके हैं। ऐसा माना जाता है कि राजपूत वोटर को अपने पाले में करने के लिए आरजेडी-जेडीयू गठबंधन की सरकार ने यह फैसला किया है।

नीतीश के फैसले के विरोध में सहयोगी
नीतीश कुमार की कैबिनेट ने बिहार लोक सेवा आयोग के माध्यम से नियुक्त शिक्षकों को सरकारी कर्मचारी का दर्जा देने का फैसला किया है। इससे पहले 2006 से पंचायती राज संस्थाओं के जरिए नियुक्तियां होती थीं, जिसका राजद विरोध करता रहा है। नई नियुक्ति नीति से मौजूदा 4,00,000 नियोजित शिक्षक नाराज हो गए हैं। भाजपा और सरकार की सहयोगी भाकपा (मार्क्सवादी-लेनिनिस्ट-लिबरेशन) दोनों ही शिक्षकों के समर्थन में उतर आई है। बिहार कांग्रेस अध्यक्ष अखिलेश सिंह ने भी शिक्षकों को समर्थन देने का आश्वासन दिया है।

नीतीश पर भारी पड़ रही आरजेडी
राजनीतिक विश्लेषक और एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल स्टडीज के पूर्व निदेशक डीएम दिवाकर ने कहा कि ऐसा लगता है कि तीनों फैसले लोकसभा और विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखकर लिए गए हैं। तीनों फैसले में आरजेडी का समर्थन इस बात को साबित कर रहा है कि वह धीरे-धीरे सरकार में अपनी दावेदारी मजबूत कर रही है।

दबाव में हैं नीतीश कुमार?
उन्होंने कहा, ''नीतीश कुमार को यह एहसास कराया गया है कि जहरीली शराबकांड के कारण होने वाली मौतों का कोई बचाव नहीं हो सकता है। वह लंबे समय तक पीड़ितों को दोष देकर बच नहीं सकते हैं। राजद और कांग्रेस सहित महागठबंधन के साथी भी लगातार समीक्षा की मांग करते रहे हैं। सीएम लगातार इसे खारिज करते रहे हैं। इस फैसले का मतलब है कि उन्होंने दबाव महसूस करना शुरू कर दिया है।''

नीतीश अब कैसे कहेंगे क्राइम पर जीरो टॉलरेंस?
सामाजिक विश्लेषक और पटना विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर एनके चौधरी भी इस बात से सहमत हैं कि नीतीश कुमार के रुख में बदलाव राजद की महागठबंधन और सरकार में बढ़ती मुखरता का स्पष्ट संकेत है। उन्होंने कहा, ''राजद शराब नीति की समीक्षा चाहता था। कांग्रेस और पूर्व सीएम जीतन राम मांझी की भी यही राय है। जेल कानून में संशोधन से नीतीश कुमार की इमेज को नुकसान पहुंच सकता है। वह हमेशा कहते थे कि अपराध के मामले में वह कोई समझौता नहीं करेंगे।''

शराबबंदी कानून भी वापस हो जाए तो…
उन्होंने आगे कहा, ''नीतीश कुमार को सोशल इंजीनियरिंग के मास्टर के रूप में जाना जाता है। राजद के साथ मिलकर काम करते हुए वे उस गैप को पाटने की कोशिश कर रहे हैं, जिनका इस्तेमाल भाजपा उनके खिलाफ कर सकती है। कोई भी पार्टी राजपूत समुदाय को नाराज नहीं कर सकती है, इसलिए सभी चुप हैं।'' एनके चौधरी ने यह भी कहा है कि अगर चुनाव से पहले शराबबंदी को भी अगर वापस ले लिया जाए तो कोई चौंकने वाली बात नहीं होगी।

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button