‘यथोचित’ सम्मान के साथ सिद्धार्थ मलैया की ‘घर-वापसी’

आखिरकार भाजपा ने अपनी भूल को सुधार ही लिया। दिग्गज भाजपाई जयंत मलैया के बेटे सिद्धार्थ मलैया की भाजपा में वापसी करा ली गई। सिद्धार्थ की वापसी के वक्त मंच का नजारा भी अद्भुत था।

भोपाल। आखिरकार भाजपा ने अपनी भूल को सुधार ही लिया। दिग्गज भाजपाई जयंत मलैया के बेटे सिद्धार्थ मलैया की भाजपा में वापसी करा ली गई। सिद्धार्थ की वापसी के वक्त मंच का नजारा भी अद्भुत था। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, प्रदेश प्रभारी मुरलीधर राव, महामंत्री संगठन हितानंद शर्मा और सरकार में दिग्गज मंत्री डा. नरोत्तम मिश्र मंच पर उपस्थित थे। कुछ और लोग भी थे। मंच पर केवल सिद्धार्थ मलैया ही ऐसे नेता थे जिनके पिता और दादा भाजपा के बडे नेता रहे हैं। इसलिए इसको घर वापसी की संज्ञा दी गई। सिद्धार्थ की वापसी के कई मायने हैं। यह भाजपा की बेहतर रणनीति है। पार्टी क्षणिक लाभ को छोड़कर स्थायी लाभ की ओर बढ़ी है। जयंत मलैया दमोह भाजपा के पर्याय बन गये थे, लेकिन तानाशाह नहीं थे। इसलिए वे जीतते तो थे लेकिन अन्तर कम होता जा रहा था। वे पिछला चुनाव क्या हारे उन पर नेतागिरी का प्रहार हो गया? राजनीति में सपने देखने पर रोक नहीं है लेकिन सपने देखते समय सपने तोडऩे पर जरूर रोक है। जयंत की हार को इसी परिपेक्ष्य में देखा जाना चाहिए था। पिछले दिनों दल-बदल का दौर आया था। इस भगदड़ से दमोह भी अछूता नहीं रहा और वह हो गया जिससे भाजपा नेतृत्व को पछतावा हुआ।

जयंत जी के आयोजन में कैलाश विजयवर्गीय ने मलैया परिवार को भाजपा से निकाले जाने के घटनाक्रम पर खेद व्यक्त करके निर्णय को कटघरे में ला खड़ा किया था। उसके बाद पार्टी भूल सुधार में जुट गई थी। सिद्धार्थ की घर-वापसी उसी भूल सुधार का परिणाम है। मंच पर जो जमावड़ा हुआ वह भी उसी का परिणाम है। मलैया का मौन कितना नुकसान पहुंचा सकता है यह 2023 को डरा रहा था। क्योंकि मलैया ही ऐसे नेता हैं जिनकी तीन पीढिय़ां जनसंघ और भाजपा को सींचती रही हैं। याद करिये गौर साहब को कितना विवाद पैदा करते थे किसने उन्हें पार्टी से निकाला? आखिर जयंत जी के साथ ऐसा कैसे हो गया? यह सवाल भोपाल से दिल्ली तक मथा गया। उत्तर कल मिल गया। यथोचित स मान के साथ सिद्धार्थ भाजपा में आये। यह कारपोरेट भाजपा के लिए संगठन की सबक भी है। संगठन का मतलब कर्मचारी समझने से नहीं परिवार से समझने से बनता है। यही सीख संघ से मिलती है और यही कुशाभाऊ ठाकरे कहा करते थे। बहकी भाजपा के कदम संभल रहे हैं यह संदेश यदि इस घटनाक्रम से निकलता है तब अच्छी बात है वरना भाजपा जाने।

शिवराज सिंह चौहान और विष्णुदत्त शर्मा को पता है कि विरासत संभालने में कितना पसीना बहाना पड़ता है। यह क्यों याद नहीं रहना चाहिए जिनने विरासत बनाई है उनके पसीने की कीमत क्या होगी। उन्होंने तो बंजर जैसी भूमि को उपजाऊ बनाया होगा। आज तो सुविधाओं में पसीना बहाया जा रहा है वे तो पसीना बहाकर पेड़ की छांव में सुसताते होंगे। इसलिए सिद्धार्थ से भाजपा के बुद्ध बनने की कल्पना करना चाहिए।

आज जो भाजपा दिखाई दे रही है और वैश्विक नरेन्द्र मोदी ने और प्रदेशव्यापी शिवराज सिंह ने बनाया होगा लेकिन उन्होंने नींव में बैठकर नहीं सुसज्जित कंगुरों पर बैठकर बनाया है। कार्यकर्ता का अनुशासन बनाना जरूरी है लेकिन अनुशासन को समझने वालों को सीख देने का तरीका अलग होता है। सिद्धार्थ को जिस यथोचित स मान देकर घर-वापसी कराई है उससे पार्टी का हर नीव का पत्थर गर्व महसूस कर रहा है और कार्यकर्ता में उत्साह हिलौरे मार रहा है। यह 2023 की राह आसान करेगा।

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