‘बृज भूषण’ और फोगाट परिवार के बीच फंसा ‘पेंच’

जन्तर मन्तर पर खिलाड़ी धरना दे रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर प्रकरण दर्ज करके गंभीर आरोपों की जांच हो रही है। दूध का दूध और पानी का पानी सामने आ जायेगा। जो आरोप हैं वे गंभीर हैं लेकिन जो जवाब है वह भी आत्मविश्वास से भरा हुआ है।

भोपाल। जन्तर मन्तर पर खिलाड़ी धरना दे रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर प्रकरण दर्ज करके गंभीर आरोपों की जांच हो रही है। दूध का दूध और पानी का पानी सामने आ जायेगा। जो आरोप हैं वे गंभीर हैं लेकिन जो जवाब है वह भी आत्मविश्वास से भरा हुआ है। इसलिए देश भर के खिलाड़ियों में खेमेबाजी दिखाई देने लग गई। केन्द्र सरकार ने पहले जांच कमेटी बनाई थी उसकी रिपोर्ट भी उसके सामने है इसलिए वह तेल देखो और तेल की धार देखो की नीति अपना रही है। उसका कई बार का सांसद जो दाव पर लगा हुआ है। इसलिए समय की प्रतीक्षा करना चाहिए। खिलाड़ियों में से महिलाओं ने अपना अचूक दाव चला हुआ है। यौन शोषण महिलाओं का ऐसा हथियार होता है जिसकी काट ब्रह्मास्त्र भी नहीं कर सकता है। लेकिन यहां तो यह भी तेजहीन दिखाई दे रहा है। कब चमक वापस आ सकती है कहा नहीं जा सकता। इस प्रकार के संघों के प्रति धारणा इसी प्रकार की है जिस प्रकार के आरोप लग रहे हैं। इसके बाद भी यह लड़ाई खिलाड़ी बनाम फेडरेशन या बृजभूषण नहीं हो पाई? यह तो बृृजभूषण सिंह बनाम फोगाट परिवार हो गई। जो एक प्रतिष्ठित परिवार है लेकिन जब से फिल्मी रसपान किया है तब से धारणा में वो दम नहीं रहा। इसलिए अब आने वाले समय में यह बड़ा उदाहरण बनेगा।

कई बार विषय में ऐसे पेंच फंस जाते हैं कि समाधान सामने होते हुए भी नहीं आता। ऐसा ही खिलाड़ियों के धरने में हो रहा है। धरना खिलाड़ियों से शुरू हुआ था एक परिवार पर आकर अटक गया। जिन्होंने जल्दबाजी में समर्थन दिया था वे भी अब पांव पीछे खींच रहे हैं। कुछ खास पहलवानों और खिलाड़ियों ने इस प्रकार के आरोपों की जरूरत पर सवाल उठा दिये जिससे यह आन्दोलन अपने समीकरण संभालने में कामयाब नहीं हो पाया। राजनीति ने भी तेजी से इसमें प्रवेश कर लिया और उसे खिलाड़ी संभाल नहीं पाये। कहां आन्दोलन चला था बृजभूषण सिंह के खिलाफ कहां उसमें मोदी विरोध के नारे लगने लग गये। मतलब इसमें राजनीतिक लाभ लेने वाले सक्रिय हो गये। मोदी के ही शब्दों में आन्दोलनजीवी अपनी जुगाली करने लग गये। इसलिए यह पूरा आन्दोलन ही भटक गया। सबकी सहानुभूति स्वभाविक रूप से खिलाड़ियों के प्रति होती है, हुई भी। लेकिन जिस प्रकार से बृजभूषण सिंह ने आत्मविश्वास के साथ अपनी बात रखी उससे यह सहानुभूति कमजोर होती चली गई। अब तो यह स्थिति हो गई कि यह आन्दोलन आपसी लड़ाई हो गई जो किसी खास मकसद के अटकने से शुरू हुई हो।

यौन शोषण का आरोप इतना ताकतवर हथियार है कि इससे बचने की कोई संभावना नहीं है। लेकिन इस आन्दोलन में इस हथियार का उपयोग करने वाले यह समझने का प्रयास कर रहे हैं कि कहां चूक हो गई? बृजभूषण सिंह और सम्मानित फोगाट परिवार के बीच अब तो यह द्वंद्व शुरू हो गया है कि आखिर नंबर वन कौन? यह नम्बर वन की बात पुलिस की जांच रिपोर्ट के बाद सामने आयेगी। देश की सबसे बड़ी अदालत तय करेगी कि सच कितना सच है? इसलिए आन्दोलन केवल रश्म अदायगी बनता जा रहा है। अच्छा तो यही है कि खिलाड़ी घर जायें और बृजभूषण सिंह फेडरेशन को छोड़ दें!

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