‘सत्यपाल’ मलिक की टूलकिट के साथ ‘संगत’

भोपाल। इस समय देश में बड़ी संख्या में लोग वह हैं जो प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी को देखना चाहते हैं। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जो ऐसा नहीं चाहते हैं।

भोपाल (सुरेश शर्मा)। इस समय देश में बड़ी संख्या में लोग वह हैं जो प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी को देखना चाहते हैं। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जो ऐसा नहीं चाहते हैं। इसमें कुछ पत्रकार भी शामिल हैं जिनके आचरण में हर स्थिति में मोदी विरोध समाया हुआ है। उनके मूंह से कुछ तयशुदा शब्द निकलते हैं। गोदी मीडिया उनका तय शब्द है। लेकिन देश के प्रति आस्था और विश्वास की बात करने वाले को मोदी समर्थक मानकर गोदी मीडिया कह देना चलन हो गया है। यह वह चलन है जिसमें आलोचना करने का कोई आधार नहीं है। इसके बाद भी आलोचना करना ही है। यहां हम उनके नामों की चर्चा नहीं करने जा रहे हैं। इसका आशय यह है कि हम ऐसे तत्वों को महत्व नहीं देना चाहते हैं। ये वो लोग हैं जो भारत की आलोचना करके विदेशों से पुरस्कार और सहायता प्राप्त करते हैं। वे किसी न किसी नेता या व्यक्ति को अपना शिकार बनाते हैं और उनके माध्यम से मोदी की आलोचना करवाते हैं। उसको सभी मिल बांट कर आगे बढ़ाने की मुहिम चलाते हैं। इसे टूलकिट का हिस्सा माना जाता है। यह टूलकिट कई अवसरों पर देश के सामने आ चुकी है। ऐसी कुछ संचार की संस्थाएं बनाई हुई हैं जो इस प्रकार की बातें प्रसारित करती हैं जिनके कोई सरपैर नहीं होते? ऐसा ही एक मामला सत्यपाल मलिक का इन दिनों चर्चा में बना हुआ है।

सत्यपाल मलिक जम्मू कश्मीर के राज्यपाल हुआ करते थे। उनकी कार्यप्रणाली कैसी थी वह उल्लेखित करने की बजाए उनके बयानों को लेकर उनकी चर्चा को अधिक केन्द्रीत करना उचित होगा। वे किसान आन्दोलन में खुद को किसान हितैषी सिद्ध करने के चक्कर में किसानों के पैरोकार हो चले थे। लेकिन राज्यपाल होने के नाते सरकार का हिस्सा होते हुए भी किसानों के हित में निर्णय करवाने की बजाए उन्हें भडक़ाने और अपना उल्लु सीधा करने में ही लगे रहे। किसान हितैषी कोई सुझाव न होने के कारण सरकार की ओर से भाव न मिलने पर वे मोदी विरोधी बन कर रह गये। अब उनका सांस ही मोदी की आलोचना के लिए निकलता है। किसानों में उनकी पैठ होती तो उनके प्रभाव के माने जाने वाले क्षेत्रों में भाजपा की जीत नहीं होती। इसका मतलब यह हुआ कि थोथा चना बाजे धना वाली कहावत उनके साथ सटीक बैठती है। उन्होंने करोड़ों की घूस देने के आरोप लगाये लेकिन जांच में कोई प्रमाण पेश नहीं पाये हैं। अभी उन्हें खरे उतरना है। सरकार की आलोचना और कुर्सी से चिपके रहने की कला में वे सिद्धहस्त हैं।

इन दिनों उनका पुलवामा के शहीदों के लिए साक्षात्कार की टूलकिट की लोग चर्चा बनाये हुए हैं। करण थापर को दिये साक्षात्कार में उनका सीआरपीएफ को प्लने नहीं देने का आरोप उस स्थिति में लगे नहीं उतरता जब सैन्य बलों की ओर से ऐसा कोई मामला नहीं आया है। यदि ऐसा होता तो सैन्य बल इस बारे में सरकार से बात करते या चर्चा होती। लेकिन मलिक को विवाद पैदा करने की बीमारी हो गई। वे प्रतिक्रिया देने के लायक भी शोर नहीं मचवा पाये। टूलकिट के लोग किसान आन्दोलन, शहीन बाग या विदेशों में सहायता की भीख मांग कर कोई वातावरण नहीं बना पाये। अब मलिक का यह बयान भी फुस्सी बम की भांति खत्म हो चुका है।

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