कर्नाटक चुनाव की ताकत

कर्नाटक विधानसभा चुनाव के लिए नामांकन की तारीख निकलने के बाद अब चुनाव प्रचार ने जोर पकड़ लिया है। एक बात साफ हो गई कि दोनों राजनीतिक दलों के नेतृत्व में जिन लोगों को टिकट देना था उनको दे दिया।

भोपाल। कर्नाटक विधानसभा चुनाव के लिए नामांकन की तारीख निकलने के बाद अब चुनाव प्रचार ने जोर पकड़ लिया है। एक बात साफ हो गई कि दोनों राजनीतिक दलों के नेतृत्व में जिन लोगों को टिकट देना था उनको दे दिया। अब जो होगा उसी में से आर-पार करना है। दो बातें वहां स्पष्ट है। पहली भाजपा के टिकट वितरण पर बड़ी नाराजगी है। मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री रहे इतने बड़े नेता पार्टी छोड़कर कांग्रेस के सदस्य हो गए। दूसरा इन चुनावों में यह अवधारणा भी बन रही है इन चुनाव को जीतने के लिए कांग्रेस को अपने लोगों पर नहीं भाजपा से आए लोगों पर ही भरोसा है। जिस प्रकार राहुल गांधी ने कर्नाटक की सभा में जगदीश शेट्टार का महिमामंडन किया उससे यही लगता है कि डीके शिवकुमार और सिद्धारमैया कांग्रेस के लिए कोई बहुत मायने नहीं रखते। या यूं भी कह सकते हैं कि कांग्रेस दो बड़े नेताओं के नाम से कर्नाटक का चुनाव नहीं जीत सकती। दूसरी बात यह भी स्पष्ट हो गई कि जगदीश शेट्टार भ्रष्ट और कमीशन खोर नहीं है। इसलिए यह चुनौती भाजपा के लिए है? उसने ऐसा क्या फार्मूला अपनाया जो ऐसे व्यक्ति को टिकट से वंचित कर दिया? इसलिए कर्नाटक विधानसभा के चुनाव की ताकत न केवल दक्षिण के दरवाजे पर भाजपा के प्रवेश करने और न करने पर निर्णय करेगी, साथ में 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव को भी प्रभावित करेगी। कर्नाटक से भाजपा के लोकसभा के सदस्यों की संख्या यदि कम होती है तो उसकी भरपाई कहां से होगी, इस पर विचार किया जा सकता है? केंद्रीय नेतृत्व कर्नाटक में गुजरात की भांति बड़े नेताओं की टिकट काटने का फार्मूला आजमा रहा था। यह कितना सार्थक सिद्ध हुआ है यह 13 मई को पता चलेगा। उसी दिन यह भी पता चलेगा कि राज्यों में विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जादू किस कदर चल रहा है। यदि प्रधानमंत्री का जादू चल भी रहा है तब भी राज्यों के लिए एक नेतृत्व का नेटवर्क होना अनिवार्य है। भाजपा में हालांकि कई क्रम का नेतृत्व तैयार करने का कार्यक्रम चलता रहता है। फिर भी नेतृत्व का क्रम यदि बीच में ब्रेक होता है तब आने वाले समय में राजनीतिक समस्याएं सामने आएंगी। गुजरात में हम ऐसा महसूस कर सकते हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री और वहां से देश के प्रधानमंत्री के बीच का नेतृत्व खत्म हुआ है। इसी प्रकार कर्नाटक में भी आने वाला नेतृत्व और येदुरप्पा के बीच का क्रम टूटता दिख रहा है। यह राजनीतिक चिंता का विषय हो सकता है। लेकिन यह किसी राजनीतिक दल की उचित नहीं हो सकती। इसलिए कर्नाटक विधानसभा चुनाव का परिणाम अपनी ताकत दिखाएगा।

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