राहुल गांधी के दौड़ से बाहर होने पर विपक्षी एकता को दूसरा झटका लगा, पहले टूटी थी एनसीपी

गुजरात उच्च न्यायालय ने राहुल गांधी की अर्जी को रिजेक्ट कर दिया। जिसमें उन्होंने मानहानि मामले में मिली सजा को स्थगित करने का आग्रह किया था। इससे उलट न्यायालय ने राहुल गांधी पर कठोर टिप्पणियां भी की। अब आस सर्वोच्च न्यायालय पर टिकी हुई है फिर भी अब राहुल के अगला लोकसभा सहित अन्य चुनाव लडऩे की रोक भी लग गई। ऐसे में लालू यादव दुल्हा बना कर मोदी को पटकनी देने का विचार रखते थे वह तो अपने आप ही समाप्त हो गया। वैसे भी महाराष्ट्र में एनसीपी में हुई टूट ने विपक्षी एकता का जनाजा पहले ही निकालने की तैयारी कर दी थी। विपक्षी एकता में लगे नेताओं को अब खुद का ठिकाना संभालना पड रहा है। कांग्रेस के लिए गंभीर संकट की स्थिति बन गई है।

सुरेश शर्मा, नई दिल्ली/भोपाल। गुजरात उच्च न्यायालय ने राहुल गांधी की अर्जी को रिजेक्ट कर दिया। जिसमें उन्होंने मानहानि मामले में मिली सजा को स्थगित करने का आग्रह किया था। इससे उलट न्यायालय ने राहुल गांधी पर कठोर टिप्पणियां भी की। अब आस सर्वोच्च न्यायालय पर टिकी हुई है फिर भी अब राहुल के अगला लोकसभा सहित अन्य चुनाव लडऩे की रोक भी लग गई। ऐसे में लालू यादव दुल्हा बना कर मोदी को पटकनी देने का विचार रखते थे वह तो अपने आप ही समाप्त हो गया। वैसे भी महाराष्ट्र में एनसीपी में हुई टूट ने विपक्षी एकता का जनाजा पहले ही निकालने की तैयारी कर दी थी। विपक्षी एकता में लगे नेताओं को अब खुद का ठिकाना संभालना पड रहा है। कांग्रेस के लिए गंभीर संकट की स्थिति बन गई है।

कांग्रेस चूक कर गई। वह राहुल को शहीद बनाकर उसे योद्धा के रूप में पेश करना चाहती थी। इसलिए लोकसभा की सदस्ता को भी दाव पर लगा दिया था। लेकिन देश भर में ऐसी कोई मुहिम देखने में नहीं आई जिससे राहुल गांधी की सदस्यता जाने की सहानुभूति बटोरी जा सके। हां, विदेशों में जरूर इस मामले को फैलाया गया। भारत में इस मामले की हवा नहीं बन पाई और राहुल गांधी बेमतलब शहीद हो गये। जनान्दोलन के मामले में जिस प्रकार कांग्रेसी विफल हुए हैं ठीक वैसे ही कानूनी मामले में भी रणनीति कामयाब नहीं हो पाई। कानूनी जानकारों ने राहुल को जनसहानुभूति का पात्र बनाने की भावना से कानून मामले को अधिक महत्व नहीं दिया और अब राहुल गांधी अगले चुनाव की दौड से बाहर हो गये। जो काम पहले करना था उसके बारे में अब रणनीति बनाई जा रही है जबकि अधिकांश समय निकल चुका है।

सर्वोच्च न्यायालस क्या करेगा यह एक एंगल होगा। फिर भी विपक्षी एकता को यह सबसे बड़ा झटका है। विपक्षी एकता के लिए हुई पहली बैठक में हालांकि नीतीश कुमाार के मनसूबों पर पानी फेरते हुए राहुल को दुल्हा बनने का आफर दे दिया था। यह भी कह दिया था वे इसके बाराती बनने को तैयार हैं। लालू यादव ने अपने अहसान का बदला उतार दिया है, अब राहुल का भाग्य। लेकिन बैठक तो हुई लेकिन एकता में कील लग गई। नीतीश के सभी प्रयास ही पहले ही झटके में धराशाही हो गये। उन्होंने भाजपा का साथ इसीलिए तो छोड़ा था। अन्यथा राजद में कौन सी खुशबू आ रही थी? अन्य प्रमुख सहयोगी भी इससे खफा हो गये थे।

अब राहुल गांधी की चुनाव लडऩे की संभावना काफी हद तक समाप्त हो गई। ऐसा होने से कांग्रेस को भी बड़ा झटका लगा है। कांग्रेस राष्ट्रीय राजनीतिक दल है और उसके जाने-पहचाने चेहरे का इस प्रकार से चुनावी मैदान से हटने का असर आने वाले समय पड़ेगा। नरेन्द्र मोदी के लिए राह आसान होने की संभावना इसमें देखी जा रही है। लेकिन दूसरा पक्ष यह रहेगा कि अब राहुल गांधी अधिक समय प्रचार के लिए दे पायेंगे। फिर भी गुजरात उच्च न्यायालय से मिला झटका न तो कांग्रेस की सेहत के लिए अच्छा है और न ही विपक्षी एकता ेके लिए।

इससे पहले विपक्षी एकता के चाण्क्य कहे जा रहे शरद पवार की पार्टी में भी बगावत हो गई। एकता का नेतृत्व करने की बजाए अपना घर संभालने में पवार साहेब लगे हुए हैं। उनके भतीजे ने बगावत करके राजग का साथ देने का ऐलान कर दिया। अजीत पवार खुद तो उप मुख्यमंत्री बन गये बाकी 8 विधायक मंत्री बन गये। अजीत के साथ आने वाले विधायकों की संख्या इतनी है कि शिवसेना दोहराई जा सकती है। न जाने महाराष्ट्र की राजनीति में क्षेत्रीय दलों की तासीर भतीजे के दम पर आगे बढ़ा और सेहरा बेटा या बेटी के सर बांध दों क्यों है? बाला साहेग ठाकरे ने भी ऐसा ही किया था। फेरे राज ठाकरे के कराये और डोली उठा दी उद्धव के साथ। ऐसा ही अब शरद पवार कर रहे थे। लेकिन बगावत हो गई।

इस बगावत ने भी विपक्षी एकता की हवा निकाल दी थी। रही सही कसर राहुल गांधी के दौर से बाहर होने पर निकल गई। बिहार में लालू की राजनीति और एनसीपी की बगावत के बाद नीतीश को विपक्षी एकता के अधिक अपना घर संभालने की चिंता हो गई। जदयू के विधायकों की लालू की पार्टी की बजाए भाजपा के साथ काम करने का अधिक अनुभव है। इसलिए जदयू के बगावत की खबरें भी खूब आईं। जो भी हो 2024 के लोकसभा चुनाव इसी भावना से ही होंगे। मोदी को चुनौती देने की मंशा शायद धरी की धरी रह जाये।

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