आम चुनाव पर मोदी का कब्जा बरकरार वे ही दे रहे दिशा..अब मुस्लिम आरक्षण पर मचा बवाल

आम चुनाव में अभी तक के जितने भी मुद्दे हैं वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तय कर रहे हैं। पहले चरण के मतदान तक देश को अपने दस साल के कार्यकाल में किये गये विकास कार्यों के बारे में बताया। लोगों को लगा कि मोदीमय चुनाव में विपक्ष् कहीं है ही नहीं तो मतदान कम ही रहा।

सुरेश शर्मा ।आम चुनाव में अभी तक के जितने भी मुद्दे हैं वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तय कर रहे हैं। पहले चरण के मतदान तक देश को अपने दस साल के कार्यकाल में किये गये विकास कार्यों के बारे में बताया। लोगों को लगा कि मोदीमय चुनाव में विपक्ष्ा कहीं है ही नहीं तो मतदान कम ही रहा। दूसरे चरण के मतदान में कांग्रेस के चुनाव घोषणा-पत्र को लेकर चर्चा हुई और देश के सामने यह बताने का प्रयास हुआ कि कांग्रेस विरासत कर लाना चाहती है, आर्थिक सर्वे कराकर महिलाआें के मंगलसूत्र को हड़पना चाहती है। हालांकि यह अर्थ निकालने का अतिरेक रहा फिर भी चुनाव की राजनीति में इसी प्रकार के अर्थनिकाले जाते हैं। दूसरे चरण के मतदान के बाद आरक्षण का विषय तेजी से उभरा है। प्रधानमंत्री मोदी ने कांग्रेस द्वारा विभिन्न राज्यों जिनमें उसकी सरकार है ओबीसी की आड़ लेकर मुस्लिम समुदाय को आरक्षण देने का विषय उठाया है। अब इस पर तेजी से बहस चल रही है। कांग्रेस कह रही है कि भाजपा कभी भी आरक्षण की समर्थक नहीं रही जबकि गरीबों को दस प्रतिशत आरक्षण भाजपा के समय ही दिया गया था। एससी-एसटी आरक्षण दस साल के लिए फिर से मोदी सरकार के कार्यकाल में ही बढ़ाया गया। उस समय विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद थे। कांग्रेस की सरकारों ने भी इसे इसी प्रकार से बढ़ाया था। लेकिन इस सच को स्वीकार करना होगा कि एससी-एसटी आरक्षण संविधान सभा का दिया हुआ है। जबकि ओबीसी आरक्षण के विरोध पर राजीव गांधी की सरकार गिर गई थी और उस समय की वीपी सिंह सरकार ने इसे लागू किया था। ऐसे में कांग्रेस का आरक्षण देने का प्रयास केवल मुस्लिम समाज के लिए ही हुआ है ओबीसी के लिए नहीं।

आरक्षण राजनीति का सबसे ज्वलंत विषय है। आरक्षण से स्तर ऊपर उठाने का एक प्रयास तो है ही बहुंसख्यक समाज को जातियाें के आधार बांटने में भी वह सहायक होता है। अन्य पंथों में जाितयां इससे अधिक क्रुर हैं इसके बाद भी उनकी चर्चा इस हिसाब से नहीं होती जिस प्रकार से बहुसंख्यक समाज की जातियाें की की जाती है। आरक्षण जाितयों को वोट बैंक बनने का आधार भी है। इसके कारण मायावती पैदा हो सकती है तो अनुपि्रया भी। लालू-मुलायम भी यादव आधारित राजनीति करते तो हुड्डा भी हैं जो जाटों के नेता बन गये हैं। इसलिए जाितयां कुछ नेताओं की अपनी बपौती होती जा रही हैं। समय-समय पर कुछ नेता ऐसे होते हैं जब जाितयों को बंधन टूटता है और सत्ता का बड़ा बदलाव होता है। जेपी आन्दोलन के समय यह गठबंधन टूटा था तब इंिदरा गांधी का ताकतवर किला ढ़ह गया था। 2014 में जाितयों का तिलिस्म टूटा तो देश को ताकतवर सरकार मिल गई। मोदी सरकार को दस साल का कार्यकाल इतनी उथली बातों पर चर्चा करने का नहीं है। जिस प्रकार की विपक्ष कर रहा है। मोदी सरकार का कार्यकाल कूटनीति, अर्थव्यवस्था मतलब व्यापार और सांस्कृतिक विरासत के लिए याद करना चाहिए। मोदी सरकार का कार्यकाल यूक्रेन युद्ध के बीच से भारतीय छात्रों को निकालने और कतर से आठ पूर्व सैनिकों को फंासी की सजा के बाद भी सकुशल लाने के िलए याद करना चाहिए। पांचवे स्तर की अर्थव्यवस्था के साथ ही महाशक्तियों के द्वारा भारत से ली जाने वाली सलाह के लिए याद करने और चर्चा करने का है। विपक्ष इस ऊंचाई पर खुद को खड़ा ही नहीं कर पा रहा है। इसलिए वह अथली बातें चुनाव में कर रहा है।

इसलिए मोदी देश की राजनीति को अपने हिसाब से तय कर रहे हैं। विपक्ष कम मतदान को मोदी की पराजय के रूप पेश करके खुश होने का प्रयास कर रहा है। जबकि सच यह है कि विपक्ष के पक्ष में होने वाला मतदान िगर रहा है। भाजपा का मत प्रतिशत पिछले बार से कम रहने वाला नहीं है। मोदी ने पहले चरण तक अपनी उपलब्धियों को बताने का प्रयास किया। दूसरे चरण में कांग्रेस की चुनरी खींचने का काम किया और अब तीसरे चरण में आरक्षण पर कांग्रेस को बेनकाब करने का प्रयास किया है। पूरी भाजपा इसी नीति पर चल रही है। संविधान धर्म के आधार पर आरक्षण की अनुमति नहीं देता है जबकि कांग्रेस ने पतली गली से रास्ता निकाल कर मुस्लिम आरक्षण का दरवाजा खोला है। इसे पहले सर्वोच्च न्यायालय ने निरस्त कर दिया था। फिर से रास्ता निकाला गया और एक बार और मुस्लिम समाज को आरक्षण देने का काम किया गया है। मोदी ने इसे देश के सामने रखते हुए कांग्रेस के मुस्लिम प्रेम को उजागर किया है। आरक्षण के मामले में कांग्रेस की नीति हमेशा विरोधाभाषी रही है। संविधान सभा ने एससी-एसटी आरक्षण का प्रावधान किया तब यह साफ कहा था कि अगली बार इसे बढ़ाने से पहले इस बात की समीक्षा होना चाहिए कि इसका लाभ कितना हुआ? लेकिन आरक्षण से जाितवाद को इस कदर जोड़ दिया कि कोई भी सरकार इस आेर देख ही नहीं पा रही है। जबकि इसमें बनी क्रमीलेयर ने आरक्षण के बीच भी घराने पैदा कर दिये। जो अब उनका शोषण कर रहे हैं। ओबीसी आरक्षण के लिए बनाये गये मंडल आयोग की रिपोर्ट को राजीव गांधी सरकार ने स्वीकार नहीं किया तो वीपी सिंह से उस सरकार को गिरा दिया था।

अब इस चुनाव में नरेन्द्र मोदी ने आरक्षण के विषय को बहुत ही चतुराई से उठाया है। अब गरीब के आरक्षण की बात हो रही है। अब आरक्षण सही हाथों को और जरूरत वाले हाथों को मिले इसकी भी बात होने लग गई है। आरक्षण समस्या नहीं बने और जिनको आरक्षण दिया गया था उसका उद्देश्य पूरस हो इस दिशा में काम होना जरूरी है। इसका डर खत्म होना चाहिए। महंगाई व अर्थव्यवस्था पर तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मुझे दिये गये एक साक्षात्कार में कहा था कि जब कोई नेता महंगाई के वृद्धि के जोखिम का सामना करने का सहास जुटायेगा भारत की अर्थव्यवस्था में बढ़ोतरी हो जायेगी। उन्होंने यह भी कहा था कि भारत की राजनीति इस प्रकार की नहीं है कि विकास की स्थिति पर कोई लाभ लेने से खुद को रोक ले और इस प्रकार के विषय नहीं उठाये। आज के संदर्भ में इसे देखा जाये तो देश में गंभीर नेताओं का अकाल सा आ गया है। इस अकाल की अधिक व्याख्या करने की जरूरत समय के हिसाब से आयेगी। लेकिन जब नेताओं में देश के लिए विजन खत्म होकर अपने स्वार्थ और विरासत के िलए आ टिकता है तब देश में इसी प्रकार की राजनीति होती है।

इसलिए देश में भाषा की गिरावट का दौर है। देश के बारे में विचार करने की बजाए सत्ता तक कैसे पहुंचा जाये इसके शार्टकट खोजे जा रहे हैं? महत्वपूर्ण विषय को विवाद बनाकर उसके महत्व को कमतर किया जा रहा है। देश का इतिहास नहीं रहा कि कभी शत्रु देश को ताकतवर बताकर अपने देश की सरकार और सेना को मनोबल गिराया गया हो। लेकिन आज सरकार के इकबाल और प्रभाव को कम करने के िलए यह भी किया जा रहा है। यह आम चुनाव देश की आजादी के सौ साल पूरे होने की संरचना करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। पंडित नेहरू ने देश की संरचना का सपना देखा था। लेकिन उसमें भारत की संस्कृति श्ाामिल नहीं थी। गांधी ने आजादी का सपना देखा था लेकिन उसमें विभाजन के बादभी मुस्लिम समाज के लिए स्थान रखा गया।इंिदरा जी ने देश को सशक्त बनाने का सपना देखा था लेकिन वे सत्ता की आदि होकर आपातकाल में उलझ गई। अटल जी ने देश को संपन्न बनाने का सपना देखा लेकिन उन्हें बहुमत और समय नहीं मिला। लेकिन वे पोखरण करके भारत को महाशक्ति बनाने का राह दे गये। नरेन्द्र मोदी देश के लिए अगले एक हजार साल का सपना देख रहे हैं। उसके लिए योजनाएं बना रहे हैं। नीति बना रहे हैं और जिनको विरासत सौंपना है या जो विरासत संभालेंगे उनके लिए विजन तैयार कर रहे हैं। इसलिए विपक्ष हलके और अथले विषयों में उलझा हुआ है और मोदी विजन दूर तलक जा रहा है। आरक्षण की अपनी जरूरत है लेकिन किनको आरक्षण मिलना चाहिए? यह सवाल तो है। जिन्होंने लड़कर पाकिस्तान ले लिया उनकाे या जिन्होंने आजादी के लिए अपना सबकुछ न्योछावर कर दिया उनके लिए। आरक्षण का बवाल कुछ इस कदर वातावरण बनाने जा रहा है कि इस चुनाव की फिजा ही बदलने वाली है। देश की राजनीति को लेकर अभी से चिंता करने की जरूरत है। अन्यथा स्वार्थी समूहों का राजनीति पर कब्जा हो जायेगा और अपने वोट बैंक का संसाधनों को बांटने का काम शुरू हो सकता है। जो देश के लिए अहितकारी होगा।
(लेखक हिंदी पत्रकारिता फाउंडेशन के चेयरमैन हैं) संवाद इंडिया

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