‘राहुल’ के हाथ से निकल गई अब घर की भी ‘चाबी’

भोपाल। मुट्ठी से रेत सरक रही है। मुट्ठी को जितना बंद कर रहे हैं वह उतनी ही खाली हो रही है। जब पता चलेगा कि मुट्ठी खाली है तब होने वाली प्रतिक्रिया से बनने वाली परिस्थितियों की कल्पना करिये। समूची कांग्रेस राहुल गांधी को सहानुभूति का पात्र बनाना चाहती है। मानहानि मामले में दो साल की सजा हुई तो उनकी लोकसभा की सदस्यता चली गई। परम्परागत सीट अमेठी में जनता ने हरा दिया था वायनाड ने प्रवेश दिलाया उसे वे खुद नहीं संभल पाये। सहानुभूति के लिए या तो शूरवीर बनना होता है या दीनहीन। राहुल दोनों चरित्रों में फिट नहीं बैठते हैं। जब कांग्रेस का अध्यक्ष पद छोड़ा था तब सहानुभूति नहीं मिली थी तो समझना चाहिए था कि मानहानि मामले में कैसे मिल जायेगी। राहुल का किरदार तो वही है। प्रयोग के नाम पर सांसद के नाते मिला मकान भी छोड़ दिया गया। रेत मुट्ठी से सरक रही है। मां के हाथ में कांग्रेस की अध्यक्षी थी तब बेटा ही वास्तव में अध्यक्ष था। अब मां वयोवृद्ध हो चुकी हैं। बेटा राजनीति करने की बजाए नीचा दिखाने का कारखाना चला रहा है। पार्टी के नेताओं को भी नीचा दिखा रहे हैं और प्रधानमंत्री को भी। ये नरेन्द्र मोदी हैं चित्त करना जानते हैं फिर दांव कोई भी लगाना पड़े? समझ में यह नहीं आता कि जिस दांव से कांगेस सत्ता पाना चाहती है वह चल नहीं रहा तो उसकी जिद पर क्यों अड़ी है, नया दांव चल सकते हैं?

लगता है कि कांग्रेस अब पुरानी पार्टी हो गई। दुर्बल भी। उसे संभालने वाले कंधे भी कमजोर हैं। देश की राजनीति की तासीर बदल गई है। पहले घराने चलते थे अब नहीं। पहले वोटों का समूह था अब समीकरण बदल गये। किसी के हाथ में पक्का कुछ नहीं है। मोदी के आने के बाद अल्पसंख्यक बनाम बहुसंख्यक वोट बैंक हो गये हैं। अभी तक सत्ता की चाबी अल्पसंख्यकों के यहां से उठाना पड़ती थी, अब बहुसंख्यकों के यहां रखी हुई है। भाजपा वाले इस घर की राह जानते भी हैं और राह नापते भी रहे थे। गैर भाजपाई न आते तो चलता। नीचा दिखाने का एक भी मौका नहीं छोड़ते थे, इसलिए चाबी मांगने की हिम्मत नहीं हो रही है। इसलिए सहानुभूति की राजनीति करने की योजना बनाई। रणनीतिकार रात में महल तैयार करते हैं राहुल सुबह खेलने की जिद्द करके उसे गिरा देते हैं। मोदी-शाह हैं कि धीरे-धीरे असर करने वाला इन्जेक्शन लगा रहे हैं जो न तो दर्द करता और न पता चलता है। असर भी इतना धीरे-धीरे हो रहा है कि बीमार हैं यह पता ही नहीं चल रहा है। समूचा विपक्ष भ्रष्टाचार के मामले में नाप दिया और न शोर न आन्दोलन।

खुद ही एक के बाद एक करके कांग्रेसी ही राहुल गांधी को जिम्मेदारियों से मुक्त करते जा रहे हैं। जनता भी मुक्त करती जा रही है। तीन राज्यों में सरकार बची है। दो में चुनाव होने वाले हैं ऊंट किस करवट बैठेगा पता नहीं है। छत्तीसगढ़ में अच्छी उम्मीद है लेकिन राजस्थान और मध्यप्रदेश में फसल खराब है। ऐसे में राहुल गांधी पार्टी के तारणहार होंगे या अपनी रही सही साख बचायेंगे? मुट्ठी की मिट्टी सरक रही है और ताश के पत्तों का महल धराशाही हो रहा है। जो रणनीतिकारों काे नहीं पता उसकी जानकारी औरों को कैसे होगी, यह खास बात है। लेकिन इतना जरूर है कि राहुल सहानुभूति पाने के चक्कर में खो अधिक रहे हैं!

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