भारत के मूल चरित्र पर राजनीति का केंद्रित होना अच्छी बात…..नेहरू का इंडिया बनाम मोदी का भारत

इन दिनों भारतीय राजनीति में संविधान और आरक्षण को लेकर आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला चल रहा है। अभी तक यह बात किसी की समझ में नहीं आ रही है कि आज की राजनीतिक परिस्थितियों में संविधान को खत्म करने या आमूल-चूल परिवर्तन करने की कौन सी आवश्यकता है? इसके बाद ही यह चर्चा शुरू हुई है कि भारतीय संविधान में वे संशोधन किये जा सकते हैं जो भारतीय संस्कृति, चरित्र और आस्था के अनुरूप हों।

सुरेश शर्मा । इन दिनों भारतीय राजनीति में संविधान और आरक्षण को लेकर आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला चल रहा है। अभी तक यह बात किसी की समझ में नहीं आ रही है कि आज की राजनीतिक परिस्थितियों में संविधान को खत्म करने या आमूल-चूल परिवर्तन करने की कौन सी आवश्यकता है? इसके बाद ही यह चर्चा शुरू हुई है कि भारतीय संविधान में वे संशोधन किये जा सकते हैं जो भारतीय संस्कृति, चरित्र और आस्था के अनुरूप हों। जब संविधान सभा संविधान के प्रावधानों पर चर्चा कर रही थी तब भारत के मूल चरित्र को समझने वाले नेताओं ने जिन बातों को उठाया था उनका समावेश उतना नहीं हो पाया जो इससे विरोधी विचारधारा के नेताओं की बातों को सामावेश हुआ है। आज जब हिन्दूस्थान इंडिया के स्थान पर भारत बनने की ओर अग्रसर हो रहा है तब इस प्रकार की आशंकाओं का उत्पन्न होना स्वभाविक है। इन आशंकाओं का मतलब यह कतई नहीं हो सकता है कि संविधान समाप्त हो जायेगा या आमूल-चूल बदलाव हो जायेगा। इसको प्रमािणत इसी बात से किया जा सकता है कि भारतीय दंड संहिता को भारतीय न्याय संहिता में बदला गया तब कौन से ऐसे पावधान जोड़ दिये गये जिससे संविधान बदलने जैसा संदेश मिलता हो। इसके बाद भी जब बाबा साहेब का बनाया हुआ संविधान भारत के मूल हिन्दू समाज को समेटने के लिए बाद में संशोधित किया जा सकता है तब उसे सुधारने के लिए बदला जा सकता है। इसका प्रमाण 42वें संविधान संशोधन को जनता पार्टी की सरकार ने सुधारा था। इसका मतलब यह तो नहीं है कि उन्होंने बाबा साहब के संविधान को नकार दिया या रद्दी की टोकरी में डाल दिया था। जब भी कोई नई विचारधारा की सरकार बनती है अपने विचार के आधार पर कानून तो बनाती ही है। धारा 370 को हटाने की भांति कुछ कानूनों की अपेक्षा देश को है।

आजाद भारत का स्वरूप लोकतांत्रिक गणराज्य का था जिसे मौका मिलने पर पंथनिरपेक्ष कर दिया गया। पंथनिरपेक्ष करने के बाद भी राजनीतिक इच्छाओं का समन नहीं हो पाया और इसी प्रकार के प्रयास होते रहे जो पंडित जवाहर लाल नेहरू ने शुरू किये थे। संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ था। लेकिन 1951 में ही हिन्दू धर्मदान एक्ट 1051 बनाया गया। इसमें राज्यों को और व्यापक अधिकार दिये गये। दक्षिण में हिन्दू मंदिरों को मुगल नहीं लूट पाये थे इसलिए मद्रास सरकार और आन्ध्रा की सरकार ने पहले ही झटके में हिन्दू मंदिरों का अधिग्रहण कर लिया। अंग्रेजों की जो नीति थी उसे ही पंडित नेहरू ने आगे बढ़ाया। यह भी उस स्थति में जब भारत का बंटवारा धर्म के आधार के आधार पर हुआ था। इसके आगे हिन्दू विवाह अधिनियम, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, और हिन्दू अल्पसंख्यक और संपत्ति अधिनियम बनाये गये। कानून के शिकंजे में केवल हिन्दू समाज को बांधा गया। इसमें बू यह आती रही है कि सामाजिक विकास के मामले में उसे रोकने का प्रयास किया गया। वहीं वक्फ अधिनियम और गुरूद्वारा प्रबंधन समिति बनीं। मस्जिद और चर्च को सरकारी नियंत्रण से मुक्त रखा गया। इसके बाद भी पुछल्ला यह कि भारत पंथनिरपेक्ष देश है।

पंडित नेहरू के निधन के बाद इंदिरा गांधी की नीति में भी कोई बदलाव नहीं आया। उन्होंने तो आपातकाल में जनसंघ और भाजपा की शक्ति को पहचान लिया था इसलिए प्रस्तावना में पंथनरिपेक्ष जोड़ करके संविधान की आत्मा को ही बदल दिया था। 1951 में नेपाल के राजा त्रिभुन महाराज ने भारत के प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के सामने प्रस्ताव दिया था कि भारत में हिन्दू अधिक संख्या में निवास करते हैं और नेपाल हिन्दू राष्ट्र है। हम भारत में इसका विलय कर लेते हैं। कारण यह बताया जाता है कि वहां पर वामपंथ का बढ़ता प्रभाव और चीन की दखल से आने वाले समय में नेपाल की भूगाेल व इतिहास बदल सकता है। लेकिन पंडित नेहरू ने प्रस्ताव को इस कारण अस्वीकार कर दिया क्योंकि ऐसा करने से भारत में हिन्दू समाज की संख्या बढ़ जायेगी? जो उनके एजेंडे के विपरीत है। इंदिरा जी के बाद नरसिंह राव सरकार ने इसी प्रकार की मानसिकता और नीति जारी रखी। उन्होंने 1991 में पूजा स्थल अधिनियम बनाया जिसमें प्रावधान किया गया था 15 अगस्त 1947 के समय जो धार्मिक स्थल है उसके बाद उसकी प्रकृत्ति और स्वभाव को नहीं बदला जायेगा। इसमें राम मंदिर को मुक्त रखा गया था क्योंकि उसका आन्दोलन चल रहा था। मथुरा और काशी के विवाद काे हिन्दू अधिकार से वंचित रखने का यह प्रयास था।

समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने कारसेवकों पर गोलियां चलवाकर अपनी राजनीतिक विचारधारा को साफ कर दिया था। उन्हें मुल्ला मुलायक के नाम से उपभाष्य किया गया था। हालांकि यह विवादित उपनाम था। इसके बाद देश की मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति से कांग्रेस का एकाधिकार खत्म होता चला गया। इसी प्रकार की राजनीति राष्ट्रीय जनता दल के संस्थापक लालू प्रसाद यादव की भी रही है। वे तो वोटों की राजनीति में संविधान की भावना का भी उल्लंघन करते हुए कह रहे हैं कि मुसलमानों को अारक्षण देना चाहिए। भारत की राजनीति जिस दिशा और धारा में चली गई उसके बाद नरेन्द्र मोदी का सत्ता कालखंड आया है। इसमें सरकार की मानसिकता में बदलाव आया है। संस्कार विचार में बदलाव आया है। मोदी ने हा था कि आज भारत का प्रधानमंत्री वह व्यक्ति है जिसका जन्म आजादी के बाद हुआ है और वह यह मानता है कि गुलामी की मानसिकता का अब भारत के विचारों से अंत होना चाहिए। मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति को समाप्त करने की दिशा में देश की मानसिकता बनना शुरू हुई और लगातार बहुमत वाली सरकार देश को मिली। राजीव गांधी के निधन के बाद देश को गठबंधन सरकार के युग में प्रवेश करना पड़ा और यह क्रम 2014 तक चलता रहा। 2014 से माेदी सरकार हालांकि राजग की सरकार है लेकिन उसमें भाजपा के लोकसभा स्पष्ट बहुमत है।

2014 के बाद से मोदी सरकार ने सरकारी तंत्र को कुछ इस प्रकार से कसा है कि उसे तुष्टिकरण की व्यवस्थाओं से बाहर निकलना पड़ा है। सरकार की योजनाएं भेदभाव रहित हैं लेकिन बहुसंख्यक समाज की अवहेलना का दौर समाप्त हो गया है। कानूनों में भी ऐसा ही रूख दिखाई दे रहा है। धारा 370 हटाने और तीज तलाक जैसे क्रान्तिकारी निर्णय यह संदेश देने के िलए पर्याप्त हैं कि देश में आने वाले समय में उन कानूनों की खात्मा या बदलाव हो सकता है जिसकी चर्चा हिन्दू समाज आजादी के बाद से ही करता आया है। उसे किसी भी गैर भाजपाई सरकार ने समझने का प्रयास भी नहीं किया। इस समय संविधान बदलने या खत्म करने की बात के पीछे कुछ इसी प्रकार के डर का तानाबाना है। भारत की संस्कृति को बहुत पीछे कर दिया गया था। जिसका फिर से उदय हुआ है। राम मंदिर का निर्माण इसका अनुपम उदाहरण है। विपक्ष की मानसिकता इसी से दिखाईदेती है कि वह मंदिर निर्माण को बकवास तक कह रहा है। उसका विरोध करके वोट सुरक्षित करने की राजनीति तो आम बात दिखाई दे रही है। इसका अभिप्राय यह नहीं है कि यह सामाजिक द्वंद्व की स्थिति बन रही है। लेकिन इसके प्रयास करने का क्रम भी है। भारत सरकार इसके प्रति भी सजग है। मोदी सरकार के कानूनों का जिस गति और मानसिकता से विरोध किया जाता रहा है उसी के कारण सरकार यह मान ख्ुकी है कि विवाद को हवा दी जा सकती है। वह सर्त्तक है।

इसीलिए मोदी कालखंड में हिन्दूस्थान को नेहरू जी के द्वारा इंडिया बनाया गया था भारत बनाने का प्रयास जारी है। प्रसीडेंट ऑफ इंडिया प्रसीडेंट ऑफ भारत हो चुकी हें। टीम इंडिया टीम भारत होती जा रही है। प्रधानमंत्री सहित उन हवाई जहाज पर भारत लिखा दिखाई दे रहा है जिसमें वीवीआई यात्रा करते हें। जो पहले इंडिया लिखा होता था। यह भारत वाला परिवर्तन भारत के मूल चरित्र को स्थापित करने का प्रयास है। इसी का विरोध चुनाव के प्रचार में दिखाई दे रहा है। अनेकों उदाहरणों से यह लगता है कि भारत का जनमानस इस बात को समझने लगा है कि नेहरू ने भारत का विकास किया, आधुनिक बनाया लेकिन सांस्कृतिक रूप से बिगाड़ दिया। अब मोदी काल में जिस धारा का उदय हुआ है उसे आजादी के समय से ही लागू होना था जिसमें विकास भी है, आधुनिकता भी है और संस्कार भी हैं।

(लेखक हिंदी पत्रकारिता फाउंडेशन के चेयरमैन हैं) संवाद इंडिया

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