पंडित नेहरू के बाद तीन बार चुनाव जीत बने प्रधानमंत्री….आजाद भारत में मोदी ने रचा इतिहास

सभी प्रकार की आशंकाओं को तोड़ते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तीसरी बार देश के प्रधानमंत्री की शपथ लेकर सरकार की कमान संभाल ली। पंडित जवाहरलाल नेहरू के बाद किसी भी प्रधानमंत्री ने ऐसा अवसर नहीं प्राप्त किया। नेहरू आजादी के आन्दोलन के नायक थे।

सुरेश शर्मा। सभी प्रकार की आशंकाओं को तोड़ते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तीसरी बार देश के प्रधानमंत्री की शपथ लेकर सरकार की कमान संभाल ली। पंडित जवाहरलाल नेहरू के बाद किसी भी प्रधानमंत्री ने ऐसा अवसर नहीं प्राप्त किया। नेहरू आजादी के आन्दोलन के नायक थे। जनता के बीच उनकी स्वीकार्यता थी। लेकिन उनके बाद देश का कोई भी प्रधानमंत्री लगातार तीसरी बार शपथ लेने की स्थिति में नहीं आया। राजीव गांधी के बाद कोई भी प्रधानमंत्री अपने दम पर बहुमत की सरकार नहीं बना पाया। हालांकि मोदी तीसरी बार बहुमत के करीब ही पहुंच पाये। फिर भी समर्थक दलों के साथ सरकार के रूतबे में किसी प्रकार का कोई अन्तर नहीं आया। शपथ ग्रहण के समय इस बात का अहसास साफ दिखाई दिया। हालांकि गठबंधन सरकार का अपना धर्म होता है इसलिए मोदी की परीक्षा भी इस कार्यकाल में होने वाली है। जिन वादों के साथ तीसरी बार सरकार के लिए जनादेश मांगा गया था उनके बारे में सबका ध्यान रहेगा? इस चुनाव के कई पक्ष हैं। स्पष्ट जनादेश ने मिलने का सरकार के संचालन में कितना असर होगा उसकी चर्चा भी खूब हुई है। समीक्षकों के एक बड़े पक्ष का मानना है कि मोदी को स्पष्ट बहुमत के लिए 32 सांसदों की जरूरत है। इसका प्रबंध कितने दिनों में होगा यह भी इस पर ध्यान लगा हुआ है। यह जल्द पूरा होने वाला आंकड़ा है। ताकतवर विपक्ष की राह जिस दिशा में जाती हुई दिख रही है उसका मोदी को लाभ मिलेगा और सरकार का समर्थन अधिक सार्थक हो जायेगा। शपथ ग्रहण में न जाकर विपक्षी नेताओं ने साथ न चलने का संदेश दिया है वह एक चुनौती और सर्त्तकता का संदेश है।

लोकसभा के चुनाव संपन्न हो गये। अठारहवीं लोकसभा के लिए खंडित जनादेश मिला है। 1984 में श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी को सरकार बनाने के लिए एक तरफा जनादेश मिला था। यह जनादेश 1989 में वापस खंडित जनादेश में बदल गया। नवीं लोकसभा में राजीव गांधी को 414 के बाद महज 197 सीटें ही मिलीं। उस समय वीपी सिंह पे सरकार बनाई। इसके बाद सरकारों का बनना और गिरना आम बात हो गई थी। अटल बिहारी वाजपेयी ने दो बार सरकार चलाई। लेकिन 2004 में उन्हें बहुमत नहीं मिला। माना यह जा रहा था कि सरकार बन जायेगी लेकिन इंडिया शाइनिंग का नारा जनता ने स्वीकार नहीं किया। मनमोहन िसंह ने गठबंधन सरकार चलाई। किसी भी दल को कभी भी 200 से अिधक सीटें नहीं मिली। राजीव गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस 244 सीटें जीत पाई थी। अब नरेन्द्र मोदी ने 18वीं लोकसभा में 240 सीटें जीती हैं। चुनाव पूर्व के गठबंधन को मिली 293 सीटों के कारण मोदी तीसरी बार सरकार बनाने में कामयाब हुए और इतिहास रच दिया। अभी तक पंडित नेहरू तीन बार लगातार प्रधानमंत्री बने हैं।

इस आम चुनाव की खास बात यह रही है कि विपक्ष ने मोदी को रोकने के लिए गठबंधन बनाया। क्षेत्रीय दलों ने अपना दबदबा भी दिखाया। तीन राज्यों में कमजोर जनादेश के कारण भाजपा का बहुमत वाला रथ रूक गया लेकिन गठबंधन की सरकार को रोकने के सभी प्रयास विफल हो गये। महाराष्ट्र में महाअघाड़ी का लाभ कांग्रेस ने उठाया। गठबंधन के साथ दलों को उसका भारी नुकसान हुआ। यहां भाजपा को बड़ा नुकसान हुआ? सबसे अधिक नुकसान हुआ यूपी से जहां मुस्लिम यादव गठजोड़ हुआ। आरक्षण खत्म करने के भ्रम ने दलित वोटों को भी इस गठजोड़ का हिस्सा बना दिया और यूपी में भाजपा सबसे बड़ी नुकसान का शिकार हो गई। हरियाणा और राजस्थान में सीटें कम हुई। इस कारण भाजपा बहुमत से 32 सीट कम रह गई। गठजोड़ की चौकाने वाल रणनीति यह भी रही कि प्रधानमंत्री मोदी बनारस में कुछ देर पीछे चलने के बाद महज डेढ़ लाख के अन्तर से अपना चुनाव जीत पाये। यह कहा जा सकता है कि अखिलेश यादव ने भाजपा के बहुमत वाले रथ को रोक दिया। अखिलेश ही ऐसे पुत्र वारिश हैं जिन्होंने इस बार लोकसभा के चुनाव में सफलता पाई है। कांग्रेस की सफलता गठबंधन की आड़ में हुई है। यहां पुरूषार्थ का प्रभाव नहीं है।

भाजपा ने करीब दस करोड़ वोट कांग्रेस की तुलना में अधिक प्राप्त किये हैं जो 15.37 प्रतिशत अधिक हैं। सीट के मामले में 141 अधिक है। कांग्रेस को दो निर्दलियों का समर्थन मिला है। इस कारण अंकों में बदलाव आ सकता है। भाजपा को समर्थन देने वाले 2 दल हैं जिसकी सांसद संख्या दहाई में है। जबकि कांग्रेस के साथ चार दल ऐसे हैं जिनकी संख्या इहाई में है। आप के मात्र 3 सांसद पंजाब से जीते हैं। वहां कांग्रेस के साथ गठबंध्नन नहीं हाेने का प्रभाव यह हुआ कि कांग्रेस 7 सीटें जीत गई। जबकि विधानसभा में उसकी करारी हार हुई थी। यह बताने का अर्थ यह है कि आपस में समझौता करके और आपस में लड़कर इंडी गठबंधन ने कुछ सीटें तो प्राप्त की हैं लेकिन सरकार बनाने में भाजपा का कोई घ्टका नहीं दे पाये। गठबंधन पर पहले दिन से कांग्रेस ने कब्जा कर लिया था जिसका लाभ उसे अपने सांसदों की संख्या बढ़ाने में मिल गया। कांग्रेस अब ताकतवर विपक्ष की भूमिका निभाने की स्थिति में आ गई है। लेकिन तकनीक रूप से वह विरोध करेगी या हंगामे का आधाार बनायेगी इसी बात पर सबकुछ निर्भर है। इससे आगे की राजनीति का आकंलन होगा?

लगातार यह संदेश देने का प्रयास किया गया कि नरेन्द्र मोदी सरकार बनाने का नैतिक अधिकार खो गये। लेकिन इस प्रचार ने जनता में कोई खास प्रभाव नहीं डाला। हालांकि इस बार के चुनाव में भ्रम का खेला किया गया था जसिका असर दिखा। यह भी गंभीर बात है कि देश के मुस्लिम मतदाताओं ने भाजपा को कराने की मानसिकता से वोट दिया। वह हर बार ही ऐसा करता है। फिर भी इस बार रणनीति बना कर जो हरा सकता है उसका समर्थन किया गया। इसने भाजपा के विजय रथ को प्रभािवत व कमजोर किया। अब मोदी सरकार बन गई है। तीसरी बार सरकार बनाकर पंडित जवाहर लाल नेहरू के रिकार्ड की बराबरी कर ली गई। मोदी के इस रिकार्ड का महत्व इसलिए भी बहुत है क्योंकि पंडित नेहरू के पास आजादी के आन्दोलन की चमक थी। मोदी के पास अपने काम करने के का आधा रहा है। भारत के विकास को दिशा दी गई। सांस्कृतिक उत्थान दिखाई दिया। यह अलग बात है कि सभी धार्मिक स्थलों पर भाजपा हार गई। लेकिन कुछ राज्यों में उसने जीत का परचत लहराया है।
अब गठबंधन के दो साथियों टीडीपी और जदयू को लेकर भ्रम पैदा करने का प्रयास हुआ। दोनों दलों ने समर्थन देते समय जिस प्रकार का प्रदर्शन किया उससे यह साफ समझा जा सकता है कि आन्ध्र और बिहार अपना हित मोदी के साथ ही देख रहे हैं। मोदी सरकार की अभी तक की खास बात यह रही है कि उसने राज्यों को सरकार किसकी है यह देखकर मदद नहीं की।

कास की जरूरत का ध्यान रखा गया है। मोदी के चुनाव क्षेत्र के एक गांव में सभी काे प्रधानमंत्री आवास का लाभ मिला लेकिन उस पोलिंग बूथ पर एक भी वोट मोदी को नहीं मिला। इसी को सबका साथ सबका विकास कहा जा रहा है। लेकिन सभी भ्रम को तोड़कर मोदी नेतीसरी बार सरकार का गठन कर लिया है। जिस प्रकार एक ही बार में 72 सांसदों को मंत्री बनाया है उससे आत्मिविश्वास दिखता है। विभागों का बंटवारा भी साथ-साथ हो जायेगा यह अनुमान लग रहा है। सबकुछ तय है। पूरे देश को प्रतिनिधित्व दिया गया है। 24 राज्याें की केन्द्रीय मंत्रीमंडल में सहभागिता है। अब काम करने का समय है। सहयोगी दलाें काे साधने का फार्मूला तैयार कर लिया गया है। दोनों को राज्यों को विकास की गति देने के लिए आर्थिक पैकेज देने का निर्णय हो चुका है। इससे यह माना जा रहा है कि सरकार का संचालन पहले की भांति होगा। मोदी की रूतबा वही रहेगा लेकिन वे सबको साथ लेकर चलने का काम भी करते रहेंगे? ऐसा पहले की सरकारों में भी किया था। विपक्ष सरकार को कितना घेर पायेगा इसका प्रमाण सामने आ गया है। अभी शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव पर जेपीसी की मांग करने से विपक्षी दल कांग्रेस की सोच और समझ का पता चल गया। पिछला सदन भंग हो चुका है और नया अस्तित्व में नहीं आया हे। राहुल गांधी ने जेपीसी की मांग कराई जा रही है। ऐसे राहुल गांधी को नेता विपक्ष बनाने का प्रयास किया जा रहा है। मोदी रिकार्ड के उत्साह से काम करने जा रहे हैं विपक्ष को ताकत बढ़ाने का उत्साह है।

संवाद इंडिया (लेखक हिन्दी पत्रकारिता फांउडेशन के चेयरमैन हैं)

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