क्षेत्रीय दलों का जीवन संकट, स्थापित करने वाली नेतृत्व पीढ़ी हुई जुदा

सुरेश शर्मा, भोपाल। क्षेत्रीय दलों का राज्यों में अपना महत्व है लेकिन राष्ट्रीय परिपेक्ष्य में वे कमजोर हो जाते हैं। कई बार भावनाएं उन्हें लोकसभा में भी समर्थन दे देती है। इन दिनों क्षेत्रीय दलों के सामने बड़ा राजनीतिक संकट दिखाई देने लग गया है। शरद पवार के अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद यह सवाल उठा है कि इन क्षेत्रीय दलों का भविष्य अब क्या होगा जब संस्थापक नेताओं का साया उनके साथ नहीं रहा है? कुछ दल तो समाप्त हो गये कुछ महत्वहीन होते दिख रहे हैं। लेकिन जिन नेताओं ने इन्हें स्थापित किया है वे कुछ जरूर जोर मार रहे हैं। इन क्षेत्रीय दलों को लेकर राष्ट्रीय दलों की नीति बिलकुल साफ है। कांग्रेस इनके साथ मिलकर केन्द्र की सरकार पाने का प्रयास कर रही है जबकि भाजपा इनके तोड़कर किसी भी संभावना को समाप्त कर देना चाहती है। इसलिए इन क्षेत्रीय दलों का जीवन संकट साफ दिखाई दे रहा है। आने वाले समय में कोई और प्रभावशाली नेता क्षेत्रीय भावनाओं को भुनाने में सक्षम दिखाई देगा तब बात दूसरी होगी।

पिछले दिनों उम्र दराज मराठा नेता शरद पवार ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख के पद से इस्तीफा दे दिया। यह उनकी सोची समझी राजनीति थी। यह उत्तराधिकार की लड़ाई भी थी जो भतीजे और बेटी के बीच है। शिवसेना की भांति अजीत पवार को डर था कि साथ लिया राज ठाकरे का और कमान दे दी उद्धव को। कहीं ऐसा राकांपा में न हो जाये इसलिए अजीत भाजपा के साथ पींगे बढ़ाने लग गये थे। घर की राजनीति और संगठन को बचाने के लिए शरद पवार को पद कुर्बान करना पड़ा। अब यह विषय अनसुलझा तो रह नहीं सकता। लेकिन यह सवाल उठ गया कि जिन नेताओं ने क्षेत्रीय दल स्थापित किये थे वे जब संगठन से सरपरस्ती हटा लेंगे तब संगठन की ताकत कितनी रहे जायेगी? महाराष्ट्र में शिवसेना को ही ले लीजिए। वहां राज पहले ही बराबर कर रहे थे लेकिन अब तो शिवसेना में विभाजन हो गया और उद्धव सरकार गिर गई। अनैतिक तरीके से जिसे खुद बाला साहब ठाकरे स्वीकार नहीं करते थे सरकार बनाई गई और राजनीतिक अनैतिकता से ही वह गिर गई। शिवसेना बिखर गई और समाप्त होने जैसी स्थिति में आ गई। अब उसे वापस खड़ा करने के लिए किसी को भी बाल ठाकरे का नया किरदार तैयार करना होगा। यही हाल राकांपा का होने जा रहा है। इसलिए महाराष्ट्र में राजनीतिक बदलाव देखन में आयेगा।

दक्षिण के राज्यों में क्षेत्रीय दलों का गठन सिने कलाकरों ने किया था। लेकिन वे अपना अस्तित्व बचाने में कितने कामयाब हुए हैं इसको लेकर सवाल उठ रहा है। एमजी रामचन्द्रन के साथ जयललिता का प्रभाव उनके रहते ही बन गया था। जिस प्रकार कांशी राम के साथ मायावती का प्रभाव बसपा में हुआ था। लेकिन जयललिता के बाद उनकी पार्टी को किसी प्रभावी सिनेस्टार का समर्थन न मिलने से वह चुनाव में हार गई। करूणानिधि भी कमोवेश दक्षिण की फिल्मों के ही एक हिस्सा थे। अब उनके पुत्र मु यमंत्री हैं। लेकिन परिवार में विवाद के बाद पार्टी अपना अस्तित्व कितना रख पायेगी यह देखने वाली बात होगी। आन्ध्रा में टी रामाराव ने तेलगुदेशम पार्टी बनाई थी। वे सरकार में भी आये लेकिन उनके दामाद ने उनसे न केवल सत्ता छीनी अपितु संगठन को भी छीन लिया। लेकिन वे अपना प्रभाव अधिक समय तक नहीं बनाकर रख पाये। और दूसरी अन्य क्षेत्रीय पार्टी ने उसका स्थान ले लिया। लेकिन इसके संस्थापाक वाय एस राजशेखर रेड्डी कांग्रेस के नेता हुआ करते थे। यह पार्टी कितना और आगे जायेगी देखना है। उड़ीसा में बीजू पटनायक और नवीन पटनायक बिना किसी विवाद के काम करने के आदि हैं इसलिए न तो कोई अन्य क्षेत्रीय और न ही किसी भी राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी का वहां प्रवेश हो पाया है। लेकिन अब भाजपा वहां पांव पसारती दिखती है लेकिन उतना दम नहीं है।

पंजाब में प्रकाश सिंह बादल के निधन के बाद अकाली दल का भविष्य भी मझधार में जाता हुआ दिखाई दे रहा है। उनके पुत्र सुखबीर सिंह बादल और उनकी धर्मपत्नी राजग से नाता तोडऩे जैसा घातक काम करके अपना भाग्य पहले ही दांव पर लगा चुके हैं। अब अकाली दल की वापसी का आधार दिखाई नहीं दे रहा है। यही हाल कश्मीर के क्षेत्रीय दलों का है। यदि अलगाववादियों का समर्थन नहीं करे तो पीडीपी का जनाधार समाप्त जायेगा जबकि अब्दुल्ला परिवार की वह धाक नहीं बची है। इसलिए इन क्षेत्रों की क्षेत्रीय पार्टियां कमजोर हो रही हैं। झारखंड में शीबू सोरेन का प्रभाव आज भी है क्योंकि उनके पुत्र सरकार का संचालन कर रहरे हैं। लेकिन भ्रष्टाचार के आरोपों ने उनकी छवि को इतना प्रभावित कर दिया है कि उन्हें घर बचाने के लाले पड़े हुए हैं। असम में क्षेत्रीय दल अपना आधार खो चुके हैं जबकि देश के कई राज्य ऐसे हैं जहां क्षेत्रीय दलों का कभी वर्चस्व नहीं रहा।

क्षेत्रीय दलों की ताकत यूपी और बिहार में देखने को मिलती है। यूपी में सपा और बसपा का प्रभाव है। भाजपा के समग्र हिन्दूत्व के कारण बसपा का प्रभाव दो चुनावों में घटा है। जबकि मुलायम सिंह यादव की राम मंदिर वाली नकारात्मक छवि के कारण मुसलमानों के समर्थन से उनका प्रभाव अभी तक रहा है। पिछले चुनाव मुलायम सिंह की मौजूदगी में हुआ था लेकिन अगला चुनाव अ िालेख यादव की अपनी महेनत पर निर्भर करेगा। तब सपा का इतिहास-भूगोल पता चलेगा। इसी प्रकार बिहार में राजद की राजनीति भी सपा की भांति रहने वाली है। लालू प्रसाद यादव के जीवन में इस चुनाव का बड़ा महत्व था। तेजस्वी का उत्तराधिकार पिता की छाया में प्रभाव तो दिखा रहा था लेकिन सरकार बनाने से वह चूक गया। नीतीश के पलटुराम बनने से सत्ता तो हाथ आ गई लेकिन अगला चुनाव उनकी असल परीक्षा होगा। जिन क्षेत्रीय को स्थापित करने वाले नेता खुद हैं उनका प्रभाव कायम है। इसमें तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी का अपना स्थान है। वे आज भी ताकत रखती हैं। इस प्रकार देश में क्षेत्रीय दलों के लिए आने वाला समय खास अग्रिपरीक्षा का होगा। उत्तराधिकार का अधिकार संगठन में तो वंश के आधार मिल गया लेकिन जनता में तो अपना पराक्रम दिखाना होगा। तभी उत्तराधिकार मिल पायेगा।

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