दिग्विजय-अरूण में बची है जीत की संभावना?

चर्चा यह चल रही है कि कांग्रेस दिग्विजय िसंह को राजगढ़ और अरूण यादव को गुना से टिकिट दे सकती है। दिग्विजय िसंह ने तो प्रचार का श्रीगणेश भी कर दिया है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या अभी तक कांग्रेस दिग्विजय और अरूण में जीत की संभावना देख रही है?

सुरेश शर्मा, भोपाल। चर्चा यह चल रही है कि कांग्रेस दिग्विजय िसंह को राजगढ़ और अरूण यादव को गुना से टिकिट दे सकती है। दिग्विजय िसंह ने तो प्रचार का श्रीगणेश भी कर दिया है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या अभी तक कांग्रेस दिग्विजय और अरूण में जीत की संभावना देख रही है? एक पहले भोपाल से लम्बे मार्जिन से चुनाव हार चुके हैं जबकि अरूण यादव तो नाम कमाने का जतन भिड़ाते दिख रहे हैं।
अभी तक कांग्रेस की ओर से दस प्रत्याशियों के नाम ही सामने आये हैं। बीते दिन आने वाली सूची में शेष 18 नामों के सामने आने की चर्चा थी। एक सीट खजुराहो सपा के लिए समझौते में छोड़ी हुई हे। इसलिए यहां से कांग्रेस का कोई मतलब नहीं रहा है। चर्चा यह चल निकली थी कि दिग्विजय िसंह को पार्टी राजगढ़ से चुनाव लड़वा रही है। 2019 का चुनाव दिग्विजय सिंह भोपाल से प्रज्ञा सिंह ठाकुर के सामने लड़े थे और हार गये थे। अब राजगढ़ में बहुत पानी बह चुका है। उनकी बयानबाजी उनके लिए राजनीतिक रूप से घाटे का सौदा होती रहती है जबकि इससे कांग्रेस लाभ में रहती है। राजगढ़ सीट का स्वभाव हिन्दू समर्थक रहा है। फिर भी दिग्विजय का अपने प्रभाव वाला क्ष्ोत्र भी यही है। ऐसे में कांग्रेस का दाव लगाना बनता है। फिर भी जीत सहज होगी और हार कैरियर पर विराम लगा देगी।

अरूण यादव के नाम की चर्चा गुना से ज्योतिरादित्य सिंधिया के सामने भी लड़ने की है। अरूण का गुना से कोई खास वास्ता नहीं है। केवल यादव वोटों का लाभ लेने का प्रयास किया जा सकता है। सिंधिया को हराने वाला नेता भी केपी यादव ही था। यही विचार कांग्रेस के मन में है और यही विचार अरूण भी कर रहे हैं लेकिन इस विचार के साथ मोहन यादव के जादू को भुला दिया जा रहा है। इसलिए गुना में सिंधिया का अपना प्रभाव और मुख्यमंत्री मोहन यादव का साथ जीत पक्की करता है। ऐसे में अरूण का इस प्रकार का दूसरा प्रयोग राजनीतिक समझ कहां दिखा रहा है। पहले शिवराज के सामने हारना और अब सिंधिया के सामने राजनीतिक आत्महत्या का अर्थ समझ में नहीं आ रहा है?

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