मुस्लिमों की भाजपा से दूरी कब तक?

सत्ता की हैट्रिक बनाने वाली भाजपा को अछूत मानना अनुचित

भारत एक लोकतांत्रिक देश है। आजादी के बाद लोकतंत्र को स्वीकारा गया था। वह भी सर्वानुमति से। यह ज्ञात होते हुए भी बंटवारे के बाद बने पाकिस्तान की सत्ता धार्मिक आधार पर स्थापित होने जा रही है भारत ने खुद को धार्मिक राष्ट्र घोषित नहीं किया। बीच में भी कभी प्रयास नहीं हुए जबकि नेपाल हिन्दू राष्ट्र बनकर यह बता चुका था कि यह भी एक रास्ता है। आजादी के 30 वर्ष यदि कोई बदलाव हुआ तो वह भी पंथनिरपेक्ष लिखकर और साफ परिभाषित करने का प्रयास हुआ। न जो जनसंघ ने और न ही भाजपा ने कभी भी देश के सामने यह वादा किया कि देश को हिन्दू राष्ट्र बनाया जायेगा? संघ की ओर से अखंड भारत की बात की गई जबकि हिन्दू राष्ट्र के बारे में संघ का अभिमत रहा है कि भारत पहले से ही हिन्दू राष्ट्र है और यहां हिन्दू का अर्थ धर्म ने न होकर जीवन पद्यति से है जिसे देश की सबसे बड़ी अदालत भी स्पष्ट कर चुकी है। इसलिए आजादी के बाद भारत में बचे मुस्लिम समाज के मन में भाजपा से दूरी का कारण क्या है? कभी मुस्लिम धर्मगुरू और राजनेताओं ने इस बात को खुलकर कहा ही नहीं? दूरी का कारण भी ठोस नहीं बताया और भाजपा की ओर से कभी साथ लेने का ठोस प्रस्ताव भी नहीं दिया गया। इसका राजनीतिक लाभ उठाने का प्रयास गैर भाजपाई दलों ने तो किया ही मुस्लिम समाज के जन प्रतिनिधियों ने भी किया। कभी ऐसे प्रयास नहीं होने दिये। संघ की ओर से इस प्रकार के प्रयास हुए हैं और उसने एक संगठन इसी काम के लिए बनाया है। यह हो सकता है कि यह इस समाज में प्रवेश का दूसरा रास्ता हो। देश में 92 लोकसभा सीटें ऐसी हैं जहां पर 20 प्रतिशत से अधिक मतदाता इसी समाज के हैं। इसीलिए यह सवाल उठता है कि यह समुदाय भाजपा के करीब आने और भाजपा इसे करीब लाने की सोच रहे हैं या नहीं?

सबसे खास बात यह है कि लोकतंत्र में सत्ता प्राप्त करने की प्रक्रिया होती है जनादेश ले लिया जाये। जनादेश मिलने वाले वोटों से मिलता है। वोटों का आजादी के बाद से ही विभाजन हो चुका है इसलिए वोटों में सेंधमारी किसी भी राजनीतिक पार्टी की सबसे बड़ी चुनौती होती है। यही समस्या कांग्रेस के आजादी के आन्दोलन के बाद सत्ता में रहने के कारण अन्य दलों के सामने रही। इसमें जनसंघ और भाजपा भी एक हैं। यहां खास बात यह है कि आजादी के आन्दोलन के समय एक बात ध्यान में आई कि जो सार्थक प्रयास हो रहे हैं। सभी विचारों के लोगों के मन में आजादी लेने की भावना बलवती हो चुकी है। इसके बाद आजादी मिलने की कोई आशंका बची नहीं थी। ऐसे में देश में ऐसे लोगों के निर्माण की व्यवस्था की जाये जो समाज के हित और राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर काम करने के आदि हो जायें। संघ ने इसी प्रकार के देशभक्ताें का निर्माण करने का काम शुरू कर अपना विस्तार किया। संघ का निर्माण करने वाले लगभग सारे नेता आजादी के आन्दोलन में शामिल रहे और जेल भी गये। संघ के विचार में भारत का निर्माण करने के लिए लोग तैयार करना था इसलिए राजनीति करने वालों ने उसे केवल हिन्दू समाज तक जोड़ दिया और हिन्दू को सनातन तक। इससे राजनीतिक लाभ मिला।

जब डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने संघ प्रमुख गुरू गाेलवरकर से मिलकर जनसंघ की स्थापना का प्रस्ताव दिया तब देश में बहुसंख्यक समाज को एक करके वोट का आधार तैयार किया जाये ऐसा भी तय हुआ था। देश के उन ज्वलंत विषयों के निराकरण का खाका भी देश को बताया गया। यूसीसी और धारा 370 जनसंघ के समय ही तय हो गये थे। वोट की घुसपैठ करने का रास्ता हिन्दू समाज में से होकर ही निकलता था यह खास बात है। भाजपा का गठन होने तक मुस्लिम समाज को यह समझा दिया गया था कि भाजपा अल्पसंख्यक समाज की विरोधी है और उसके सत्ता में आने के बाद देश का अल्पसंख्यक मुस्लिम समाज दोयम हो जायेगा? जबकि पाकिस्तान में हिन्दू समाज को वास्तव में दाेयम दर्जे का नागरिक माना गया। वहां उसकी आबादी दिनोंदिन कम होती गई। आज वह जीरो के बराबर आ गई है। लेकिन भारत के अल्पसंख्यकों के प्रति सहानुभूति दिखाने वाले एक भी दल ने पडौसी देशों की इस स्थिति पर कभी कोई आवाज नहीं उठाई। भारत की राजनीति की इस विडंबना को देखिए भारत का मुसलमान भी पाकिस्तान की इस कारगुजारी के बारे में मौन रहा। इन सभी घटनाओं का राजनीतिक लाभ लिया जाता रहा। एक के बाद एक मुस्लिम समर्थक दल बनते चले गये और अपने-अपने राज्यों में सत्ता का आनंद लेते रहे। तीन राज्यों यूपी, बंगाल और बिहार में मुस्लिम मतदाता सत्ता की चाबी राजनीतिक दलों को देते रहे।

देश में मुस्लिम आबादी 14 प्रतिशत है। देश की 92 लोकसभा सीटें ऐसी हैं जहां 20 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं। 16 सीटों पर ये 50 प्रतिशत से अधिक हैं। 11 सीटों पर 40-50 प्रतिशत, 24 सीटों पर 31 से 40 प्रतिशत और 41 सीटों पर 21 से 30 प्रतिशत मतदाता हैं। 2014 में जब मोदी लहर पर सवार होकर लोकसभा के चुनाव हुए तब लोकसभा में 23 मुस्लिम सांसद चुनकर आये थे। 2019 में यह संख्या बढ़कर 27 हो गई। अब 2024 के चुनाव में संख्या अधिक ही हो सकती है। इस अनुमान से देश की विधानसभाओं में मुस्लिम विधायकों की संख्या को इस टकराहट का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। देश में मुस्लिम जनप्रतिनिधियों की संख्या अपेक्षा से कम है। पिछले समय की राजनीति को देखकर इसमें सुधार की संभावना कितनी और किस प्रकार से देखी जा सकती है यह सवाल सबसे खास है।

देश की राजनीति में इन दिनों भाजपा के ही चर्चे हैं। वही राजनीति के केन्द्र में हैं। दो बार से देश में उसकी सरकार है। हैट्रिक बनाने की संभावना के साथ चुनाव चल रहे हैं। पिछले चुनाव में पश्चिम बंगाल से सौमित्र खान नामक सांसद भाजपा की टिकिट पर ही जीते थे। इसलिए यदि प्रभावशाली नेता भाजपा में आते हैं तब उनके जीतने की संभावना बन सकती है। लेकिन प्रभावशाली नेताओं को समाज भी मतदान करने का हामी भरता है तब भाजपा भी उन्हें टिकिट देन विवश होगी। लेकिन यह सिलसिला शुरू नहीं हो पा रहा है। देश के किसी भी हिस्से समाज की ओर से या विरोधी नेताओं की ओर से कभी सरकार की योजनाओं में सामाजिक भेदभाव के आरोप नहीं लगे। इसलिए इस संभावना को तलाशा जा सकता है। लेकिन भाजपा अपने वोट बैंक काे संभालने का प्रयास करती है तब इस समाज को यह लगता है कि वह उसके प्रति आक्रामक हो रही हे। इसी प्रकार की हवा विपक्षी नेता बनाते हैं। तिल का ताड़ राजनीति में बनता ही है। लेकिन कोई भी राजनीतिक दल अपना वोट आधार तो संभालेगा ही। आप देते नहीं हैं और देता है उनसे मिलने पर गुस्सा होते हैं यह फार्मूला तो करीब नहीं आने देगा। ऐसे में यूपी के बाद बंगाल और उसके बाद कर्नाटक में जिस प्रकार का प्रदर्शन अल्पसंख्यक समाज ने किया है। भाजपा को कराने के िलए एक जगह तृणमूल को और दूसरी जगह कांग्रेस को वोट दिया है। उसका खुलकर प्रदर्शन भी किया है। यह तो करीब आने का रास्ता नहीं हो सकता है। इसलिए यह नेताओं और धर्म गुरूओं का नहीं आम लोगों के दिमाग बदलने का विषय है। उन्हें देश की जरूरतों के बारे में बताना होगा।

भाजपा ने पसमांदा मुसलमानों के करीब आने का प्रयास किया है। उनकी दशा सुधार कर अपने साथ जोड़ने का प्रयास किया है। उससे रास्ता निकल सकता है। आजादी के 77 बरस बाद यह तो नहीं हो सकता ना कि बंटबारे के बाद भारत के साथ रहने का वादा करने वाला मुस्लिम समुदाय आमने-सामने आने का प्रयास करे। इस आमने-सामने का अर्थ उदारता दिखा कर भारत की आस्था वाले तीन पूजा स्थलों को देने की आगे से पहले करने से है। इस शर्त के साथ पहले करने से भी है िक इसके बाद बस। यह नारा नहीं लगेगा कि जहां खुदा है वहां भगवान है। यहां खुदा को खुदा ही रहने दिया जाये खुदा को खुदाई से न जोड़ा जाये। यह बंद हो जायेगा तो रास्ता दिखने लगेगा। इस देश के वैभव के बारे में जितना बहुसंख्यक समाज सोचता है उतना ही अल्पसंख्यक समाज भी सोचता हे। लेकिन दोनों अलग-अलग सोचते हैं। यदि एक साथ आकर सोचने लग जायेंगे तो राजनतिक दूरियां अपने आप खत्म होने लग जायेंगी। जब भाजपा सत्ता की हैट्रिक लगाने के करीब दिख रही है तब यह सवाल और तािर्कक हो जाता है। कौन और कब दो कदम चलता है? संवाद इंडिया

(लेखक हिंद पत्रकारिता फांउडेशन के चेयरमैन हैं)

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