सेना की आर्टिलरी रेजिमेंट कैसे काम करती है? जानें, भारतीय सेना के लिए कितनी जरूरी है

नई दिल्ली
भारतीय सेना की आर्टिलरी रेजिमेंट में महिला अधिकारियों के पहले बैच को कमीशन किया गया है। ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी (OTA) चेन्नई में सफल प्रशिक्षण के बाद ये अधिकारी सेना आर्टिलरी का हिस्सा बन गई हैं। आर्टिलरी रेजीमेंट का भारतीय सेना का एक महत्वूपर्ण हिस्सा माना जाता है। आर्टिलरी रेजीमेंट जो कि भारतीय सेना की दूसरी सबसे बड़ी शाखा है, इसका काम जमीनी अभियानों के समय पर सेना को मारक क्षमता देना है। इसे दो हिस्सों में बांटा गया है। पहले हिस्से में घातक हथियार जैसे कि मिसाइल, रॉकेट्स, मोर्टार, तोप, बंदूक आदि शामिल हैं। तो वहीं दूसरे में ड्रोन, रडार, सर्विलांस सिस्टम होता है। आर्टिलरी रेजिमेंट की शुरुआत 28 सितंबर को 1827 में हुई थी। इसे रॉयल इंडियन आर्टिलरी ऑफ ब्रिटिश के नाम दिया गया था। इसीलिए 28 सितंबर को आर्टिलरी डे के रूप में मनाया जाता है। इसके बाद 15 अगस्त 1944 को आर्टिलरी भारतीय रेजीमेंट का हिस्सा बन गई।

आजादी के समय भारत के पास इतनी ब्रांच आईं
आजादी से पहले भारतीय आर्टिलरी रेजिमेंट में फील्ड, मीडियम, एयर डिफेंस, काउंटर बॉम्बार्डमेंट, कोस्टल, एयर ऑब्जर्वेशन पोस्ट और सर्वे ब्रांच शामिल थे। फिर जब 1947 में विभाजन हुआ तो रॉयल इंडियन आर्टिलरी को तोड़ दिया गया। भारत के हवाले साढ़े अठारह रेजीमेंट आवंटित किए गए जबकि बाकि के साढ़े नौ यूनिट पाकिस्तान के पास चली गई थीं।

कारगिल युद्ध में दुष्मनों के छक्के छुड़ाए
भारतीय सेना की आर्टिलरी रेजिमेंट की ताकत का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि ये रेजिमेंट ने 1999 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए कारगिल युद्ध में कुल 2,50,000 गोले और रॉकेट दागे थे। इसके साथ ही 300 से अधिक तोपों, मोर्टार और रॉकेट लॉन्चरों ने रोज करीब 5,000 बम फायर किए थे। इसमें आर्टिलरी बैटरी से रोज एक मिनट में एक राउड फायर किया गया था।

कई यूनिट में बांटी गई है आर्टिलरी रेजिमेंट
आर्टिलरी रेजिमेंट को कार्य के हिसाब से कई यूनिट में बांटा गया है। इसमें लाइट, फील्ड, मीडियम, मिसाइल, रॉकेट व साटा बैट्रीज जैसी रेजिमेंट शामिल हैं। आर्टिलरी की इस समय तीन डिविजन हैं। इनमें एक 40 एआरटी जो कि अम्बाला में है, दूसरी एआरटी पुणे और तीसरी 34 एआरटी जो कि अलवर राजस्थान में है।

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