देश विरोधी ताकतों की गोद में बैठकर गोदी मीडिया का प्रलाप….!

प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर विशेष

रवीन्द्र वाजपेयी। आज विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस है। दुनिया भर में पत्रकारों के संगठन लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की गरिमा और सम्मान के लिए अपनी एकजुटता का प्रदर्शन करेंगे।1993 में संरासंघ द्वारा इस दिवस की शुरुआत की गयी थी। दूसरे महायुद्ध के बाद पूरी दुनिया में उपनिवेशवाद दम तोड़ने लगा और एक के बाद एक देश आजाद होते चले गए जिनमें ने अधिकांश ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनाया, हालाँकि कालान्तर में उनमें से कुछ में तानाशाही ने पैर जमा लिए जबकि कुछ में साम्यवादी शैली का सीमित प्रजातंत्र स्थापित हुआ, जिसमें लिखने, पढ़ने और  बोलने की आजादी पर पहरे बिठा दिए गए। लेकिन भारत जैसे अनेक देश ऐसे हैं जिनमें समाचार माध्यमों को संविधान के अंतर्गत पूरी तरह से स्वतंत्रता दी गई। इसका एक कारण ये भी था कि आजादी की लड़ाई के तमाम नेता सक्रिय रूप से पत्रकारिता से जुड़े रहे। महात्मा गांधी और पंडित नेहरु जैसों ने तक अख़बार शुरू किये। गांधी जी तो अपने अख़बार में नियमित लिखते भी थे। आजादी के बाद कांग्रेस की सत्ता आने पर अनेक नेता वैचारिक मतभेदों की वजह से उससे अलग हो गये और अखबार के जरिये अपने विचारों को जनता के बीच प्रसारित करने लगे। डा. राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, दीनदयाल उपाध्याय, चंद्रशेखर जैसे नेताओं ने अखबार चलाये या उनमें लेखन करते हुए लोकतंत्र की जड़ें मजबूत करने में योगदान दिया।

राजनीतिक दलों ने भी अपने मुखपत्र निकाले जिनके जरिये वे अपनी नीतियों और सिद्धांतों का प्रचार करते रहे। इसके अलावा बड़े औद्योगिक घराने भी समाचार पत्र और पत्रिकाओं का प्रकाशन करने लगे।हालांकि उनका उद्देश्य व्यावसायिक रहा किन्तु आजादी के बाद के दो दशकों तक उन प्रतिष्ठानों में काम करने वाले सम्पादक काफी स्वतंत्र थे जिससे उन प्रकाशनों की नीयत पर सवाल नहीं उठे। लेकिन इंदिरा गांधी के सत्ता में आने के बाद जब प्रतिबद्ध न्यायपालिका की चर्चा शुरू हुई उसी समय से समाचार माध्यमों पर दबाव बनाने की कार्ययोजना भी बनी। जिसके अंतर्गत कभी साम्प्रदायिकता तो कभी किसी और बहाने अपनी आलोचना करने वाले समाचार पत्रों को मिलने वाले शासकीय विज्ञापन रोकने का हथियार चलाया जाने लगा। 1975 में तो खैर, सेंसरशिप जैसा कदम उठाकर श्रीमती गांधी ने प्रेस की स्वतंत्रता की हत्या ही कर डाली। सैकड़ों समाचार पत्र प्रतिबंधित कर दिए गए। आपातकाल रूपी उस निर्णय ने इंदिरा जी की छवि को आम जनता की निगाह में गिरा दिया जिसका खामियाजा उन्हें चुनावी हार के तौर पर भोगना पड़ा। हालाँकि उसके बाद किसी भी प्रधानमंत्री की वैसा दुस्साहस करने की हिम्मत नहीं पड़ी किन्तु सरकारों में बैठे नेताओं को एक बात समझ में आ गई कि पत्रकारिता में भी रीढ़विहीन लोग आ चुके हैं, जिनसे अपने मनमाफिक लिखवाया जा सकता है। आपातकाल के दौर में इंदिरा जी की चाटुकारिता में कुछ प्रकाशन और सम्पादक बेहद निम्न स्तर तक चले गए। बाद में ऐसे ही लोगों के लिए लालकृष्ण आडवाणी ने कटाक्ष किया था कि श्रीमती गांधी ने तो कोहनी के बल चलने कहा  किन्तु आप तो रेंगने लगे।आपातकाल के बाद का  दौर पत्रकारिता में पीढ़ी परिवर्तन के लिए जाना जायेगा।आजादी की लडाई से से जुड़े रहे पत्रकारों के बाद वे नौजवान इस पेशे में आये जिन पर जयप्रकाश जी  के आन्दोलन का असर था। वैचारिक तौर पर वह कांग्रेस के भी विरुद्ध था और रास्वसंघ के भी।

वामपंथ  के साथ भी उसका जुड़ाव क्रन्तिकारी कम रूमानी ज्यादा था | इसीलिये  राजीव गांधी विशाल बहुमत हासिल करने के बाद महज पांच साल बाद ही सत्ता से बाहर आ गये। लेकिन उनके शासनकाल में देश में  कम्प्यूटर और मोबाइल का जो पदार्पण हुआ उसने पूरा परिदृश्य बदल डाला। टेलीविजन पर सरकार का एकाधिकार हटने के कारण निजी चैनलों की बाढ़ आ गयी। और फिर इंटरनेट के फैलाव ने तो समाचार जगत का रंग–रूप, चाल-ढाल सब बदल डाली। बीते तीन दशक में देश और दुनिया में प्रेस शब्द अपना असर खोता जा रहा है। सोशल मीडिया ने पत्रकारिता का जैसा विकेंद्रीकरण किया वह कल्पनातीत है। लेकिन इसके कारण प्रेस की स्वतंत्रता जैसा शब्द भी अपना सम्मान खोने लगा क्योंकि न जाने कितने बंदरों के हाथ उस्तरे लग गए। व्हाटस एप जैसे माध्यमों ने समाचार माध्यमों की गरिमा और गम्भीरता ही खत्म कर दी। आज भारत में पत्रकार और पत्रकारिता दोनों पर सरकार की भक्ति का आरोप लगता है। ये कहना भी गलत न होगा कि समाचार माध्यम और उनसे जुड़े पत्रकार अब दो खेमे में बंट गए हैं। पहला भाजपा समर्थक और दूसरा विरोधी। एक के लिए मोदी भगवान हैं तो दूसरे के लिए शैतान से भी बदतर। यू-ट्यूब चैनलों के माध्यम से हो रही पत्रकरिता का अपना अलग राग–रंग है। उस आधार पर देखें तो ये कहना गलत न होगा कि प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर किया जाने वाला रोना–धोना बेकार है क्योंकि जब मानसिक रूप से कोई पत्रकार एकपक्षीय हो जाए तब वह पत्रकार नहीं प्रवक्ता हो जाता है।

सरकार का अंध समर्थन और अँधा विरोध दोनों पत्रकारिता के मूलभूत सिद्धांतों के विरुद्ध हैं। आज भारत में समाचार माध्यमों की आजादी को लेकर जो स्यापा किया जाता है उसमें उन लोगों का हाथ है जो अख़बारों पर सेंसरशिप लगाये जाने वालों की तरफदारी करते नहीं थकते थे। लेकिन चिंता का विषय है कि विदेशी पूंजी और पुरस्कारों के लालच में पत्रकारों की एक जमात राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध काम कर रही है, जो अच्छा संकेत नहीं है। लोकतंत्र और समाचार माध्यम सभ्य समाज की पहिचान हैं। दुर्भाग्य से हमारे देश में दोनों संस्थाओं में विकृति आई है। आज का दिन सही मायनों में प्रेस की स्वतंत्रता के साथ ही उसके कर्तव्यों की चर्चा का भी अवसर हैं। कोई भी स्वतंत्रता बिना दायित्वबोध के कारगर नहीं होती, ये बात समाचार माध्यम और उनमें कार्यरत पत्रकारों को भी समझनी होगी। पैकेज की चाहत में अपनी गैरत का सौदा करने वाले किस मुंह से स्वतंत्रता की बात करते हैं, ये बड़ा सवाल है। और देश विरोधी ताकतों की गोद में बैठकर गोदी मीडिया का प्रलाप सिवाय पाखण्ड के और क्या है?

(लेखक : वरिष्ट पत्रकार हैं।)

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