गैंगवार में हुई गैंगस्टर की मौत

फिल्मों से लगाकर आम जीवन में ऐसे मरते हैं गैंगस्टर

सुरेश शर्मा। मौत किसी की भी हो दुखद होती है। लोकसभा का सदस्य और विधायक रहा हुआ व्यक्ति इस प्रकार मारा जाता है तब मीडिया भी सवाल पूछता है और समाज में चर्चा भी होती ही है। यह अलग बात है कि चर्चा करने का तरीका उस मामले में पहले से बनी हुई राय के आधार पर होता है। कुख्यात अपराधी और अपराध के दम पर ही लोकसभा और विधानसभा का सदस्य बना अतीक अहमद पिछले दिनों अस्पताल के सामने मार दिया गया। तीन लडक़े आये करीब आकर हत्या की और जय श्रीराम का नारा लगाकर आत्म समपर्ण कर दिया। वे अपराधी प्रवृत्ति के थे यह तो रिकार्ड बताता है। उन्होंने जिस अंदाज में गोलियां मारी उससे यह समझने में कोई परेशानी नहीं होती है कि वे शूटर की भांति व्यवहार कर रहे थे। लेकिन आत्म समर्पण जिस अंदाज में किया उससे लगा कि वे आगे कुछ ऐसा कर सकते हैं जो चौंकाने वाला हो सकता है। पुलिस अपना काम करेगी और कानून अपना काम करेगा। राजनीति अपना काम कर रही है। नेताओं के बोल सुविधा के हिसाब होते हैं। टीवी पत्रकारों का विश£ेषण टीआरपी के आधार पर होता है जबकि समीक्षण सभी ओर से गुणा भाग करते हैं। अभी जांच के बाद तथ्यों का आना शेष है। इन सब बातों के बीच एक बात सभी ओर से स्वीकार की जा सकती है कि गैंगस्टर की मौत गेंगवार में ही होती है। ऐसा फिल्मों में भी दिखाया जाता है और समान्य जीवन में भी ऐसा ही होता है। यह ऐसा विषय है कि इसमें तथ्यों को एकत्र करने का समय देना ही अधिक उचित होगा।

पिछले दिनों से समाचार जगत को हाइट देने का रास्ता अतीक अहमद से होकर निकलता है। साबरमति जेल से प्रयागराज की लौनी जेल तक के रास्ते की कवरेज लाखों के देने के बाद भी नहीं हो सकती थी लेकिन हुई। दो बार के प्रयास में कुछ नहीं निकला। मीडिया की गांठ का लग गया। टीआरपी भागती गाडिय़ों से नहीं पलटती गाड़ी से मिलती है। विकास दुबे के मामले में पुलिस ने मीडिया के वाहनों को पहले रोक दिया था और बाद में वह सब हो गया जिसके लिए मीडिया के लोग पीछे भाग रहे थे। इस बार मीडिया के सामने ही लाइव हुआ। अधिकांश चैनलों के पास फुटेज हैं और पुलिस के पास हत्यारे। अभी तक जांच में यह समझ में नहीं आया है कि इनल तीन युवकों को इस प्रकार से हत्या करने की क्या जरूरत थी? पुलिस ने पहली बार मुंह खोला है कि सुर्खियां पाने के लिए हत्या की गई है। हजम होने वाली बात नहीं है। ऐसे ही एक अफवाह भरी खबर चल रही है कि अतीक से पहले भाई अशरद गाड़ी से उतरा और बाद में अतीक। अतीक गांड़ी से निकलते ही किसी को बुलाने जैसा इशारा करता है। इसमें क्या संदेश छुपा है? इतनी करीब से आकर गोलियां मार देना यह बताता है कि मारने वाले बेखौफ थे। उन्हें अतीक के कैरियर का डर नहीं था। उनके बाकी लोगों का डर भी नहीं रहा होगा। कोई बड़ा गेंगस्टर मरता है तब हत्याओं को सिलसिला बंद नहीं होता शुरू होता है। इसलिए यह सारा मामला इतना आसान नहीं है जितना समझा जा रहा है।

यूपी अपराध और माफियाओं का गढ़ रहा है। वहां की राजनीति में भी बाहुबलियों का बोलबाला था। अतीक कभी समाजवादी पार्टी से जुडक़र नेतागिरी करता था बाद में बसपा से सांसद बना। केन्द्रीय मंत्री गिरिराज सिंह का यह कहना कि वह समाजवादी पार्टी के लिए कुछ बताने वाला था इसलिए हत्या हुई है। जबकि समाजवादी पार्टी ने हत्या के तत्काल बाद ऐसा रंग देने का प्रयास किया है कि कोई व्यक्ति लगातार चुनाव जीतता है वह गेंगस्टर कैसे हो सकता है? माफिया होने की बात तो खुद अतीक ने ही स्वीकार की और कहा था कि माफियागिरी खत्म हो गई अब तो हमारे घर की औरतों और बच्चों को आराम से रहने दीजिए। यह याचना बता रही है कि वह टूट गया था। अतीक के खिलाफ गवाही देने वाला या दुनिया से चला जाता था या उसकी जुबान काम करना बद कर देती थी। इतना खौफ था प्रयागराज में। उमेश पाल इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। जिस प्रकार से गोलियां और बम चल रहे थे उससे यह साफ संदेश छुपा था कि न कोई पुलिस नाम की संस्था है और न लोगों की आंखों में रौशनी है जो चश्मदीद बन सकते हैं। राजू पाल को शादी के 9वें दिन अतीक की गैंग ने ही छलनी किया था। इसी खौफ को ही उत्तरप्रदेश की धरोहर बनाया हुआ था। वहां राजनीति ऐसे चलती थी। अब वहां बदलाव है।

विकास दुबे ने पुलिस के लोगों को जिस प्रकार से मारा ऐसा कोई कर कैसे सकता है? लेकिन हुआ? योगी आदित्यनाथ से विकास का घर गिरा दिया और बाद में घटनाक्रम ने गाड़ी को पलटाकर वह अध्याय समाप्त कर दिया। इसी प्रकार की घटना अतीक के साथ भी हुई है। एक दिन पहले बेटा असद एनकाउंटर में ढ़ेर हुआ था। साथ में सुरक्षा में लगा शूटर भी जमीन पर लेटा मिला था। मतलब पुलिस ढ़ान ले तो अपराध इसी प्रकार का जमीन पर लेटा मिलता है। जब तक अपराधियों की ढयोढ़ी पर पुलिस का तमंचा गर्दन झुकायेगा आम व्यक्ति के लिए सुरक्षा दूर की कौड़ी होगी। किसी ने भी कल्पना नहीं की थी इतने बड़े रंगदार को कोई इतना आसानी से मार सकता है। इतने बड़े गैंगस्टर की हत्या बच्चों का खेल नहीं होती लेकिन बच्चों ने इसे खेल ही बना दिया। मारा और हाथ खड़े करके पुलिस से कह दिया आगे की कुछ कहानी सुनना है तब हमें जिंदा ही पकड़ लो। आने वाले समय में बुहत कुछ सामने आयेगा। गिरिराज सिंह की बात सच होती है? अतीक के इशारे का मतलब समझ में आता है या कोई नया चेप्टर खुलता है इसकी प्रतीक्षा करना होगी। सरकार की नींद उड़ गई थी और बाबा ने रात में ही अधिकारियों को बुला लिया था। सतरह पुलिस वालों को तत्काल निलंबित कर दिया था। उच्च स्तरीय जांच भी शुरू हो गई। वे सभी काम रात में ही कर लिये गये थे जिसको लेकर विपक्ष हमला बोल सकता था। बाबा का विजन साफ है। दादागिरी नहीं चलेगी।

राजनीति की चिल्ल पौं शुरू हो गई। मीडिया की बकरस भी उतनी ही तेजी से शुरू हुई है। वे चैनलों पर नेताओं को बुलाकर मन का गुब्बार निकालने का मौका दे रहे हैं। इससे समाज में क्या प्रभाव पड़ेगा यह किसी की चिंता का विषय नहीं है? लेकिन गंभीर सवाल यह है कि इस गैंगवार में जय श्रीराम का प्रवेश क्या संदेश देता है? इसके बारे में अनुमान लगाने की जरूरत है। दोनों भाईयों को एक साथ मेडीकल के लिए लाया गया। एक ही गाड़ी में लाया गया। पहले छोटा भाई उतरता है और बाद में इशारा करता हुआ बड़ा भाई। तीन युवक आते हैं और जय श्रीराम बोलकर हत्या हो जाती है। पुलिस अभिरक्षा में यह सब हुआ और सारे पुलिस वाले भाग गये? कई बार लगता है कि पटकथा पहले से लिखी हुई थी मंचन हो गया। इतना बड़ा गैंगस्टर अस्पताल में जा रहा है। उसको खुद ही हत्या किये जाने का डर है, जो वह खुद कहता है। इसके बाद उसका एक भी व्यक्ति गुप्त रूप से नहीं है। गंभीर बात है। तब क्या मारने वाले उसके आदमी हैं और जय श्रीराम का नारा यूपी के लिहाज से मुफीद और संदेश वाहक हो सकता है। क्या हत्या करवाले वाले कोई और हैं और वे अपना काम निकल जाने के बाद हत्यारों को मजहबी रूप देकर बचना चाहते हैं? इसी प्रकार के सवालों के जवाब पुलिस को खोजना हैं। योगी बाबा का दिमाग चल रहा होगा ही। राजनेताओं के हमले मानोबल को तोडऩे वाले होंगे। फिर भी माफियाओं का मनोबल तोडऩे की मुहिम के पक्षधर लोगों की भी कोई कमी नहीं देश में। इसलिए ऐसा आवाज भी आयेंगी। लेकिन मीडिया के चटकारे कुछ भी हों। राजनेताओं के पूर्वाग्रही तयशुदा बयान कुछ भी हों। बाबा का यूपी सही दिशा में चल रहा है। अपराधी या तो रास्ता बदलें या रास्ता खाली हो। यह तो कपिल सिब्ब्ल जैसे बड़े वकील ने ही कह दिया। उनका अंदाज जुदा था। उन्होंने कहा कि कोर्ट में न्याय देर से मिलता है इस प्रकार जल्दी। लेकिन लोकतंत्र और संविधान से चलने वाले देश के अपने कायदे कानून होते हैं। उनका जीवित रखना भी जरूरी है लेकिन जिन्हें लोगों के मरने पर गम नहीं होता उनके लिए कोई रास्ता तो निकालना ही पड़ता है।

संवाद इंडिया

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button