गुजरात फार्मूले की कर्नाटक में अग्नि परीक्षा मोदी-शाह के चमत्कार से जीत की उम्मीद

किसी भी प्रदेश में विधानसभा के चुनाव सामने होते हैं तब गुजरात फार्मूले की चर्चा सहज रूप से अखबारों की सुर्खियां बनती है। गुजरात में सभी दिग्गज और पुराने नेताओं को अपनी विधानसभा सीट छोड़ने के लिए मना कर नए लोगों को टिकट दिए गए थे। तब के बाद विधानसभा चुनाव आते ही इस गुजरात फार्मूले की चर्चा प्रारंभ हो जाती है। उसके बाद भी कुछ राज्यों में हल्का फुल्का प्रयोग हुआ।

भोपाल, सुरेश शर्मा। किसी भी प्रदेश में विधानसभा के चुनाव सामने होते हैं तब गुजरात फार्मूले की चर्चा सहज रूप से अखबारों की सुर्खियां बनती है। गुजरात में सभी दिग्गज और पुराने नेताओं को अपनी विधानसभा सीट छोड़ने के लिए मना कर नए लोगों को टिकट दिए गए थे। तब के बाद विधानसभा चुनाव आते ही इस गुजरात फार्मूले की चर्चा प्रारंभ हो जाती है। उसके बाद भी कुछ राज्यों में हल्का फुल्का प्रयोग हुआ। हिमाचल को छोड़कर भाजपा को अधिकांश जगह सफलता मिली। हिमाचल पुराने और अनुभवी नेताओं ने पार्टी छोड़ दी या निर्दलीय चुनाव लड़ा था। उस समय यही भावना मन में थी कि गुजरात फार्मूला यदि अन्य राज्यों में स्थानीय परिस्थितियों को देखे बिना लागू किया गया तो भगदड़ की स्थिति निर्मित होगी। ऐसा ही इन दिनों कर्नाटक में देखा जा रहा है। इसलिए कहा जा रहा है कि कर्नाटक विधानसभा चुनाव में गुजरात फार्मूला अग्नि परीक्षा की कसौटी पर कसा गया है। इस भगदड़ के बाद यदि भाजपा को सफलता मिलती है तब अन्य राज्यों में इसका आसानी से प्रयोग होगा।
लगभग पुराने और प्रभावशाली नेताओं को विधानसभा चुनाव से दूर करके गुजरात में चुनाव लड़े गए। वहां भाजपा को अप्रत्याशित सफलता मिली। जहां पिछले चुनाव में भाजपा 100 सीटों तक नहीं पहुंच पा रही थी, इस बार के आम चुनाव में इससे पहले के सभी रिकॉर्ड ध्वस्त करते हुए लगभग एकतरफा जीत हासिल की। इस जीत के बाद भाजपा नेतृत्व के हौसले बुलंद हो गए। समाचार पत्रों में गुजरात फार्मूला चर्चा का विषय बनता गया। मध्यप्रदेश में गुजरात फार्मूला लागू होगा इस प्रकार की बातें प्रारंभ हुई। हिमाचल प्रदेश में चुनाव गुजरात के साथ हुए थे। लेकिन वहां कुछ नेताओं की बगावत खासी चर्चा का विषय रही थी। एक नेता ने तो प्रधानमंत्री से बात करने के बाद भी अपनी दावेदारी वापस नहीं ली। ऐसे में वहां भाजपा की सरकार नहीं बन पाई  त्रिपुरा और अन्य राज्यों में इस प्रकार का प्रयोग सफल रहा। भाजपा हाईकमान उसके बाद उत्साहित है और आत्मविश्वास से लबरेज है।
इसी बीच कर्नाटक विधानसभा के चुनाव का समय आ गया। नामांकन भरने की तारीख समाप्त होने के करीब आ रही है। ऐसे में टिकट वितरण का काम और उसके बाद की परिस्थितियां संभालना सत्ताधारी भाजपा के लिए काफी मशक्कत का कार्य होता जा रहा है । कर्नाटक में भाजपा नेतृत्व ने गुजरात फार्मूले का कुछ हिस्सा प्रयोग में लिया है। कुछ प्रभावशाली नेताओं को टिकट न देकर यह संदेश देने का प्रयास किया है कि भाजपा नया नेतृत्व तैयार कर रही है। हालांकि इन नेताओं के समायोजन की चर्चा थी। इसके बाद भी कुछ नेताओं ने बगावत का रास्ता अपनाया पूर्व मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टार और उपमुख्यमंत्री लक्ष्मण सावदी ने भाजपा से त्यागपत्र देकर कांग्रेस का दामन थाम लिया। जगदीश शेट्टार कर्नाटक भाजपा में बड़ा नाम रहे हैं। वे देश के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री भी हैं और संघ के साथ उनके घनिष्ठ संबंध हैं। ऐसे में यह बगावत भाजपा के लिए खतरे की घंटी से कम नहीं है। पार्टी हाईकमान नेताओं को फिर से टिकट देने की मंशा नहीं रखता। इसलिए यह बगावत कर्नाटक के चरित्र का पुनर प्रदर्शन कर रही है।
कर्नाटक के राजनीतिक समीकरणों को देखते हैं तब कांग्रेस वहां पहले से ही ताकतवर राजनीतिक दल रहा है। भाजपा कर्नाटक के रास्ते दक्षिण के दरवाजे खोलना चाहती रही है। इसलिए बीएस येदुरप्पा के नेतृत्व में वहां सरकार बनाने की स्थितियां बनती रही है। भ्रष्टाचार के आरोप में येदुरप्पा को अपनी कुर्सी छोड़ना पड़ी थी और उनके विश्वस्त लिंगायत समाज के ही बासव राज मोम्बाई को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाया गया। कर्नाटक की राजनीति को समझने वाले लोग यह मानते हैं कि बासवराज येदुरप्पा की छाया में ही काम करते रहे हैं। भाजपा वहां अपनी सरकार की संभावना देख रही थी। जनता दल सेकुलर पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवगौड़ा और उनके पुत्र कुमार स्वामी के नेतृत्व में तीसरी शक्ति बनने जैसी स्थिति में है। हालांकि इस बार इसकी अधिक चर्चा नहीं है। जिस प्रकार से भाजपा में भगदड़ मची है और कांग्रेस उनके लिए पलक पावडे बिछा रही है उससे वहां की राजनीतिक स्थितियों को समझा जा सकता है। कांग्रेस यदि अपने दम पर सरकार बनाने जैसी स्थिति में होती तो निखालस भाजपाइयों को अपने यहां नहीं लेती। इन नेताओं की कांग्रेस में सहज एंट्री बताती है कि भाजपा वहां एक ताकतवर पार्टी का रूप ले चुकी है।
कर्नाटक विधानसभा के चुनाव राज्यों की राजनीति में भाजपा के लिए एक बड़ा दर्पण होने जा रहा है। नरेंद्र मोदी का चेहरा लोकसभा चुनाव जिताने के साथ विधानसभा के चुनाव भी जितवा सकता है यह कर्नाटक चुनाव के बाद साफ हो जाएगा। कर्नाटक की अग्नि परीक्षा का प्रतिफल यदि सकारात्मक रहा तो मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में होने वाले विधानसभा चुनाव में भी भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व चेहरे बदलने में देरी नहीं करेगा। किन्ही कारणों से यदि भाजपा कर्नाटक के चुनाव नहीं जीत पाई तो गुजरात फॉर्मूला अन्य राज्यों में फलीभूत नहीं है यह मान लेना होगा। वैसे भी राजनीति के प्रति समझ रखने वाले लोग गुजरात में लागू किए गए फार्मूले को नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी के प्रभाव से मिली विजय के रूप में देख रहे हैं। सभी राज्यों के अपने समीकरण होते हैं। स्थानीय नेताओं का ताकतवर होना और ताकतवर नेताओं का स्थानीय होना राजनीति में बड़ा अंतर रहता है। इसलिए कर्नाटक में गुजरात का फार्मूला लागू करना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। परिणाम के दिन यह समझ में आएगा कि भाजपा नेतृत्व का निर्णय कितना उपयोगी सिद्ध हुआ है।

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