लोकसभा चुनाव में विपक्ष नहीं दिखा पा रहा प्रभाव…मोदी के लिए चुनाव में अनुकूलता

लोकसभा चुनाव में पहले चरण के लिए मतदान का समय करीब आता जा रहा है। सात चरण में आम चुनाव होना हैं। इस समय तक जैसा वातावरण दिखाई दे रहा है उसमें भाजपा या मोदी के लिए अनुकूलता दिखाई दे रही है

सुरेश शर्मा।लोकसभा चुनाव में पहले चरण के लिए मतदान का समय करीब आता जा रहा है। सात चरण में आम चुनाव होना हैं। इस समय तक जैसा वातावरण दिखाई दे रहा है उसमें भाजपा या मोदी के लिए अनुकूलता दिखाई दे रही है जबकि विपक्ष कोई खास प्रभाव नहीं छोड़ पाया है। जिन क्षेत्रों में विपक्ष के प्रत्याशी ताकतवर हैं उन पर उसका अधिक फोकस है। खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी सभाओं में इस बात का उल्लेख कर रहे हैं कि यह पहला आम चुनाव है जिसमें विपक्ष सरकार बनाने का दावा तक नहीं कर रहा है। इसका मतलब यही हुआ कि विपक्ष नेरेटिव सेट करने में कामयाब होना तो दूर की बात है उसका प्रयास करता हुआ भी दिखाई भी नहीं दे रहा है। यह हो सकता है कि पहले चरण के बाद उसे जिस प्रकार की मंशा मतदाता की दिखाई देगी उसके आधार पर वह अपनी रणनीति बनायेगा? कांग्रेस ने हालांकि चुनाव घोषणा पत्र जारी करने में बाजी मार ली है फिर भी उनके वादों की तुलना उसी की सरकार के कार्यकाल से की जा रही है। एमएसपी पर कानून बनाने की बात हो या फिर अन्य गारंटियां हो। गारंटी शब्द ही मोदी का है इसलिए जितना प्रभाव बनना चाहिए उतना नहीं बन पाया है। एमएसपी उसकी सरकार के समय नहीं बन पाया तो अब वादे का क्या अर्थ कोई भी समझ सकता है। क्षेत्रीय दलों के प्रभाव क्षेत्रों में भी इस समय सेंधमारी के सबूत मिल रहे हैं। इसलिए यह कहा जा रहा है िक अब तक मोदी के लिए अनुकूलता दिखाईदे रही है। प्रचार के मामले में भी इंडी गठबंधन का प्रयास दिखाई नहीं दे रहा है जबकि राजग की ओर से प्रधानमंत्री और अन्य नेताओं ने प्रचार तेज किया हुआ है।

लोकसभा चुनाव के लिए अब प्रचार तेज होने लगा है। जिन 102 सीटों के लिए पहले चरण में मतदान होगा उसके प्रचार में व्यापक तेजी आ चुकी है। प्रधानमंत्री ने उन क्षेत्रों के लिए प्रचार का काम संभाल लिया है जहां पहले चरण में मतदान होना है। यूपी, बिहार और बंगाल ऐसे राज्य हैं जहां सभी चरणों में मतदान होना है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ ऐसे राज्य हैं जहां पहले चार और तीन चरणों में मतदान होना है। दक्षिण के राज्य तमिलनाडु की सभी सीटों पर और अन्य कुछ राज्यों के साथ सबसे बड़े चरण के लिए विपक्षी नेताओं के प्रयास कम ही दिखाई दे रहे हैं। दक्षिण में भाजपा को इस बार उम्मीद दिख रही है। यही उम्मीद तय करेगी कि पार्टी अपने गठबंधन के दावे 400 पार को पूरा कर पायेगी? देश का राजनीतिक वातावरण साफ सा दिखाई दे रहा है। विपक्ष ने गठबंधन का तगड़ा दाव चला था। उसके बाद यह उम्मीद जगी थी 2024 के लोकसभा चुनाव में खासी टक्कर होगी। देश में दस साल में सरकार बदलने का चलन भी हे। अटल जी दो बार की सरकार चला पाये थे और मनमोहन सिंह भी। ऐसे में मोदी को चुनौती दी जा सकती थी? विपक्ष का आत्मविश्वास इतना नीचे चला गया है कि वह एक साथ भी आना चाहता है और एक साथ खड़ा भी नहीं हो पा रहा हे। गठबंधन भी करता है और सीटों को लेकर विवाद भी करता है। देश को गठबंधन सरकार और बहुमत की सरकार मतलब समझ में आ गया है। इसलिए उसे मोदी सरकार का विकल्प ही दिखाई नहीं दे रहा है।

विपक्ष की बातों के हिसाब से देश से गठबंधन सरकार की मांग की जा रही है। लगता नहीं है कि देश इसके लिए तैयार हो। गठबंधन में भी सफलता तभी मिलती है जब सरकार का संचालन करने वाला दल बड़ा हो और उसके आसपास कोई दल न आता हो। कांग्रेस ने जिस प्रकार की राजनीति की है उसने उसे खासा नुकसान पहुंचाया है। गठबंधन को जिस प्रकार से कब्जाने का प्रयास किया गया उससे कुछ दलों ने किनारा कर लिया। नीतीश कुमार जैसे नेता वापस एनडीए में आ गये। ममता ने कांग्रेस को छिटक दिया। इसके बाद भी कांग्रेस ने सबक नहीं लिया। जिस प्रकार से छोटे दलों के साथ तालमले किया उसने भी कांग्रेस की साख को घटाया है। आमतौर पर इस प्रकार से सीटें नहीं मांगी जाती? भाजपा बड़ा दल है इसलिए सहयोगी दलों को उसने सीटें दी हें। जबकि सहयोगी दलों से कांग्रेस सीट मांग रही है। इसने कांग्रेस की साख को बट्टा लगाया है। यूपी और बिहार ने छवि का प्रभावित किया है। राहुल गांधी दूसरी बार केरल के वायनाड़ से चुनाव लड़ने गये हैं। लेकिन डी राजा ने गठबंधन में होते हुए भी राहुल को तरजीह नहीं दी और अपनी पत्नी को चुनाव में वहीं से उतार दिया जहां से राहुल मैदान में हैं। बड़ा संदेश है इसमें।

गांधी परिवार का यूपी से खास रिश्ता रहा है। अमेठी राहुल ने छोड़ दी और रायबरेली सोनिया गांधी ने। यह संदेश देना चाहते थे कि वहां जनता उन्हें बुलाने की मांग करेगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। भाजपा ने वहां पर ताकतवर उपस्थिति दी है। इसलिए कांग्रेस ने लगतार गलतियां की हैं। इस कारण उसकी छवि में गिरावट आई है। कांग्रेस ने सरकार बनाने का दावा तक नहीं किया है। ऐसी ही स्थिति क्षेत्रीय दलों की है। उन्हें तो उनका वजूद बचाने की चिंता है। चुनाव प्रचार के मामले में भी विपक्ष्ा की स्थिति राजग के नेताओं और भाजपा के सामने कमजोर है। इसके कई कारण हैं लेकिन खास कारण यह है कि चुनाव प्रचार को लेकर कोई विशेष रणनीति नहीं है। वे पुराने विषय ही बार-बार दोहराये जा रहे हैं जिनका जनता जवाब दे चुकी है। वही अड़ाणी, वहीं दो करोड़ रोजगार, वही कालाधन। जब कालाधन के लिए नेताओं पर कार्यवाही की गई तब आन्दोलन करके उसका पक्ष ले रहे हैं। समूचा विपक्ष तय नहीं कर पा रहा है िक उसे प्रचार में भ्रष्टाचार पर क्या स्टेंड लेना है? उसे यह समझ में नहीं आ रहा है कि मोदी के काम को वुरा बताना है या मोदी को ही? इसलिए पहले चरण के चुनाव तक विपक्ष की समझ में रणनीति नहीं आ रही है। वह पिछड़ता जा रहा है। भाजपा आगे निकल रही है।
दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में व्यापक रणनीति दिखाई दे रही है। आम जनता के पास जाने के िलए कई स्तर पर योजना बनी है। संघ की गतिविधियां चल रही हैं। अनुसांगिक संगठन अलग से सकि्रय हैं। मोदी सरकार अपने काम गिना रही है। वादों को पूरा करने का प्रतिशत बताया जा रहा है। जिन विषयों को लेकर भाजपा का अछूत माना जा रहा था वे आज भाजपा की संजीवनी बन रहे हैं। राम मंदिर का निर्माण पांच सौ साल बाद का उत्साह दे रहा है। बड़े बड़े संतों के विरोध के बाद भी जनमानस मेंं यह संदेश गया है कि भाजपा ने भारत की संस्कृति को वापस लाकर देश को गरिमा प्रदान की है। कूटनीति में सफलता का डंका पूरे विश्व में बज रहा है। युद्ध में भारतीय छात्रों को लाकर भारत के झंडे की शान को विश्व के सामने दिखाया गया यह किसको नहीं पता। देश की अर्थव्यवस्था वे बेरोजगारी की पीड़ा को कम कर दिया है। देश के युवाओं को नौकरी की धकेलने वाली नीतियों को विकल्प दिया गया और अब युवा उसकी ओर आकर्षित हो रहे हैं। नये स्टार्टअप युवाओं को भा रहे हैं। सुरक्षा के मामले में मोदी का मुकाबला करने के िलए विपक्ष्ा को कोई नीति सूझ ही नहीं रही है। इसलिए विपक्ष चुनाव प्रचार के लिए मैदान में आता हुआ प्रतीत ही नहीं हो रहा है।

किसी भी गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री के लिए तीसरी बार सरकार बनाने की सोचना एक बड़े सपने का सच होने जैसा है। पंडित नेहरू के बाद नरेन्द्र मोदी के सामने यह रिकार्ड बनाने का अवसर दिख रहा है। इतने अधिक समय का प्रधानमंत्री और अगले पांच में पिछली बार से अधिक लोकप्रिय होने वाली घटना किसी और के साथ नहीं रही। हर बार पिछली बार से अधिक सदस्यों के साथ सदन में आना भी अपने आप में रिकार्ड है। अभी होड़ है भाजपा के साथ आने की और भाजपा की सदस्यता लेने की। इसका कारण यही माना जा रहा है कि बिना थके काम हो रहा है। देश को जिन कामों की जरूरत है वे हो रहे हैं। संस्कृति और सुरक्षा के मामले में तेजी से उत्थान हुआ है। अर्थव्यवस्था को और सुधारने का वादा है। गरीब को और महिलाओं को लग रहा है कि मोदी तो उनके लिए काम कर रहा है। युवा को उनके हिसाब को देश मिलने जा रहा है। व्यापार व उद्योग में अनुकूलता है तो मोदी को सरकार बनाने के िलए अनुकूलता दिखाई दे रही है। उनकी बातों पर भरोसा लग रहा हे। मोदी का प्रचार करने में मतदाता लग गया। यही बात विपक्ष को परेशान कर रही है और वह खुद को संभाल नहीं पा रहा है।

(लेखक हिंदी पत्रकारिता फाउंडेशन के चेयरमैन हैं) संवाद इंडिया

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