‘बजरंग दल’ पर पाबंदी की बात अतिरेकवादी ‘प्रतिक्रिया’

कर्नाटक विधानसभा चुनाव ने चेहरों से नकाब उठाने का काम किया है। भाजपा ने कहा है कि यूनिफार्म सिविल कोड लागू करेंगे तो बदले में कांग्रेस ने पीएफआई की तुलना बजरंग दल से करते हुए उस पर प्रतिबंध लगाने का वादा किया है।

(सुरेश शर्मा) भोपाल। कर्नाटक विधानसभा चुनाव ने चेहरों से नकाब उठाने का काम किया है। भाजपा ने कहा है कि यूनिफार्म सिविल कोड लागू करेंगे तो बदले में कांग्रेस ने पीएफआई की तुलना बजरंग दल से करते हुए उस पर प्रतिबंध लगाने का वादा किया है। घोषणा पत्र सार्वजनिक हो गया है और चेहरे सामने आ गये हैं। यूनिफार्म सिविल कोड जनसंघ के समय से भाजपा का वादा रहा है। जो तीन वादों राम मंदिर का निर्माण, धारा 370 की समाप्ति और यूनिफार्म सिविल कोड प्रमुख थे। दो पूरे हो गये केवल एक बाकी है। जिसका वादा पूरा करने का संकल्प लिया गया है। इस बारे में तो सर्वोच्च न्यायालय का आदेश भी प्रतीक्षा कर रहा है। लेकिन बजरंग दल पर प्रतिबंध की बात कह कर वह चेहरा सामने आ गया जिसमेें विभाजन की विभिषीका, तुष्टिकरण, परासंपदा पर मुस्लिम अधिकार और धर्मान्तरण के लिए कैरीडोर तैयार करने जैसे अनेक मसले हैं। भारत पंथ निपरेक्ष देश है यह विवादित संशोधन से तय किया गया था। लेकिन वह इसलिए पंथ निरपेक्ष है क्योंकि यह हिन्दू बाहुल देश है। अन्य बहुलता वाले देश धार्मिक आधार पर संचालित होते हैं। सनातन संस्कृति की संरचना ही पंथ निरपेक्ष और लोकतंत्रवादी है। इसलिए भारत में यह सब चल रहा है। जिस क्षेत्र में आबादी का असन्तुलन है वहां की स्थितियों का आंकलन बता देता है कि वह सोच कैसी है?

जनेऊधारी नेतृत्व वाली कांग्रेस का बजरंग दल पर पाबंदी लगाने का अर्थ यह है कि वह सनातन मान्यताओं का गला घोटना चाहती है। इससे यह भी संदेश ध्वनित होता है कि केन्द्रीय नेतृत्व कमजोर होता है तब राज्यों की मनमानी किस कदर बढ़ जाती है? बजरंग दल पर पाबंदी की बात कहने का अभिप्राय ही अतिरेकवादी प्रतिक्रिया है। अभी तक बजरंग दल पर हिंसक हमले करने या योजना बनाने का कोई मामला नहीं बना है जबकि पीएफआई पर ऐसे कई मामले हैं। इसलिए यह बेहुदा राजनीतिक प्रयास है। संघ और उसके अनुसांगिक संगठनों के प्रति कांग्रेस की नीति विरोधात्मक तो है लेकिन वह इस हद तक जाने की स्थिति प्रदर्शित कर देगी यह चिंता की बात है। संघ पर प्रतिबंध के इससे पहले कांग्रेस ने प्रयास किये तब कोई बड़ा आधार था। लेकिन वे प्रतिबंध न्यायालय के सामने ठहर नहीं पाये। अब तो ऐसा कोई आधार भी नहीं है। इसलिए देश भर में यह संदेश गया है कि कांग्रेस पीएफआई की मदद करने का प्रयास कर रही है। ऐसा करना उसके लिए कोई नया काम भी नहीं है।

इससे पहले हिन्दू या भगवा आतंकवाद की थ्योरी स्थापित करने का प्रयास हुआ था जो विफल हो गया। उसमें कांग्रेस का नेतृत्व और हेमंत करकरे जैसे पुलिस अधिकारी शामिल थे। इतिहास साक्षी है कि बापू ने विभाजन में लाखों लोगों की हत्या करने वाले पाकिस्तान को 53 करोड़ देने के लिए अनशन किया था तो सोनिया युग में मोदी सरकार को हटाने के लिए पाकिस्तान से मदद मांगी गई थी। प्रतिफल में आतंक का प्रहार तेज हुआ था। देश ने जनेऊ दिखाकर मिशनरी समर्थन का खेल भी देखा है और भारतीय संस्कृति का गौरवशाली उत्थान भी। इसलिए अब कर्नाटक चुनाव देश के बहुसंख्यकों की आंखे खोलने का पर्याप्त आधार देता है। यह महज बजरंग दल पर प्रतिबंध की बात भर नहीं है। यह उस सांस्कृतिक टकराव की अगली कड़ी है जो विदेशों से मोदी सरकार को अस्थिति करने के टूलकिट के रूप में सामने आती रही है। जो कभी किसान आन्दोलन में दिखाई देती है और कभी सीएए में। जिस प्रकार पुराने समय में युद्ध के समय गायों का झुंड सामने करके प्रहार रोककर घुसपैठ की जाती थी वैसे ही किसानों की आड़ ली गई और घुसपैठ की गई। आज उसका नया रूप सत्यपाल मलिक के रूप में सामने हैं। जो सेना की आड़ लेकर देश को गुमराह कर रहे हैं। यदि सेना को ही सुरक्षा की जरूरत होगी तो वह किसकी सुरक्षा करेगी। और सेना के बैरक तक हवाई व्यवस्था किसी भी देश में नहीं होती है। अब बजरंग दल पर प्रतिबंध की बात उसकी अगली कड़ी है। यदि सनातन संस्कृति को मानने वाले इन संकेतों को नहीं समझेंगे तो उनके लिए छुपने का तो कोई दूसरा देश भी नहीं है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button