आम चुनाव में भाषा की गिरावट और आकर्षण का स्तर गिरा..नये कीर्तिमान स्थापित करता चुनाव

अभी दो चरण का मतदान हुआ है और एक दिन बाद तीसरे चरण का मतदान हो जायेगा। ये चुनाव कुछ बातों के नये कीर्तिमान स्थािपत करने वाला है। भाषा की गिरावट के साथ हम मतदाता को आकर्षित करने के लिए किस स्तर तक का लालच देने का आव्हान कर रहे हैं यह तो गंभीर चर्चा का विषय होने वाला है। सरकार ने अपने काम गिनाये तो विपक्ष ने जनता के मुद्दों पर ध्यान आकर्षित कराया।

सुरेश शर्मा । अभी दो चरण का मतदान हुआ है और एक दिन बाद तीसरे चरण का मतदान हो जायेगा। ये चुनाव कुछ बातों के नये कीर्तिमान स्थािपत करने वाला है। भाषा की गिरावट के साथ हम मतदाता को आकर्षित करने के लिए किस स्तर तक का लालच देने का आव्हान कर रहे हैं यह तो गंभीर चर्चा का विषय होने वाला है। सरकार ने अपने काम गिनाये तो विपक्ष ने जनता के मुद्दों पर ध्यान आकर्षित कराया। जनता ने किसको भाव दिया यह तो मतदान का परिणाम सामने आयेगा उसी दिन पता चलेगा। इतना स्परूट है कि जिस गठबंधन को विपक्ष ने चुनाव से पहले बनाया था वह अब कहीं भी दिखाई नहीं दे रहा है। इसका कारण यह नहीं है कि गठबंधन में दरार आ गई है? इसका कारण यह है कि गठबंधन ने संयुक्त रूप से चुनाव संचालन का कार्यक्रम ही नहीं बनाया। टिकिट बांट लिये होंगे लेकिन सब जगह टिकिट बंटने का आयोलन नहीं हुआ। राजग में ऐसा नहीं है। भाजपा ने जिन दलों के साथ गठबंधन किया था उनके साथ पूरे देश में क्षेत्रवार टिकिट वितरण का कार्यक्रम हुआ है। विपक्ष के नेताओं के दौरे तो हुए हैं लेकिन यह संदेश नहीं गया कि संयुक्त रूप से दौरे हो रहे हैं। पहला प्रयास कन्नोज से दिखाई देगा जहां सपा प्रमुख अखिलेश यादव चुनाव लड़ रहे हैं। इसका लाभ रायबरेली में लिया जा सकता है। सत्ता पक्ष के लिए उत्तर भारत और पूर्वोत्तर ऐसे राज्य हैं जहां जीत की संभावना अधिक है और विपक्ष के लिए दक्षिण को सबसे अधिक मुफीद माना जा रहा है। कमोवेश यही स्थिति 2019 के लोकसभा चुनाव में भी थी। अबकी बार विपक्ष सत्तापक्ष के प्रभाव वाले क्षेत्र में घुसपैठ का प्रयास कर रहा है जबकि सत्तापक्ष विपक्ष्ा के प्रभाव वाले क्षेत्र में। कितना प्रभाव होगा यह जनता ने तय किया हुआ है। इसलिए इस बार का चुनाव कुछ नये कीर्तिमान स्थापित करने का प्रयास करता दिख रहा है।

पहले चरण के चुनाव प्रचार का तरीका समझते हैं। इसमें सरकार ने पिछले दस साल में किये गये कामों का विस्तार से विवरण दिया। कूटनीति से मिली सफलताएं हों, सुरक्षा का मामला हो, आतंकवाद और नक्सलवाद की योजनाएं हों। अर्थव्यवस्था का उछाल हो और भविष्य की योजना क्यों है वह हो, सड़कों का निर्माण कार्य हो, रोजगार के लिए अधोसंरचना हो और भारत का शक्तिशाली देश होकर कई खास देशों को पीछे छोड़ने की घटना हो। सबका ब्योरा दिया गया। जनता को इस बारे में कुछ पहले से जानकारी थी और कुछ चुनाव प्रचार के समय पता चल गया। मोदी सरकार ने सांस्कृतिक विकास के लिए कितना काम किया है यह भी सबको बताया भी गया और याद भी हे। राम मंदिर का निर्माण देश के इतिहास में राजनीतिक अतिहास में बड़ा बदलाव है। श्रीराम ने आने वाली बाधाओं को पार किया और सभी को सहमत किया और आज भव्य मंदिर बनाने का श्रेय मोदी सरकार को दिया। चाहते तो इसे कोई सरकार भी बनवा सकती थी। लेकिन बात चाहने की है। राम मंदिर निर्माण ने देश की राजनीतिक फिजा को बदलने में बड़ी सहायता की है। अन्य बातों और घटनाक्रमों ने इसमें सहायता की है। लेकिन प्रथम चरण के तत्काल बाद सत्तापक्ष और विपक्ष की प्रचार की शैली में भारी बदलाव आया। एक दूसरे पर आरोपों का सिलसिला शुरू हुआ। यह न केवल बढ़ता गया अिपतु व्यक्तिगत भी होता गया। भाषा की गिरावट ने इसे और निम्न स्तरीय बना दिया। जनताा इसको लेकर अिधक प्रभािवत हुई होगी ऐसा लगा नहीं। क्योंकि दोनों पक्षों के सोशल मीडिया के सहयोगियों ने अपना-अपना पक्ष कुछ इस प्रकार से रखा है कि जनता को भ्रम पालने की जरूरत ही नहीं रही। सरकारों का अनुभव कांग्रेस के पास भी है और भाजपा के पास भी है। इसलिए तुलना करने में अधिक परेशानी नहीं हुई है।

कांग्रेस के काल में धारा 370 आरोपित की गई थी मोदी काल से उसे हटा दिया गया। अब जनता को तय करना है कि इस धारा को लगाये रखना उचित था कि हटाना? खुद कश्मीर के लोग हटने को जायज मानते हैं। यह धारा देश में सीमा रेखा खीचती हुई दिखाई देती थी अब वैसा नहीं है। इसलिए इस कार्य को साहसिक माना जा रहा है। देशहित में भी माना जा रहा है। इसे पहले की सरकारें भी कर सकती थीं। लेकिन नहीं कर पाये। महिला आरक्षण का निर्णय हो या तीन तलाक की बात सरकार ने यह बताने का प्रयास किया कि वह साहसिक निर्णय करने की स्थिति वाली है। इसका मतलब ही यही है कि बहुमत की सरकार के अपने फायदे देश को होते हैं। इसलिए मोदी काल में कुछ ऐसे निर्णय हुए हैं जिनका उल्लेख विपक्ष के नेता भी करते हैं। यह हो सकता है उसके बाद राजनीतिक रूप से वे उनकी आलोचना करते हों। लेकिन उन्हें यह मालूम है कि मोदी सरकार के दा साल के कार्यकाल में काम बताने की स्थिति तो है। इसलिए चुनाव के दूसरे चरण में विकास के कार्यों की बाते आने ही नहीं दी गई। भाषा के स्तर को इस प्रकार से सेट किया कि उपलब्धियों पर चर्चा ही नहीं की जा सकती है। आरोपों दौर चला।

यह समझा गया कि देश के मतदाता को विकास कार्यों और जरूरतों के आधार पर वोट नहीं करना हैं। क्योंकि दो चरण के मतदान के आंकड़े को देखा जाये तो वह 2019 के आंकड़े काफी नीचे रह गया। हालांकि समीक्षा करने वाले 2019 के विशेष पक्ष को नहीं देख रहे हैं जब सर्जिकल स्ट्राइक और पुलवामा की घटना के कारण मतदान अधिक हुआ था। यह भी कह सकते हैं कि 2014 की मोदी लहर के बाद 2019 का मतदान विशेष माना गया जिसमें 9 से 15 प्रतिशत की अप्रत्याशित बढ़ोतरी हुई थी। हालांकि 2024 का मतदान 2014 की तुलना में बेहतर है। अब कोई ऐसा मुद्दा नहीं है जिससे मतदाता अतिरिक्त रूप से आकर्षित हो सके। इस समय सभी तरफ एक ही चर्चा चलती है कि मोदी तीसरी बार सरकार बना रहे हैं। यह बात विपक्षी दलों की ओर से भी मान ली गई। यही कारण है कि उनका प्रचार आक्रामक नहीं है। जिन क्षेत्रों में क्षेत्रीय दलों का अपना कोई प्रभाव है वहां पर आक्रामक प्रचार दिखाई देता है शेष स्थानों पर यही बात कही जा रही है कि मोदी सरकार तो बना रहे हैं।

इस बार के राजनीतिक घटनाक्रम विपक्षी दलों की एकता के साथ प्रचार के लिए नेताओं का टोटा भी महत्वपूर्ण बात उल्लेखित होगी। कुछ क्षेत्रीय या ताजा राष्ट्रीय दल के नेता प्रचार के लिए उपलब्ध नहीं हैं। आप की मंशा पर तो पानी ही फिर गया। उनके नेता अरविंद केजरीवाल जेल में हें। किसी आन्दोलन या समाज सुधार के लिए जेल में हैं ऐसा नहीं है ईडी ने उन्हें भ्रष्टाचार के मामले में पकड़ा है। चतुराई के कारण कोर्ट के सामने वे एक्सपोज हो गये और उन्हें चुनाव के समय जेल में ही रहने का मौका मिलता जा रहा है। हालांकि न्यायालय ने अब चौथे सरकार से पहले उन्हें आन्तरिम जमानत देने के लिए खुद ही पहल की है। यह अलग बात है कि इस पहल को उत्प्रेरक नहीं माना गया। फिर भी न्यायालय का विचार है। इसी प्रकार से झारंखड के मुख्यमंत्री से सीधे जेल में जाने वाले हेमंत सोरेन भी प्रचार के लिए उपलब्ध नहीं हैं। जिनका प्रचार तेज चल रहा है उनको लेकर यह माना जा सकता है कि वे मोदी की राह रोकने के लिए पूरी ताकत लगा रहे हें। वे राह 370 और 400 के आंकड़ की रोक सकते हैं इसतना भर है।

कांग्रेस सबसे करीबी ताकत देने वाला दल है। प्रचार में मोदी कांग्रेस के नेताओं का ही जिक्र करते हें। सबसे अधिक निशाने पर राहुल गांधी आते हैं। उन्होंने वायनाड से दोबारा चुनाव लड़ा है। वहां की रिपोर्ट संघर्षपूर्ण चुनाव की आ रही हैं। ऐसे में उन्होंने अमेठी की अपनी सीट से चुनाव लड़ने की बजाए मां की सीट रायबरेली से नामांकन भरा है। इसका संदेश यह गया है कि अमेठी से जीत का भरोसा नहीं था। फिर भी सुरक्षित सीट तलाशना बड़े नेता के िलए इसलिए हितकर होता है क्योंिक उसे अन्य क्षेत्रों में चुनाव प्रचार के लिए जाना होता है। फिर भी सोशल मीडिया में आ रही बातों को कौन रोक सकता है। कांग्रेस के चुनाव लड़़ने का तरीका ही ऐसा रहा है कि वह विपक्ष के नेता के िलए संघर्ष कर रही है। मोदी के स्थान पर सरकार बनाने के लिए। समूचा विपक्ष अपनी ताकत बचाने की लड़ाई लड़ रहा है सरकार बनाने की चुनौती नहीं दे रहा है। हालांकि तीसरे चरण तक मोदी का एक तरफा चुनाव वाला उत्साह कम होता दिख रहा है कुछ राज्यों में भाजपा को चुनौती भी मिल रही है। चह व्यक्तिगत और स्थानीय है।
(लेखक हिंदी पत्रकारिता फाउंडेशन के चेयरमैन हैं) संवाद इंडिया

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