दिग्विजय को ज्योतिरादित्य सिंधिया से गुना में कर लेना चाहिए शक्ति परीक्षण

 राजनीतिक विवाद एक बात है और राजनीतिक प्रतिद्वंदता दूसरी बात है। महाराजा और राजा के बीच की राजनीतिक लड़ाई हमेशा खंदक में ही रही है। दिग्विजय सिंह यह प्रयास करते रहे हैं कि वे अनुभवी नेता होने के बाद भी ग्वालियर चंबल में सिंधिया के मुकाबले न माधव राव के समय  बराबर आये और अब न ही ज्याेतिरादित्य के समय में।

सुरेश शर्मा, भोपाल। राजनीतिक विवाद एक बात है और राजनीतिक प्रतिद्वंदता दूसरी बात है। महाराजा और राजा के बीच की राजनीतिक लड़ाई हमेशा खंदक में ही रही है। दिग्विजय सिंह यह प्रयास करते रहे हैं कि वे अनुभवी नेता होने के बाद भी ग्वालियर चंबल में सिंधिया के मुकाबले न माधव राव के समय  बराबर आये और अब न ही ज्याेतिरादित्य के समय में। कमलनाथ की प्रदेश में सरकार बनने के बाद जिस प्रकार का राजनीतिक घटनाक्रम घटा उसने दिग्विजय और सिंधिया की लड़ाई को खंदक से सड़क पर ला दिया है। इसका शक्ति परीक्षण होने पर ही यह समझ में आयेगा कि कौन हीरो है? इसके लिए विधानसभा के चुनाव में सिंधिया आगे रहे हैं। अब लोकसभा के चुनाव में गुना से ज्योतिरादित्य भाजपा के प्रत्याशी हैं तब कांग्रेस से टिकिट लेकर शक्ति परीक्षण कर ही लेना चािहए।
मध्यप्रदेश कांग्रेस की राजनीति क्षत्रपों की अगुवाई वाली राजनीति की रही है। इसमें ग्वालियर चंबल अंचल में सिंधिया का खेमा अधिक ताकतवर माना जाता था। जब तक कमान माधव राव सिंधिया के पास रही तब तो दूसरा कोई खेमा पासंग में भी नहीं लगता था। उनके निधन के बाद क्षत्रप ज्याेतिरादित्य सिंधिया बने तब से दिग्विजय सिंह चुनौती पेश करते रहे हैं। लेकिन घराने में बड़े होने के कारण पलड़ा सिंधिया का ही रहता है।  ऐसा भी नहीं कहा जा सकता है कि दिग्विजय की ताकत कम है। उनके साथ कार्यकर्ताओं का प्रदेशव्यापी जनाधार है और राजपरिवार के सदस्यों में उनकी या तो रिश्तेदारी है या स्वीकार्यता है। वैसे ये सभी राजपरिवार सिंधिया के पेराेल पर रहे हैं। ऐसे में यह ताकत बिखर जाती है।

2018 के विधानसभा चुनाव में सिंधिया ने सिद्ध कर दिया था कि वे इस क्षेत्र में आज भी प्रभाव रखते हैं। सिंधिया का चेहरा ही इस जीत का आधार बना था। सरकार बनने की स्थिति में मुख्यमंत्री कमलनाथ बन गये। यहीं से राजनीतिक विवाद शुरू हुआ और उसकी परिणीति गंभीर परिणाम के साथ हुई। राजनीतिक क्षेत्रों में यह स्थपित हो गया कि दिग्विजय सिंह  ने कमलनाथ के साथ िमलकर सिंधिया के लिए सभी दरवाजे बंद कर दिये और उन्हें भाजपा में जाने काे विवश कर दिया। अब दिग्विजय और सिंधिया के सामने खुला मैदान है। 2023 के आम चुनाव में नेताओं के रूप में शक्ति परीक्षण हो चुका है। उससे पहले उपचुनाव में भी कांग्रेस से सीटें छीन कर सिंधिया ने बता दिया था कि वे ही असल सरदार हैं। उनकी ही डंका बजता है इस अंचल में। लेकिन राजनीति में कब कोई हार मानता है।
दिग्विजय सिंह  कभी खुद व कभी अपने विधायक बेटे के माध्यम से सिंधिया को चुनौती पेश करते रहते हैं। हालांकि सिंधिया को कभी इस प्रकार की चुनौतियों से कोई परेशानी नहीं हुई है। भाजपा में आकर सिंधिया ने अपनी राजनीति करने की शैली में ही इतना बड़ा बदलाव कर दिया है कि भाजपा का कोई भी कार्यकर्ता उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा हो सकता है। इसके कारण भी दिग्विजय सिंह की चुनौती प्रभावहीन हो जाती है। फिर भी इस बात को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा सकता है कि दिग्विजय और सिंधिया के बीच की राजनीति का शक्ति परीक्षण होना ही चाहिए।

इस समय लोकसभा के चुनाव होने वाले हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया को भाजपा ने गुना शिवपुरी लोकसभा से अपना प्रत्याशी बनाया है। वे ताल ठोक चुके हैं। यहां पेड़ की आड़ लेकर राजनीितक युद्ध लड़ने की बजाए दिग्विजय को सीधे मैदान में उतरना चाहिए। हो जााने देना चाहिए शक्ति परीक्षण और पता चल जाने देना चाहिए कौन कितने पानी में है? जनता में स्वीकार्यता किसकी अधिक है। कौन का राजनीतिक भविष्य आने वाले समय के लिए जनता को स्वीकार है। भाजपा की ताकत और सिंधिया की लोकपि्रयता का सामने करने की स्थिति में दिग्विजय सिंह कितना दम रखते हैं। कांग्रेस की ताकत अब क्या बची है?

जिस प्रकार से प्रदेश कांग्रेस में भगदड़ मची है उससे यह कोई भी कह सकता है कि प्रदेश की दो दलीय प्रणाली को भाजपा एक दलीय जैसा बनाने की स्थिति पैदा कर रही है। कमलनाथ भाजपा के गेट से वापस आकर अपना आकार भी कम कर चुके हैं और प्रभाव भी। दिग्विजय सिंह कितनी चुनौती रखते हैं यह भी सामने आ जायेगा?

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