मध्यप्रदेश में कांग्रेस कोई मुद्दा सेट करने जैसी नहीं बना पा रही स्थिति नेता मौन !

अब यह चर्चा शुरू होने लग गई है कि मध्यप्रदेश में कांग्रेस चुनाव में अपना कोई स्टेंड तय नहीं कर पा रही है। वह ऐसा कोई मुद्दा तय भी नहीं कर पा रही है जिससे भाजपा का मुकाबला करती दिख जाये।

सुरेश शर्मा, भोपाल। अब यह चर्चा शुरू होने लग गई है कि मध्यप्रदेश में कांग्रेस चुनाव में अपना कोई स्टेंड तय नहीं कर पा रही है। वह ऐसा कोई मुद्दा तय भी नहीं कर पा रही है जिससे भाजपा का मुकाबला करती दिख जाये। प्रत्याशियों को उतारने के निर्णय में देरी हो रही है यह तो माना जा सकता है लेकिन कसरत में भी कमी दिखाई देने का बुरा संदेश मतदाताओं में जा रहा है। पार्टी जनता के बीच जाने का कोई ऐसा उपक्रम नहीं कर पा रही है जिसे मीडिया उठाये और प्रतिस्पर्धा दिखाने जैसा वातावरण बनाये। इससे इतर नेताओं की भाजपा की ओर भागने की प्रवृत्ति से पार्टी छवि खराब हो रही है यह नुकसान अलग से है। जब प्रदेश कांग्रेस की कमान जीतू पटवारी ने संभाली तब चर्चा शुरू हुई थी कि पार्टी युवा हो सकती है? उनका पदभार ग्रहण करने वाला आयोजन बड़ी खबर थी। इतनी लम्बा काफिला और भीड़ भाजपा के कान खड़े कर रहा था। युवा प्रयासों में कांग्रेस ने नेता प्रतिपक्ष भी युवा नेता उमंग सिंघार को बनाकर संदेश दे दिया था कि अब पार्टी प्रयोग करने में भी भरोसा रख रही है। लेकिन परिणाम वैसे नहीं आये। सदन तो कम दिन का हुआ इसलिए उमंग सिंघार ने जो किया उसे कमजोर नहीं कहा जा सकता है।

सवाल तो अध्यक्ष की जिम्मेदारी को लेकर उठ रहे हैं। स्वीकार्यता, संघर्ष के लिए तैयार करना और प्रभावशाली संगठन वाली सरकार के खिलाफ मैदान संभालना एक बड़ी चुनौती जीतू पटवारी के सामने थी। इन सबकों वे संभाल पाते इससे पहले ही चुनाव आ गये। यहां खास बात यह हो गई कि चुनाव के लिए अलग किस्म की चाल होती है और संगठन संचालन के लिए अलग किस्म की। अब चुनाव के लिए कार्यकर्ता को तैयार करने की मानसिकता ही नहीं बन पाई थी। नया नेतृत्व पुराने अनुभव को समेटे या अपना टैलेंट दिखाये यही समस्या सामने रही है। अब चुनाव में प्रत्याशी दिग्गज बनाये जायें या फिर नये चेहरे लाये जायें? यह दुविधा आज तक दिखाई दे रही है। ऐसे में चुनावी बाजी निकल रही है। पार्टी को चाहिए नये चेहरे मैदान में उतारे जायें और अगले चुनाव के लिए दमदार फसल तैयार किये जाने का प्रयास करे। लेिकन पुराने नेताओं का प्रभाव संगठन पर होने का खामियाजा कांग्रेस को भोगना पड़ रहा है। साथ में जीतू पटवारी कोई निर्णय लेने की स्थिति में दिखाई नहीं दे रहे हैं।

विधानसभा चुनाव का एक उदाहरण ले सकते हैं। कमलनाथ ने अपने बयानों के माध्यम से यह माहौल बना दिया था कि वे भी सरकार के प्रबल दावेदार हैं। इससे भाजपा के नेताओं को अतिरिक्त प्रयास करने पड़े थे डर बन गया था वो अलग से। लोकसभा चुनाव में जीतू पटवारी ऐसा कोई वातावरण नहीं बना पा रहे हैं। अभी भी तीन चुनाव में आजमाये मुद्दों को प्रवक्ता चैनलों पर बोलते हैं साथ बैठे सहयोगी हंसते हैं। इस तोता रटंत से कांग्रेस को नये मुद्दों की ओर आना चाहिए। प्रदेश में मुद्दों का अभाव होगा ऐसा भी तो नहीं है। इसलिए कांग्रेस बराबरी से चुनाव मैदान में है यह नेरेटिव सेट करने का प्रयास तो करना ही होगा।

इससे भी बड़ा संदेश जा रहा है कि कांग्रेस का केन्द्रीय और प्रादेशिक नेतृत्व पुराने दिग्गजों को मैदान में उतारने का प्रयास कर रहा है लेकिन हवा का रूख देखकर वे पीछे हट रहे हैं। यह उनके राजनीतिक जीवन का वही पल है जिसमें उन्हें हटना ही चाहिए और कांग्रेस युवा और नये चेहरे उतारे यह उसके लिए भी अवसर है लेकिन जन भावना के समझे बिना कांग्रेस वही कर रही है जिसमें जीत नहीं है। इसलिए अनुभवी नेताओं का मौन और जनता के बीच कोई संदेश न दे पाने की प्रादेशिक नेतृत्व की कमी खल रही है। जिससे नेता अपना नया ठिकाना तलाश रहे हैं?

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