‘छाेड़िए’ आम-वाम को मजे ले रहा है अपना ‘केजरीवाल’

राजनीति की लाभ-हानि आमतौर पर उसके प्रति बनी अवधारणा से होती है। वैसे भी राजनीति रपटन भरी राह है और उस पर कोई नेता फिसले मतलब वह किसी और मिट्टी का बना हुआ है? एक समय था जब दाग लगने पर राजनीति करना कठिन हो जाती थी

भोपाल। राजनीति की लाभ-हानि आमतौर पर उसके प्रति बनी अवधारणा से होती है। वैसे भी राजनीति रपटन भरी राह है और उस पर कोई नेता फिसले मतलब वह किसी और मिट्टी का बना हुआ है? एक समय था जब दाग लगने पर राजनीति करना कठिन हो जाती थी लेकिन अब तो दाग अच्छे हैं। अन्ना आन्दोलन के महायज्ञ से प्रकृट हुई आम आदमी पार्टी के बारे में अवधारणा यह स्थापित की गई थी कि यह भ्रष्टाचार से कोसो दूर रहेगी। जाति और धर्म की राजनीति नहीं करेगी। मतलब राजनीति की एक नई संस्कृति विकसित की जायेगी। यह पार्टी आम आदमी के लिए काम करेगी और उसे बराबर लाने की नीति बनायेगी। दिल्ली जैसी जगह पर जनता ने उसे इतना समर्थन दे दिया जो केजरीवाल से संभाले नहीं संभला। दूसरी बार भी लगभग उतना ही। दूसरी सरकार पंजाब में बनी उसको जनता ने उदारता पूर्वक समर्थन दिया। कई राज्यों में भी आप को पांव रखने लायक जगह मिली और यह पार्टी राष्ट्रीय राजनीतिक दल बन गया। यह तगमा मिलते ही अन्य दलों और मीडिया का ध्यान स्वभाविक था। दल तो देश में बहुत हैं। किसी के नेता ने नहीं कहा कि वे भ्रष्टाचार से दूर रहेंगे, किसी ने नहीं कहा कि सुख सुविधाओं से दूर रहेंगे। किसी ने नहीं कहा कि गरीब के घर खायेंगे भी और उसे बुलाकर खिलायेंगे भी।

एनजीओ चलाने वालों का यह समूह इतना सब कह तो रहा है लेकिन राजनीतिक पार्टी बनाकर कर पायेगा इसको लेकर संदेह पैदा हुआ। भ्रष्टाचार के मामले में दो मंत्री जेल में जा चुके हैं। उनको जमानत नहीं मिल रही है। केजरीवाल से भी पूछताछ हो चुकी है। पूछताछ ठीक वैसे ही चल रही है जैसी मनीष सिसोदिया का चली थी। कुछ भी सामने नहीं आया लेकिन अंदर हो गये। जमानत नहीं मिली। अब तो चार्जशीट में भी नाम आ गया। कब पूरक चार्जशीट में कोई और नाम आ जाये कहा नहीं जा सकता है। धर्म की राजनीति का उदाहरण क्या दिया जाये। मस्जिद में जाकर समर्थन मांगने वालों में केजरीवाल का नाम भी शामिल है। और तो और दिल्ली के दंगों में चेहरा किसका कितना बदरंग हुआ किससे छुपा है। नई राजनीतिक संस्कृति सामने आये उससे पहले ही नई अवधारणा ध्वस्त हो गई। आम आदमी का हित सोचने की अवधारणा को एक स्टिंग आपरेशन ने मटियामेट कर दिया। टाइ स नाउ नवभारत की ओर से एक स्टिंग किया गया जिसमें आम आदमी के तारणहार को विलासिता के लिए सरकारी धन को बेरहमी से खर्च करने का शर्मनाक घटनाक्रम सुना दिया।

गरीबों को सौ- पांच सौ की बिजल मु त देकर अपने बंगले में सुख सुविधाओं के लिए 45 करोड़ खर्च करने का कारनामा कर दिखाया। वियतनाम से मार्बल आयात किया गया। सुविधाओं को विकेन्द्रीकरण इस कदर किया कि पेरेंटस और चिल्डर्नस को के साथ समान व्यवहार किया गया। बेरहमी से दिल्ली के धन को अपनी सुविधाओं के लिए खर्चा किया गया। ऐसा और नेता भी करते होंगे लेकिन वे आम होने का ढ़ोग नहीं करते। आम आदमियों का मसीहा इतना विलासिता का जीवन जीना चाहता है? क्या यही असली चेहरा है। तब पुराने साथी इसी प्रकार की बात कह रहे हैं। केजरीवाल का मतलब आम आदमी जाये भाड़ में सत्ता मिली है तब न भोगना बेवकूफी है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button