‘नये’ दौर की भाजपा है अब बन रहे हैं नये ‘घराने’

सुरेश शर्मा, भोपाल। भाजपा के बड़े नेता स्वर्गीय कैलाश सारंग ने एक आयोजन में मुझे कहा था अब भाजपा काॅरपोरेट हो गई है तुम भी हो जाओ! सच में भाजपा नये दौर में प्रवेश कर गई। काम करने का तौर तरीका बदल गया। संगठन निर्माण का भी तरीका बदल गया। परिवार पहले संगठन को समझा जाता था अब परिवार का मतलब ही बदल गया। ऐसे में स्वभाविक है कि भाजपा के स्थापित घराने अपने आपको उपेक्षित महसूस करते होंगे। जिनकी नजर घुमाने से भाजपा की नीति बदल जाती थी उनके वंशज वैसा ही पार्टी में चाहेंगे तो इस काॅरपोरेट भाजपा में ऐसा नहीं होगा। इसे तो वोट मशीन और परिणाम मूलक विकास चाहिए। इसलिए स्थापित घराने खत्म होंगे और नये घराने बनेंगे। यह वह दौर है और इसी के साथ भाजपा में काम करने वाले नये पुराने नेताओं को चलना होगा। कुशाभाऊ ठाकरे युग कभी का चला गया, जब योगदान का सम्मान होता था आज आप कितने उपयोगी हैं इस कितने में आपकी कद्र है। इसलिए समय को परिवर्तनशील मानकर नये घरानों की बात सोचना शुरू कर देना चाहिए। दीपक जोशी की बात सही है कि उनके पिता मुख्यमंत्री पद से हटे तब तीन कमरों के मकान में परिवार को लेकर चले गये थे। भाजपा के ‘उन’ नेताओं ने जोशी जी को योजनानुसार संत राजनेता बना दिया था और वे जीवन-भर इसी ओरा में दबे रहे और सत्ता कोई और ले उड़ा।
यह समय परिर्वतन और नई राजनीति का दौर है। जब एक वोट से अटल जी की सरकार गिरी थी उसी दिन देश की राजनीति से नैतिकता दफन हो गई थी। अब इसका रोना रोने का कोई लाभ नहीं है। इस नये परिर्वतन में कांग्रेस से क्षत्रप और भाजपा से घरानों के समाप्त होने का दौर है। क्षत्रपों के कहने पर उनके लोगों को टिकिट दिये जाते थे आज सर्वे के आधार पर क्षत्रपों के ही टिकिट कट जाते हैं। खंडवा से अरूण यादव उदाहरण हैं। तब सत्ता पाना सीख चुकी भाजपा में घराने कैसे बचे रह जायेंगे? इसलिए दीपक जोशी हों या सुरेन्द्र पटवा कांग्रेस की दहलीज की तरफ देख रहें हैं इसमें नया कुछ नहीं है। इसका केवल मतलब यह है कि उन्होंने नये दौर को स्वीकार नहीं किया। यहां आपको ज्योतिरादित्य सिंधिया से सीख लेने की जरूरत है। उन्होंने भाजपा में भाजपाई बनने के लिए कितना कुछ छोड़ा है कितना कुछ नया अपनाया है। यही भाजपाई घरानों के चिरागों को करना होगा। कांग्रेस में तो इससे पहले भी कुसमारिया और सरताज सिंह भी गये थे और राकेश सिंह चौधरी भाजपा में आये थे कहां हैं आज?
बदलाव प्रकृति का नियम है। उसको स्वीकार करना ही होता है। जो कर लेता है वह आगे चल पड़ता है और नहीं स्वीकार करता है उसे कुंठित होकर गैर विचार के दल में शामिल होना होता है। विचार जैसे शब्द कहां उपयोग कर बैठे हम भी। यह तो बहुत पहले ही मर गया वह शब्द है। इसका दूसरे को समझाने के लिए उपयोग किया जाता है खुद पर यह कभी लागू नहीं होता। सत्ता का विचार केवल सत्ता ही होता है। इसलिए यह समझने वाली बात है कि जब सिंधिया को लेकर भाजपा ने सरकार बनाई है तब उसके साइड इफेक्ट की दवा तो तैयार कर ही रखी होगी। चुनाव के समय होने वाली भगदड़ के ऑपरेशन की तैयारी तो पहले से ही रखना होगी।

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