40 साल के भाजपाई साय कांग्रेस में गये कमलनाथ बोले थके नेताओं की जरूरत नहीं

संयुक्त मध्यप्रदेश और विभाजन के बाद छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष रहे वरिष्ठ आदिवासी नेता नंद कुमार साय ने सोमवार को कांग्रेस की सदस्यता ले ली। उन्होंने एक दिन पहले ही भाजपा की प्राथमिक सदस्यता छोड़ी थी।

(सुरेश शर्मा) भोपाल। संयुक्त मध्यप्रदेश और विभाजन के बाद छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष रहे वरिष्ठ आदिवासी नेता नंद कुमार साय ने सोमवार को कांग्रेस की सदस्यता ले ली। उन्होंने एक दिन पहले ही भाजपा की प्राथमिक सदस्यता छोड़ी थी। साय का आरोप है कि भाजपा में उनकी अनदेखी की जा रही थी और उनके खिलाफ षडयंत्र रचे जा रहे थे। साय को सदस्यता खुद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने दिलवाई है। उन्हें पूरे दिन विभिन्न आयोजनों में मुख्यमंत्री अपने साथ लेकर प्रदेश को यह बताते रहे कि साय आज से उनके साथ हैं। उनके इस प्रयास की मध्यप्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने यह कह कर हवा निकाल दी कि थके बुझे नेताओं की कांग्रेस को कोई जरूरत नहीं है हमें कार्यकर्ता चाहिए। इसे भाजपा के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है इसलिए प्रदेश भाजपा के नेता संभल कर अपनी बात रख रहे हैं। पिछले दिनों से सब स्वाद चख चुके नेताओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षा कुछ अधिक ही हिलौरे ले रही है। साय से पहले कर्नाटक में मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री जैसे पदों पर रह चुके नेता भी कांग्रेस की सदस्यता ले चुके हैं।

नंद कुमार साय का इस प्रकार जाना भाजपा के लिए बड़ा राजनीतिक झटका है। पार्टी छत्तीसगढ़ में सरकार बनाने के सपने देख रही थी। आदिवासी बाहुल इस राज्य में एक बड़े आदिवासी नेता का इस प्रकार पाला बदलना चुनाव के हिसाब से खतरनाक घटनाक्रम है। अभी यह आंकलन किया जाना शेष है कि साय के कांग्रेस में जाने से कांग्रेस को कितना फायदा होगा और भाजपा को कितना नुकसान होगा? साथ में यह सवाल भी उठेगा कि जिस नेता को पार्टी ने संयुक्त मध्यप्रदेश का अध्यक्ष बनाया, छत्तीसगढ़ का अध्यक्ष बनाया, तीन बार विधायक बनाया, तीन बार सांसद बनाया, दो बार राज्यसभा का सांसद बनाया और अनुसूचित जाति आयोग का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया। चालीस साल सत्ता भोगने के बाद उम्र के इस पड़ाव में वह यह कहे कि उनकी अनदेखी की जा रही है तब तो किसको क्या कहा जा सकता है। उम्र जब वाणप्रस्थ जाने की हो वह सत्ता सुख पाने के लिए दलबदल कर जायें यही राजनीति का विकृत्त चेहरा है। कमलनाथ ने इसी विकृत्त राजनीति पर चोट की है। युवा नेताओं का दलबदल करना भविष्य की चिंता से जोडक़र देखा जा सकता है। लेकिन इतने मजे चखने वाले का विपरीत विचार की पार्टी में शामिल होना राजनीतिक गिरावट ही है।

साय का कांग्रेस में जाना वहां पहले से स्थापित आदिवासी नेताओं के लिए खतरे की घंटी है। इसका असर आने वाले समय में दिखाई देगा। इसलिए छत्तीसगढ़ में इस सदस्यता मेगा शो का प्रभाव दो दिन बाद से दिखाई देगा। नंद कुमार साय पहले भी पार्टी छोडऩे की बात कर चुके थे। लेकिन उन्हें मना लिया गया था। इस बारे में पहली प्रतिक्रिया आई है पूर्व मुख्यमंत्री डा. रमण सिंह की। उन्होंने बहुत ही संभलते हुए कहा है कि हम उनके जाने के कारणों और होने वाले नुकसान का आंकलन करेंगे।

छग कांग्रेस उत्साहित हो सकती है। लेकिन राजनीतिक जानकार मानते हैं कि पार्टी अपने यहां होने वाली टूटफूट की भरपाई करने का प्रयास करना चाह रही है। जिन नेताओं की कांग्रेस छोडऩे की चर्चा है उसके प्रभाव को कम करने के लिए थके थकाये नेताओं को पार्टी की सदस्यता दिलाई जा रही है। अभी नंदकुमार साय के आने-जाने का किस दल के लिए कितना असर होगा इसका आंकलन करने में समय लगेगा। आदिवासियों का युवा नेतृत्व अधिक दिन तक पुराने पेड़ों के बोझ को सहने की मानसिकता में दिखाई नहीं दे रहा है और ये बोझ तले दबे खुद गिरने को तैयार नहीं हैं। यह चर्चा है कि सीएम बघेल के सताये कांग्रेस के एक बड़े नेता भाजपा में जा सकते हैं। साय को लाना उसी घाटे के प्रभाव को कम करना है।

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