संविधान में प्रस्तावना सहित 103 बदलाव…संविधान की रक्षा की बात चुनावी नारा भर…

भारत की राजनीति में बाबा साहेब अम्बेडकर के नाम का खूब उपयोग किया जाता है। जिस बाबा साहेब को लोकसभा के चुनाव में लगातार कांग्रेस ने पराजित किया उन्हीं बाबा साहेब के नाम का चुनावी लाभ के लिए उपयोग किया जाता है। इस बात को बहुत प्रचारित किया जाता रहा है कि भारत के संविधान की रचना बाबा साहेब ने की थी।

सुरेश शर्मा। भारत की राजनीति में बाबा साहेब अम्बेडकर के नाम का खूब उपयोग किया जाता है। जिस बाबा साहेब को लोकसभा के चुनाव में लगातार कांग्रेस ने पराजित किया उन्हीं बाबा साहेब के नाम का चुनावी लाभ के लिए उपयोग किया जाता है। इस बात को बहुत प्रचारित किया जाता रहा है कि भारत के संविधान की रचना बाबा साहेब ने की थी। बाबा साहेब ने जिसे बनाया था उसे बदलने की तैयारी की जा रही है। अनेकों राजनीतिक दल भाजपा की मोदी सरकार पर इस प्रकार के अथक आरोप लगा रहे हैं। संविधान देश और सरकार की व्यवस्थाओं के लिए बनाया जाता है। अच्छी बात यह है कि भारत का संविधान लिखित है और इसे लम्बी बहस के बाद स्वीकार कियाहुआ है। संिवधान सभा का गठन जब हुआ था सच्चिदानन्द सिन्हा इस सभा के प्रथम सभापति थे। किन्तु बाद में डॉ राजेन्द्र प्रसाद को सभापति निर्वाचित किया गया। भीमराव अंबेडकर को संविधान निर्माण समिति का अध्यक्ष चुना गया था। संविधान सभा ने 2 वर्ष, 11 माह, 18 दिन में कुल 165 दिन बैठक की। इसकी बैठकों में प्रेस और जनता को भाग लेने की स्वतंत्रता थी। भारत के संविधान में अब तक 103 संशोधन किए जा चुके हैं। 42वां विवादित संशोधन जो आपात काल में किया था उसमें संविधान की प्रस्तावना को ही बदल दिया गया था। हालांकि आपातकाल के बाद इस संशोधन को वापस सुधारने का काम हुआ लेकिन विवाद की बातों का समायोजन आज भी है। इसका मतलब यह हुआ कि बाबा साहेब द्वारा बनाया गया संविधान तो अपने मूल स्वरूप में है ही नहीं। इससे भी खास बात यह है कि 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू किया गया और पंडित नेहरू की सरकार ने इसमें एक साल बाद ही पहला संशोधन कर दिया था। इन तर्कों के बाद संविधान को बदलने की बात बेमानी हो जाती है और अम्बेडकर के संविधान को तो पहले ही बदल कर रख दिया गया है। यह प्रमाणित है।

इसे कोई भी अस्वीकार नहीं करता है कि बाबा साहेब अम्बेडकर भारत के संविधान निर्माता था। क्योंकि वे संविधान निर्माता समिति के अध्यक्ष जो थे। इस सभा में देश मर्धन्य नेताओं और ज्ञानविदों ने सहयोग दिया था। भारत का संविधान कई देशों खासकर बि्रटेन के संविधान की नकल भी है। इसलिए संविधान को आज लोकतंत्र का सबसे पवित्र ग्रंथ माना जाता है। संविधान को लेकर अवधारणाएं बनाने का प्रयास किया जाता है। संविधान एक दलित नेता ने बनाया था इसलिए यह दलितों के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बनाया जाता है। इसी प्रतिष्ठा के सवाल का राजनीतिक लाभ लेने का प्रयास किया जाता है। आजादी के बाद यह धारणा बनाई गई कि आजादी मिलने का आधार कांग्रेस है। जबकि इस तथ्य की अनदेखी की जाती रही कि देश की आजादी के लिए क्रान्तिकारियों भी बड़ी भूमिका रही है। उनके योगदान को जिस प्रकार से चर्चाओं से दूर रखने का प्रयास किया गया उसी प्रकार का रूख संविधान में अन्य किसी की भूिमका को लेकर भी किया गया। फिर भी किसी को इस बात पर आपत्ति नहीं है कि संविधान निर्माता बाबा ससाहेब का अथक प्रयास और उनके बौद्धिक कौशल का अनुपम उदाहरण हमारा संविधान है।

जब भारत का संविधान अंगीकार किया गया था तब इसमें 395 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियां थीं। इसमें एक लाख 45 हजार शब्द लिखे हुए थे। अब अनुच्छेद बढ़कर 470 और 12 अनुसूचियां हो गये। यह पहले से प्रचलन वाले अनुच्छेद के विस्तार के कारण बने हैं। जब संविधान को अंगीकार किया गया उसके एक साल के बाद ही इसमें पहला संशोधन हो गया। पंडित नेहरू की सरकार ने इसमें यह संशोधन किया था। यह जरूरी था और इसमें सहमति बन गई थी। इसके बाद यह सिलसिला चला और अब तक 103 से अधिक संशोधन हो चुके हैं। संविधान छलनी किया जा चुका है। उसके स्वरूप तक को बदल दिया गया है। जिस संविधान को बाबा साहेब अम्बेडकर ने बनाया था उसकी प्रस्तावना (प्रियंबल) को ही आपातकाल के समय बदल दिया गया था। यह संविधान का 42वां संशोधन था। देश में आपातकाल होने के कारण देश की लीडरशिप जेल में बंद कर दी गई थी और बहुत कुछ बदल दिया गया था। हालांकि आपातकाल समाप्त होने की स्थिति कुछ संशोधनों को संशाेधन क्रमांक 43 व 44 से सुधार लिया गया था। लेकिन प्रस्तावना के बदलाव को सुधारा नहीं गया। इसने देश के सामाजिक स्वरूप को प्रभावित किया जो आज तब राजनीतिक लाभ उठाने का आधार बना हुआ है।

बाबा साहेब अम्बेडकर ने जो प्रस्तावना लिखी थी वह संप्रभू, लोकतांत्रिक गणराज्य अंकित था। जिसे 42वें संशोधन के आधार पर बदलकर संप्रभू, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य कर दिया गया। इसे आज तक सबसे विवादित संशोधन माना गया। यह संशोधन मूलरूप से बाबा साहेब अम्बेडकर की भावना पर अतिक्रमण था। इसमें पंथनिपेक्ष शब्द को राजनीतिक रूप से भुनाया जा सकता है। इसे मुसलमानों का हिमायती शब्द बताकर राजनीतिक लाभ लगातार लिया भी गया। उस समय किसी ने भी यह कहने का साहस नहीं दिखाया कि पंथनिरपेक्ष शब्द का विलोपन कर िदया जाये। जनता पार्टी की सरकार में जनसंघ घटक के नेताओं को छोड़कर अन्य दलों के घटक इस पक्ष के पहले से नहीं थे। सबका मन मुस्लिम वोटों की फसल काटने के लिए लालाहित रहता था। इसलिए 43 व 44 वें संशोधन के बाद भी कुछ खास बातें बदलना रह गई। जिन संस्थाओं में अपनी शक्ति थीं उन्होंने अपने ऊपर आये संकटों को खुद ही बदल लिया। आपातकाल में न्यायपालिका के अधिकारों को कम करने का जितना प्रयास किया गया था न्यायालय ने उसे गैर कानूनी बताते हुए समाप्त कर पूर्व स्थिति बहाल कर ली थी। जो उस समय बच गये वे आजतक उसे भुगत रहे हैं।

जब भारत के संविधान और भारत की राजनीतिक अवस्थाओं का जिक्र होेगा इस बात की चर्चा जरूर करना होगी। भारत का बंटवारा धर्म के आधार पर हुआ है। देश के मुसलमानों ने मतदान करके पाकिस्तान मांगा था। लेकिन वोट पाक बनाने के पक्ष में देकर भी अनेकों मुसलमान वहां नहीं गये। उनकी आस्था पहले दिन से ही भारत के प्रति संदिग्ध थीं क्योंकि उन्होंने पाक बनाने का समर्थन किया था। उनका भारत में रहने के बाद भी आज का आचरण सवालों में आता है। इसलिए भारत के संविधान में गैर मुस्लिम पक्ष का अधिक बाेलबाला होना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। हिन्दुअों के लिए एक अलग से कानून बना दिया गया और मुसलमानों को संरक्षण देने के लिए वक्फ कानून बना दिया गया। शरीयत को प्रधानता दी गई लेकिन हिन्दू मैरिज एक्ट अौर वसियत की व्यवस्था की गई। मंदिरों पर सरकारी कब्जा करने का कानून बनाया गया अन्य पंथों के िलए कोई प्रावधान नहीं थे। तब देश पंथ निरपेक्षता का व्यवहार कैसे कर सकता है। इन्हीं कमियांे के कारण देश में यह शोर मचाया जाता है कि नरेन्द्र मोदी बाबा साहेब अम्बेडकर के संविधान को बदलना चाहते हैं।

जब आपातकाल में राष्ट्र के स्थान पर देश लिखकर संशोधन किया गया था तभी यह संदेश चला गया था कि संशोधन करने वाले भारत की राष्ट्र, वाली परिभाषा में भरोसा नहीं करते हैं। धारा 370 के माध्यम से देश की संपत्ति को अपने परिवारों के अधिकार में देने की भावना को अब आकर बदला गया है। जिसने देश में अलगाव के भाव पैदा कर दिये थे। देश का धार्मिक आधार बंटवारा होने के बाद भी भारत के कुछ क्षेत्रों के धार्मिक असन्तुलन ने विभाजन जैसे हालात पैदा कर रखे हैं इनको सुधारने के प्रयासों को बाबा साहेब के नाम का दुरूपयोग करके बचाव का प्रयास किया जा रहा है। संविधान संशोधन का मतलब यह कि उसे खत्म किया जा रहा है कैसे हो सकता हे। जब पहले ऐसा नहीं हुआ तो आज कैसे हो सकता हे। किसी भी देश का संविधान नहीं संस्कार, राजनीतिक अवधारणा और लोगों की जरूरतों के आधार पर बनता है। यदि समय के साथ अवधारणाओं में बदलाव होता है तब संविधान की धाराओं को भी बदलने का काम होता है। इसे निर्माण की योग्यता और उनके प्रति विश्वास से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। बाबा साहेब को संविधान बनाने के लिए उपयोग किया गया लेकिन चुनाव में जीतने नहीं दिया गया। उन्हें भारत रत्न देने की चिंता नहीं की गई। आज उन्हें यह चिंता क्यों है?

(लेखक हिंदी पत्रकारिता फाउंडेशन के चेयरमैन हैं) संवाद इंडिया

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