‘हिजाब’ पर इतना आगे क्यों बढ़ गई सांसद ‘प्रज्ञा’?

भोपाल (सुरेश शर्मा)। इस बात को मानने वालों की संख्या अधिक है कि जेएनयू से निकला विभाजनकारी विवाद शहीन बाग, किसान आन्दोलन होते हुए हिजाब विवाद के रूप में आगे बढऩे का प्रयास कर रहा है। किरदार बदल जरूर रहा है लेकिन कलाकार सभी जगह एक ही हैं। इसलिए हिजाब विवाद को अलग से समझा जा रहा है। मामला न्यायालय में है इसलिए सरकार अधिक कुछ करने की बजाए न्यायालय के आदेश की प्रतिक्षा कर रही है। जबकि राजनीतिक पार्टियां अपने वोट और सिद्धान्त के आधार अपनी-अपनी बातें कह रही हैं और स्टेंड ले रही हैं। कई सुर ऐसे हैं जिनको चर्चा मिल रही है और कई ऐसे हैं एक दिन छपते तो हैं लेकिन चर्चा में नहीं आ पाते हैं। भाजपा ने अपने नेताओं को कह दिया था कि जब तीन तलाक पर महिलाओं का समर्थन मिला था तब हिजाब पर महिलाओं की राजी-नाराजी का ख्याल रखने की जरूरत है। लेकिन जब यह लगा कि अधिकांश मुस्लिम महिलाएं इस बंधन से मुक्त होना चाहती हैं और आज की युवा लड़कियां उसमें अधिक हैं तब भाजपा के कुछ नेताओं ने बयान देना शुरू कर दिया। लेकिन तय यह हुआ कि देश संविधान के अनुसार चलता है किसी धार्मिक कानून से नहीं। लेकिन भोपाल की सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह अपने स्वभाव के अनुसार कुछ आगे तक निकल गईं।

एक टीवी चैनल पर भाजपा सांसद के बयान पर भाजपा की एक महिला प्रवक्ता से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि साध्वी के पास अपनी बात का कोई प्रमाण होगा इसलिए उन्हीं से पूछना चाहिए कि उन्होंने ऐसा क्यों कहा? अब यह जानना चाहिए कि आखिर भोपाल सांसद ने कह क्या दिया? साध्वी ने एक आयोजन में बोला कि हिजाब तो उन्हें घरों में पहनना चाहिए क्योंकि जहां बहन का नाता ही नहीं होता। जहां बुआ की लडक़ी, मौसी की लडक़ी, बाप की पहली बीवी की लडक़ी से शादी करने का चलन हो वहां हिजाब पहनना चाहिए। जहां सफेदी में खिजाब लगाने का चलन हो वहां हिजाब का चलन होना चाहिए। सनानत संस्कृति में तो महिला की पूजा करने का विधान है बहन का रिश्ता पवित्र होता है। नारियों की पूजा होती है वहां हिजाब की क्या जरूरत है? ज्ञान के मंदिरों का समीकरण बिगाडऩे का प्रयास ठीक नहीं है। अब सब बयानों से अधिक साध्वी के बयान की चर्चा चल निकली है। साध्वी को अपनी बात रखने का ऐसा ही सपाट तरीका आता है। वे सीधा कह देती हैु ताकि गले तो उतरे लेकिन निशान बनाते हुए।

अब सवाल यह उठता है कि आखिर सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को इस प्रकार से अपनी बात कहने का तरीका ही क्यों पसंद है? जिसने जैसा भोगा है वैसी ही उसकी भाषा होगी यह एक तरीका जरूर सुना है। हिन्दू आतंकवाद की थ्योरी जिस पर आजमायी गई हो। जिसे उसे स्वीकार करने के लिए टार्चर किया गया हो। तब भाषा में तीखापन तो आ ही जायेगा? इसलिए साध्वी की भाषा सपाट हो गई है। यह सच है कि उन्होंने जो कहा उसको चुभने वाला कहा जा सकता है लेकिन उन्होंने सच बोला या झूठ यह वाला सवाल किसी ने नहीं उठाया। किसी मुस्लिम स्कॉलर ने भी नहीं उठाया? फिर भी  यह तो कहा ही जायेगा कि साध्वी जनप्रतिनिधि हैं उनकी भाषा में तीखापन कम हो तो अधिक अच्छा रहेगा।

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