‘स्वामी’ की दंभोक्ति और अखिलेश की गेम ‘प्लान’

भोपाल (सुरेश शर्मा)। मकर संक्रान्ति को एक धमाका हुआ। भाजपा में इस्तीफों की पतझड़ सपा के आंगन की शोभा बन गई। यह ओबीसी वोट को प्रभावित करने की रणनीति थी जो चुनाव के बाद ही समझ में आयेगा कि कितना असर छोड़ पाई। भाजपा परेशान है या नहीं लेकिन दिखावा तो यह है कि उसे कोई फर्क पडऩे वाला नहीं है। जो भाग रहे है उनके तो टिकिट ही काटे जा रहे थे। जो भी हो यूपी की राजनीति का यही असल चेहरा है। आज जो भाजपा में मलाई चाट कर भाग रहे हैं वे कल सपा को भी ऐसे ही जलील करेंगे। इसका प्रमाण तो खुद स्वामी प्रसाद मोर्य ने ही अखिलेश के सामने दे दिया। मोर्य बोले पार्टी नहीं बनाई तो क्या वे किसी पार्टी से कम नहीं हैं। इससे यही लगता है कि अखिलेश का गेम प्लान इस बार किसी भी हालत में सत्ता में आना ही है। बापू कार्यालय में दिखने लग गये लेकिन बापू से अलग कराने वाले प्रो. रामगोपाल नहीं दिख रहे। शिवपाल सीटों की मिन्नत कर रहे हैं क्योंकि बेटा को विधायक देखना चाहते हैं। इसमें भाजपा का कहना है कि परिवार के लिए टिकिट मांगने वालों का परिवार की पार्टी में ही ठिकाना हो सकता है। इस बार भाजपा के पास यूपी में संगठन भी है, कार्यकर्ता भी है और जनाधार भी। राम मंदिर जैसा यूपी को दिया हुआ उपहार भी। ऐसे में अखिलेश के सामने बटोरा-बटोरी ही विकल्प है।

स्वामी प्रसाद मोर्य भाजपा के मंत्री थे अपने समर्थकों के साथ सपा में शामिल हो गये। इस ठसक के साथ कि वे किसी पार्टी से कम नहीं हैं। मतलब भाजपा यह नहीं समझे कि स्वामी व्यक्ति हैं वे संगठन हैं और सपा भी यह न समझे कि एक स्वामी प्रसाद आया है एक संगठन आया है। मतलब खुद मुगालते में रह सकते हैं और सपा-भाजपा को मुगालता नहीं पालना चाहिए। अब सवाल यह उठता है कि सामाजिक राजनीति करने वाले समाज के ठेकेदार नेता खुद मलाई खायेंगे और अगले ठिकाने पर जाने से पहले समाज को भडक़ा कर फिर पांच साल के लिए फसल काट लेंगे? इसका उत्तर देने की स्थिति में कभी समाज आयेगा? भाजपा को बड़ी चुनौती है। लेकिन भाजपाई नहीं मान रहे हैं। उनका कहना है कि मंत्री के रूप में जिनका कोई प्रफारमेंश ठीक नहीं है उनका टिकिट काटा जा रहा है। स्वामी के बेटे को लांच करना भाजपा का काम नहीं है। इसलिए उनको तो समर्थकों के साथ जाना ही था। भाजपा देश में ऐसे प्रयोग कर चुकी है। जहां संगठन नहीं था वहां उधार के नेता लिये। संगठन तैयार करके उधार चुका दी गई। यूपी में अब भाजपा अपने दम पर लडऩे की पोजीशन पर आ गई है।

यही कारण है कि सपाई उधार बटोरने में लगे हैं। लेकिन यदि हिसाब लगाया जाये तो अन्तत: सपा कार्यकर्ता को मिल क्या रहा है? कितनी सीटें सहयोगियों को दे देंगे। बची हुई बागियों को, कुछ परविार ले लेगा तो जनता में काम करने वालों को क्या मिलेगा? अखिलेश सत्ता के घोड़े पर सवार होने के लिए जिस प्रकार का गेम प्लान कर रह हैं वह राजनीति के चाणक्य अमित शाह की मुस्कान से समझा जा सकता है। पिछले दो लोकसभा और एक विधानसभा चुनाव के लिए उनकी रणनीति पर ही जनता ने मुहर लगाई है। एक और समझने वाली बात है कि अखिलेश इतने बड़े परिवार के बाद भी अकेले कसरत करते क्यों दिख रहे हैं? कोई साथ क्यों नहीं है?

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