स्क्रेनिंग की आड़ ले दिल्ली शिफ्ट हुई कांग्रेस

नाराजगी भुनाने का मैकेनिज्म तैयार नहीं कर पाई कांग्रेस
भोपाल। [विशेष प्रतिनिधि] राजधानी के बहुत सारे पत्रकार प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में जाकर समाचार पत्रों के लिए कवरेज कर रहे हैं। कुछ से बात करने की कौशिश हुई। परिणाम यह निकला कि प्रदेश में सरकार को लेकर नाराजगी है। लेकिन यह नाराजगी कांग्रेस के लिए प्रो नहीं बन पा रही है। स्क्रेनिंग का बहाना है और कांग्रेस के दिग्ग्ज नेता दिल्ली में जाकर काम कर रहे हैं। कारण सिंधिया और नाथ का निवास वहीं पर है। जब इतने सर्वे हो चुके हैं तब स्क्रेनिंग को इतना समय क्यों दिया जा रहा है? डर है कि प्रत्याशियों को भाजपा अपने पाले में न मिला ले। इसलिए माहौल को अपने हाथ से खिसकाने को कांग्रेस तैयार हो रही है?
पांच ऐसे पत्रकारों से बात हुई है। जो अपने समाचार पत्रों के लिए प्रदेश में कवरेज करने के लिए गये थे। उनकी एकमत बातों को समाचार का आधार बनाया जा रहा है। सबसे पहली बात यह है कि प्रदेश में सरकार विरोधी वातावरण है जिसे एंटरइनकंबेंसी कहा जाता है। लेकिन इसके बाद भी कांग्रेस के पक्ष में वातवरण कहीं पर दिखाई दिया हो ऐसा नहीं लगा। पहले तो मतदाताओं को लगा कि कांग्रेस गंभीर विषयों का उठायेगी और वे साथ देंगे लेकिन कांग्रेस का नेतृत्व ऐसा करने से चूक गया। इसमें तर्क दिया गया कि पेट्रोल के दाम जब 70 प्लस थे भाजपा ने वातवरण बना दिया था। अब 90 प्लस में भी कांग्रेस वह वातावरण  नहीं बना पा रही है। अब तो यह विषय शान्त जैसा हो गया है।
सरकार के विरोध का वातावरण बना है लेकिन कांग्रेस का नेतृत्व उसे पार्टी के पक्ष में मोडऩे के लिए निकला ही नहीं है। जिससे प्रदेश में कांग्रेस के लिए वातावरण बना हो ऐसा कहीं भी अधिक दिखाई नहीं दिया। कई स्थानों पर तो लगा कि कांग्रेस हाथ आई सत्ता को अपने कारणों से ही वापस भाजपा को देने जा रही है। इन पत्रकारों ने कहा कि फिल्ड में कांग्रेस का नेतृत्व पहुंच ही नहीं पा रहा है।
जिन नेताओं को चुनाव लडऩा है उनको मैदान में सक्रिय किया जा सकता था। इसके लिए कांग्रेस ने कहा था कि वे हारने वाली सीटों पर पहले प्रत्याशी उतार देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया है। पार्टी को डर है कि उकाधस दमदार प्रत्याशी भी भाजपा ने अपने पाले में मिला लिया तो किरकिरी होगी। किरकिरी से बचने के लिए सरकार आने का मौका छोड़ा जा रहा है।
स्क्रेनिंग के प्रयासों की बार बार खबर दी जा रही है। लेकिन स्क्रेनिंग के लिए इतने अधिक दिन देने की क्या जरूरत है। सूत्र बताते हैं कि राहुल गांधी के सर्वे के आधार पर प्रदेश के नाम नहीं मिल पा रहे हैं। नेता अपने नामों से पीछे हटने को तैयार नहीं है। इसलिए स्क्रेनिंग ही चल रही है।
कांग्रेस में गुटबाजी का आलम यह है कि दिग्विजय समर्थक नेताओं का तालमेल बिगड़ रहा है। जीतू पटवारी का वीडियो यह बताने के लिए पर्याप्त है कि कमलनाथ द्वारा संगठन को संभालने का प्रयास विफल हो गया। चैनलों का सर्वे भी कमलनाथ को सिंधिया से इतना पीछे बताया जा रहा है कि उन्हें दिल्ली में बैठकें करना ही बेहतर दिख रहा है।

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