‘सोनिया’ के पांच ठोस सुझावों में राजनीति भी, ‘खीज’ भी

भोपाल। कोरोना के प्रभाव के कारण देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सभी राजनीतिक दलों से सुझाव मांगे हैं। उनमें महत्वपूर्ण बात यह है कि सुझाव वर्तमाान परिस्थियों में आर्थिक सुधार के साथ समस्या से निपटने के लिए भी सुझाव मांगे गये हैं। सबसे अधिक चर्चित कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी के सुझाव ही रहे हैं। उनके सुझावों के बाद किसी और नेता ने सुझाव दिये वे गौण ही दिखे। कारण यह कि श्रीमती गांधी के सुझावों में सुझाव नाम की कोई चीज नहीं है बल्कि राजनीति और खीज का समावेश है। उनका सबसे पहला सुझाव मीडिया के सभी वर्गों को मिलने वाले विज्ञापनों को दो साल तक के लिए बंद करने का है। दूसरा नई संसद बनने से रोक दिया जाये यह मत दिया गया। तीसरा कर्मचारियों की तन्खा को छोड़कर सभी मदों में 30 प्रतिशत की कटौती की जाये। चौथी में विदेश यात्राएं नहीं होना चाहिए और पांचवा सुझाव दिया है कि और पीएम राहत फंड को राष्ट्रीय राहत फंड जो पहले से चल रहा है उसी में शामिल कर लिया जाये। ये सभी सुझाव ठोस बताने का प्रयास किया गया लेकिन इसमें अतिरिक्त आय का कोई सुझाव नहीं था। इसमें स्वभाविक रूप से खीज दिखाई दी और ऐसी राजनीति की गई जिसको समझ तो सभी रहे हैं लेकिन विरोध करने की जरूरत नहीं समझी गई। हां मीडिया जगत ने सोनिया गांधी की तीखी आलोचना की है।

सोनिया गांधी ने अपने पत्र में सबसे पहला सुझाव ही दिया है कि मीडिया के सभी वर्गों को दो साल के लिए विज्ञापन बंद कर दिये जायें। मतलब लाखों पत्रकारों को बेरोजगार कर दिया जाये। मतलब मीडिया जगत को अर्थहीन करने के अर्थहीन कर दिया जाये। यह विनाशाकारी सोच किसके सुझाव पर सोनिया गांधी के जहन में आई यह या फिर आपातकाल की मानसिकता को करीब से देखने के कारण वह मानसिकता अन्दर पल रही थी इस कारण उन्होंने कहा है। यह भी हो सकता है कि प्रधानमंत्री मोदी की मीडिया में अधिक उपस्थिति से उनको खीज हो इसलिए वे ऐसा कहने को विवश हो गईं। जो भी यह सोच अलोकतांत्रिक और मीडिया विरोधी है। इसकी आलोचना कई संगठनों द्वारा की गई है। इसी प्रकार से विदेश यात्राओं को लेकर की जाने वाली टिप्पणी और पीएम केयर्स फंड को राष्ट्रीय राहत फंड में बदलने की बात कांग्रेा की पुरानी मांग थी। इसको सुझाव के रूप में लिखने में कोई नयापन नहीं है। यह कांग्रेस की राजनीति का इशारा था जो प्रधानमंत्री पर बार-बार किया जाता रहा है। इसलिए सोनिया गांधी के द्वारा इस प्रकार का पत्र लिखवाने वालों की सोच उन्हें नासमझ दिखाने वरली है।

देश में कांग्रेस का ग्राफ गिर रहा है। इसका कारण भाजपा या प्रधानमंत्री की तुलना में वैचारिक दिवालियापन। जनता में राहुल गांधी और सोनिया गांधी की अपील विश्वनीय न होकर मोदी की अपील अधिक विश्वास के योग्य रहती हैं। इसके लिए प्रतीत होना चाहिए कि कहने वाला शुद्धमन से बोल रहा है। इस प्रकार का पत्र एक प्रमुख राजनीतिक दल को अविश्वसनीय और कुंठाओं से भरा नेता ही मानेगा। बाकी के तीनों सुझाव भी इसी मानसिकता को प्रमाणित करते हैं। यही कारण है इन कथित ठोस सुझावों को सबसे अधिक आलोचना का शिकार होना पड़ा है।

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