‘सिद्धु’ नहीं संभले तो कन्हैया को कैसे संभालेंगे ‘राहुल’

भोपाल (सुरेश शर्मा)। यह हो सकता है कि राहुल गांधी कांग्रेस का चाल, चरित्र और चेहरा जिस प्रकार का बनाना चाहते हैं वह लेखकों की समझ में नहीं आ रहा हो? यह भी हो सकता है कि कांग्रेस के पुराने और सोच समझ रखने वाले नेताओं को भी यह बात समझ में नहीं आ रही हो कि राहुल कांग्रेस का कायाकल्प जिस प्रकार का करना चाह रहे हैं वह गांधी-नेहरू-इंदिरा की कांग्रेस बच पाए? इसके बाद भी यह सवाल तो बनता है कि जब राहुल गांधी का पंजाब प्रयोग धड़ाम हो गया और वे नवजोत सिंह सिद्धु को नहीं संभाल पाए तब कन्हैया जैसे उदंड और वाचाल को कैसे संभाल पाएंगे? जो कन्हैया कांग्रेस में शामिल होते समय उसी के मंच से बार-बार यह कह रहा हो कि मैं तो कांग्रेस को बचाने के लिए उसमें शामिल हो रहा हूं। देश को बचाना है तो कांग्रेस को बचाना जरूरी है। यह कांग्रेस गांधी परिवार से नहीं बच पा रही है यह बात तो जी-23 के नेताओं ने भी कही थी लेकिन जिनको सहारा बनाकर राहुल गांधी कांग्रेस की नई छवि बनाना चाह रहे हैं वे भी यही मानकर आ रहे हैं कि कांग्रेस बचाने में राहुल गांधी का साथ देना है। तब तो मनीष तिवारी सरीके नेताओं को बोलना ही पड़ेगा। मनीष भाई ने बोलकर बता दिया कि 'जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी इतिहास'।

जब गुजरात जैसे राज्य में कांग्रेस का हायकमान आन्दोलनकारी हार्दिक पटेल को कांग्रेस की कमान सौंप रहा था तब भी समीक्षकों ने लिखा था कि सारी कांग्रेस हार्दिक के सामने कैसे नत्तमस्तक हो पाएगी? जब सिद्धु को पंजाब की कमान दी और सबसे विश्वस्त अमरिन्द्र सिंह को बेइज्जत करके मुख्यमंत्री के पद से हटने को विवश किया उस समय भी लिखा गया था। यह प्रयोग राहुल की परीक्षा है कितना पास हो पाएगा? लेकिन वह उसी दिन फेल हुआ जिस दिन राहुल गांधी प्रयोग को आगे बढ़ा रहे थे। जिस कन्हैया पर देश विरोधी नारे लगाने का आरोप है। जिसका देश भर में विरोध करने वाली एक लॉबी पहले से सक्रिय है। तब उसके अपराधों को कांग्रेस अपने पाले में क्यों लाना चाहती है? यह सवाल पहले दिन से ही उठने लग गया है? इसका उत्तर कोई भी कांग्रेसी अभी देना नहीं चाहता है। क्योंकि उसे अपने नेता राहुल गांधी पर भरोसा है। कुछ दिन पहले पंजाब का समाधान निकालने के लिए राहुल की जय-जयकार हो रही थी आज लोग ठोको ताली कह रहे हैं। तब फिर से यही सवाल उठ रहा है कि राहुल गांधी के कंधे कांग्रेस का बोझ उठा सकते हैं? उनका बौद्धिक स्तर वैश्विक तो क्या देशीय राजनीतिक झमेलों का तोड़ खोज पा सकेगा?

यदि सहज जवाब खोजा जाए तो एक ही बात तत्काल सामने आ रही है कि मोदी विरोध के मुखर चेहरे राहुल की पंसद हैं। राहुल गांधी खुद को नरेन्द्र मोदी का विकल्प बनाने के लिए प्रयासरत हैं। तब उनके साथ सिंधिया, जितिन और मिलिंद नहीं हार्दिक, कन्हैया और जिग्नेश ही हो सकते हैं। दिग्विजय सिंह जैसे टीकाकार और सुरजेवाला जैसे वार्ताकार साथ रखने के बाद राहुल गांधी मोदी का विकल्प बन पाएंगे इसको लेकर संशय उठाने वालों की कमी नहीं है। फिर भी इस प्रयोग का परिणाम देखने में क्या हर्ज है? यह सवाल तो बना ही रहेगा कि जब सिद्धु को नहीं संभाल पाए तो कन्हैया को कैसे संभालेंगे राहुल?

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