सिंधिया पर भाजपा कांग्रेस की रणनीति कौन आगे

भोपाल। विशेष प्रतिनिधि
यह सर्वविदित ही है कि मध्य प्रदेश में चल रही कमलनाथ की सरकार सिंधिया की बगावत के कारण ही गिरी है। सिंधिया के साथ बगावत करने वाले 22 विधायकों के साथ अन्य 6 विधायकों को मिलाकर कुल 28 विधानसभा के उपचुनाव हो रहे हैं। इन उपचुनाव के केंद्र बिंदु में ज्योतिरादित्य सिंधिया को होना था। कांग्रेस पहले दिन से ही उन्हें गद्दार कहकर घेरने का प्रयास करने लगी थी। भाजपा की रणनीति चुनाव को सिंधिया पर केंद्रित न होने देने की थी। जब आज चुनाव प्रचार चरम पर है तो यह साफ दिखाई दे रहा है कि कमलनाथ सिंधिया को घेरने की रणनीति में सफल नहीं होते दिख रहे हैं। भाजपा सिंधिया के राजनैतिक प्रभाव का लाभ तो उठा रही है लेकिन उन्हें कांग्रेसी हमलों से बचाने के चक्रव्यू के साथ।

प्रदेश के कमलनाथ की सरकार की डेढ़ साल में ही विदाई हो गई। कारण सबके सामने है कि उन्होंने सिंधिया को चुनौती दी। सिंधिया ने वह चुनौती स्वीकार की और सड़क पर उतरने की बजाय सरकार को ही सड़क पर ला दिया। तभी से कांग्रेस सिंधिया को गद्दार कहकर वापसी की उम्मीद लगाए बैठी थी कमलनाथ सहित अन्य नेताओं के अधिकार अधिक चुनावी दौरे भी ग्वालियर चंबल अंचल में ही हो रहे हैं लेकिन जब आप चुनाव प्रचार अंतिम दौर में पहुंच गया है तबीयत साफ दिखाई दे रहा है कि कांग्रेस और कमलनाथ सिंधिया को घेरने में कामयाब नहीं हो पा रहे हैं भाजपा के चक्रव्यूह में फंसे हुए कमलनाथ बनाम शिवराज के चुनाव हो गए हैं शिवराज सिंह चौहान ने बड़ी चतुराई से खुद को मध्य प्रदेश का बेटा और कमलनाथ को बाहर से आया हुआ उद्योगपति सिद्ध कर दिया है यह भी साथ में तक माल लगा दिया कि वे मध्य प्रदेश को चारागाह समझते हैं इस प्रकार कांग्रेश अपनी रणनीति में सफल नहीं हो पाई और भाजपा उसे अपने चक्रव्यूह में फंसाने में कामयाब हो गई।

चुनाव संभावनाओं की तराजू पर तोल कर ही परिणामों की अपेक्षा की जा सकती है अभी तक कांग्रेस यह मानने को तैयार नहीं है कि उसकी सरकार में वापसी संभव नहीं है कमलनाथ और उनके रणनीतिकार कम सीटें आने पर कैसे सरकार में वापसी करेंगे इस योजना पर भी काम कर रहे हैं। भाजपा को सरकार बचाए रखने के लिए जितनी सीटों की जरूरत है वह सब तो ग्वालियर चंबल अंचल के बाहर से ही मिल जाने की संभावना है जिस पर कांग्रेस का फोकस कम है। कमलनाथ और कांग्रेस की रणनीति चुनाव के फोकस में सिंधिया को रखने की थी और उनका दल बदल संगठन के साथ विश्वासघात और मुख्यमंत्री ने बन पाने के कारण कांग्रेश के साथ विद्रोह हो जैसे मूर्ति इस क्षेत्र में उछाले जाने की संभावना थी लेकिन जबरा कांड के बाद कमलनाथ और उनके रणनीतिकार अपनी योजना से विमुख हो गए और चुनाव केंद्र में शिवराज और कमलनाथ आ गए राजनीतिक समीक्षकों का मानना है कि कमलनाथ और शिवराज के बीच में यदि राजनीतिक जंग होती है तब 15 साल तक जनता के बीच में रहने वाले शिवराज को चुनौती देना कठिन कार्य है फिर भी मतदान का निर्णय मतदाताओं पर निर्भर करता है इतना जरूर स्पष्ट हो गया है कि कांग्रेस सिंधिया को घेरने में नाकामयाब हुई है और भाजपा सिंधिया के राजनीतिक प्रभाव का लाभ उठाने के बावजूद उन्हें सुरक्षित रखने में कामयाब हुई है।

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