‘सहज’ नहीं पंडितों पर असहज व्यक्तित्व की ‘टिप्पणी’

भोपाल (सुरेश शर्मा)। याद ही होगा जब अटल बिहारी वाजपेयी की केन्द्र में सरकार थीं और संघ प्रमुख के साथ उनका टकराव हुआ था। लेकिन न अटल जी को कोई प्रभावित कर पाया और न ही संघ अधिक दिन तक टकराव ही रख पाया? कारण यह था कि देश में अटल जी का अपना विराट व्यक्तित्व था। इन दिनों भी कमोवेश ऐसे ही हालात दिखाई देने लग गये हैं। संघ ने आडवाणी की तुलना में नरेन्द्र मोदी को अधिक करीब माना था और उन्हें पीएम इन वेटिंग का उम्मीदवार बनवाया गया। उन दिनों आडवाणी और इस चयन के समर्थकों के बीच किस प्रकार का द्वंद्व हुआ था किससे छुपा है। नरेन्द्र मोदी संघ के प्रचारक रहे हैं इसलिए उन्होंने सरकार को कुछ इस प्रकार से चलाया कि संघ की सभी बातों का एजेंडा बन गया और सरकार उन्हें पूरा कर रही है। न कोई विरोध और न ही भेदभाव। ऐसे में नरेन्द्र मोदी अब संघ की पहुंच से उपर निकल गये हैं। संभवतया यही एक ऐसा पक्ष है जो संघ प्रमुख को भी खल रहा है। इसका राजनीति पर विपरीत प्रभाव पडऩे वाले घटनाक्रम में समाहित होता दिखाई देता है। बिहार चुनाव से पहले आरक्षण को लेकर संघ्ज्ञ प्रमुख का बयान सुविचारित था। क्योंकि उसे संघ के मुखपत्र में प्रकाशित किया गया था। उसकी बातचीत हुई थी और उस अंश के सहित ही साक्षात्कार को प्रकाशित करने का निर्णय हुआ था।

आरक्षण मामला बिहार चुनाव में भाजपा के गले पड़ या और पार्टी को हार का सामना करना पडा था। यह बात दूसरी है कि पलटुराम भाजपा के साथ आ गये थे और वहां बाद में सरकार में भाजपा आ गई। अब एक बार फिर मोहनराव भागवत का बयान कमोवेश वैसा ही आया है। त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में भाजपा सरकार बनाये रखने की जद्दाकजहद कर रही है। ऐसे में पंडितों पर टिप्पणी करके संघ प्रमुख ने भाजपा का असहज कर देने का काम किया है। संघ के इतिहास में संघ प्रमुख के बयान पर सफाई देने का कोई उदाहरण नहीं मिलता। संघ का मिशन है और विजन भी बिलकल साफ होता है। ऐसे में उनके कथन का कोई स्पष्टिकरण नहीं होता है जो होता है वही वे बोलते हैं। इसलिए सफाई ने बात को बनाया नहीं बल्कि बिगाडऩे का काम ही किया है। कई समीक्षक तो इसे आरक्षण से ही जोडकर देख रहे हैं। जब जातियां ही नहीं होंगी तब आरक्षण अपने आप खत्म हो जायेगा। मतलब भागवत साहब की सुई आरक्षण पर ही टिकी हुई है। मोदी का बड़ा होना यहां प्रमुख कारण है। इससे संघ का मिशन और सरकार द्वारा उसे साकार करने का क्रम विफल हो सकता है।

भागवत साहब के बयान को रामचरित्र मानस विरोधियों ने लपक लिया है। वे फिर से हमलावर हो गये हैं। उनके बयान के मायने निकाल जा रहे हैं। जाति वर्ण के आगे का स्वरूप है जिसका निर्धारण पंडितों ने किया होगा यह अभी तक सामने नहीं है। फिर भी इस प्रकार का आरोप लगाया जा सकता है लेकिन अब इसका औचित्य क्या है? राजनीतिक विवाद और इस प्रकार  की टिप्पणी का कोई लाभ नहीं है। जबकि देश इन दिनों हिन्दू समाज के एकत्रीकरण के विरूद्ध राजनीतिक षडयंत्र से रूबरू हो रहा है। ऐसे में संघ का दायित्व और अधिक हो सकता है। लेकिन न जाने संघ प्रमुख विद्वान मतलब पंडितों को क्यों टारगेट कर रहे हैं?

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button