‘सरकारों’ की नजर से बहुत दूर हैं मध्यम श्रेणी के ‘लोग’

सुरेश शर्मा
भोपाल।
कल मध्यप्रदेश सरकार के शिक्षा विभाग का एक आदेश आया। जिसमें निजी शिक्षण संस्थानों को केवल टयूशन फीस लेने भर का आदेश दिया है। मतलब जो शो-शोबाजी की जाती है उसका चार्ज नहीं लिया जायेगा। आपको तो अनुभव होगा ही कि स्कूलें उन सबका शुल्क ले लेती हैं जो साल भर छात्र को सिखाना तो दूर की बात है दिखाया भी नहीं जाता है। लेकिन स्कूल का स्टेंडर्ड दिखाने के लिए अपने ब्रोसर में लिखवा दिया जाता है और अभिभावकों से उसका चार्ज ले लिया जाता है। हम दे इसलिए देते हैं कि हमें बताने में सुख व गर्व की अनुभूति होती है कि हमारे छात्र बेटे को यह सब भी सिखाया जाता है। ऐसी छूट अन्य प्रदेशों में भी मिली होंगी। लेकिन यदि यह छूट नहीं मिली होती तो यह तथाकथित मध्यम श्रेणी का मानव सरकार का क्या कर लेता? वह मतदाता तो होता है लेकिन उसकी मजबूरी यह है कि वह अमीर को भी प्रेरित करता है और गरीब को भी समझाता है। और खुद की विवशता में कहीं का नहीं रहता। यदि वह कभी कभार गुस्से में आता है तब मध्यप्रदेश जैसे परिणाम देता है जिसमें कांग्रेस ने भी सरकार होने का सुख भोग लिया और अब भाजपा भी भोग रही है। इस कोरोना काल को ही ले लीजिये। कितनी सहायता बंट रही है? सरकारें पैकेज दे रही हैं? स्कूलें फीस ले रही हैं? बिजली विभाग पिछली साल के हिसाब से बिल ले रहा है। बेचारा चूं भी नहीं बोल रहा है।
मैंने खूब कौशिश की कि नरेन्द्र मोदी के पैकेज में मध्यम श्रेणी के लिए आखिर कितना क्या है? कोई राहत है क्या? नहीं दिखी। राहुल गांधी की नकदी देने की योजना और फुटपाथ बैठने की राजनीति में मध्यम श्रेणी की याद आई क्या? नहीं दिखी। ममता की धार्मिक राजनीति हो या फिर अखिलेश की अपने तरीके की राजनीति में यह बेचारा मध्यम श्रेणी का व्यक्ति कहीं भी फिट नहीं हो रहा है। इसकी हालत तो पत्रकार की भांति हो गई जो राहत सामग्री बंटती देखता है, खबर छापता है लेकिन यह पता है कि सरकार ने बिलों का भुगतान नहीं किया है और संस्थान ने 30 प्रतिशत वेतन काट लिया है तब भी बंटता पैकेट घर ले जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता है। जब कोई टिप्पणी करता है कि यह मध्यम श्रेणी हिन्दूस्थान के नक्शे से खत्म तो नहीं होने जा रहा है? पीड़ा व अचरज होता है। कोरोना काल में उसके खाते का बेलेंस खत्म हो चला है। उसकी जुबान अभी भी बड़ी ही है। बड़ी-बड़ी बातें करने के लिए। शर्मनाक यह है कि हजारों करोड़ की राहत लेने के बाद भी बिजली विभाग पिछली साल के हिसाब से बिल भेज रहा है चाहे पिछले तीन महीने में खपत कुछ भी या कम ही क्यों न हो। मतलब मध्यम श्रेणी के लिए कौन सामने आयेगा?
व्यापार के चक्र को समझना होगा। उत्पादक, विक्रेता और क्रेता? ये क्रेता कौन है? वही मध्यम श्रेणी वाला। क्योंकि उच्च श्रेणी तो उत्पादक है। मध्यम श्रेणी वाला विक्रेता भी है और क्रेता भी। गरीब तो राहत से काम चला लेता है। अभी तो उसकी पौ-बारह है। इसलिए सरकार का फार्मूला जो भी हो बिना मध्यम श्रेणी को सोच के केन्द्र में किये बिना उद्धार संभव नहीं है। कोरोना से देश को कब और कितना नुकसान होगा यह तो बाद में ही पता चलेगा लेकिन मध्यम श्रेणी नाम की श्रेणी खत्म होने की स्थिति में पहुंच चुकी है। गांठ में कुछ बचा नहीं है ऐंठ इतनी की मोदी से नीचे टिप्पणी ही नहीं करता है। दिन भर एक टिप्पणी के बाद ठसक में रहता है और शाम को जब परिवार पूछता है क्या पाया? तब जुबान सूख जाती है। अपनी बात कहने की हिम्मत नहीं है चीन को सबक सिखाने की बात करता है। इसलिए जरूरी यह है कि अपनी भी सोचे और मध्यम श्रेणी को बचाने के लिए कोई पहल भी करें।

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