‘सरकारें ‘ विश्वास जुटाना नहीं चाहती या ‘अविश्वनीय ‘ हो गईं

(सुरेश शर्मा)  भोपाल।

जब कोरोना से देश बहुत डरा हुआ था। सरकारों के पास लॉकडाउन के अलावा कोई और रास्ता नहीं था तब दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने यूपी और बिहार के लोगों को अपने राज्य में पहुंचाने की बात कह कर भीड़ को एकत्र कर दिया था। मीडिया ने देश भर में चिन्ता व्यक्त करते हुये कहा था कि लापरवाही देश को महंगी पड़ सकती है। मरकज मामले में जब एक ही स्थान पर सब लोग थे तो उन्हें वहीं सील करके ईलाज करने की बजाये केन्द्र सरकार ने कैसे उन्हें निकल जाने दिया यह भी सवाल उतना ही गंभीर बना रहा है? लाकडाउन की घोषणा का प्रभाव किन-किन पर गंभीर रूप से पडऩा था और उनकी व्यवस्था क्या होगी यह पहले विचार किया ही गया होगा? लेकिन राज्यों की सरकारों ने अपने यहां काम कर रहे मजदूरों को दो वक्त की रोटियां तक मुहैया नहीं कराई इसलिए अपने घरों की ओर पैदल चलने की बड़ी समस्या को देश ने देखा। अब रेल चलाई गई तो उनका किराया कौन देगा इसको लेकर राजनीति हुई? कांग्रेस सुप्रीमों कह रही हैं कि उनकी पार्टी मजदूरों का किराया देने को तैयार है लेकिन वे किसको किराया देंगी इस पर उनकी कोई रणनीति नहीं है। सरकारें किराया देने की बात कर रही हैं लेकिन मजदूर खरीदी हुई टिकिट दिखा कर व्यवस्था को ठेंगा दिखा रहा है। इस महामारी में निर्लज्ज रेलवे हिसाब कर रहा है। मतलब न तो विश्वास है और न ही कोई विश्वास अर्जित करना चाहता है।

जब सड़कों पर मजदूर पैदल अपने-अपने घर को निकला है तब यह मानना चाहिए कि उसका सरकार नाम की संस्था पर कोई भरोसा नहीं है। सरकारें कह रही हैं कि उसके भोजन की व्यवस्था होगी। उसे रेल से मुफ्त घर तक पहुंचाया जायेगा। यूपी सहित कई राज्यों की बसें देश भर से अपने मजदूरों को लेकर आ रही है इसके बाद भी विश्वास का संकट पैदा होता ही जा रहा है। मध्यप्रदेश के डेढ़ दर्जन मजदूर रेलवे टै्रक पर सो गये तो सदा के लिए ही सो गये। जबकि सरकार दावा कर रही है कि उसकी तो कई रेल गाडिय़ां ही प्रदेश में आ चुकी हैं। इसके बाद भी मजदूर पटरी के सहारे चलते गये और अनन्त यात्रा पर ही चले गये। सवाल यह उठता है कि सरकारें आखिर विश्वास पैदा क्यों नहीं करना चाहती हैं? महाराष्ट्र की उद्धव सरकार यदि इन मजदूरों को खाना-रहना उपलब्ध करा देती तो वे कुछ दिन और बिता लेते महाराष्ट्र में। यदि दिल्ली की सरकार बिहार यूपी के मजदूरों को घर नहीं भेजती तो देश में कोरोना के आंकड़ों को कम रखा जा सकता था। लेकिन सरकारों पर विश्वास जम ही नहीं पा रहा है। जमें भी कैसे? सरकार तो केवल आदेश मनवाने की बात कर रही हैं लेकिन मानने वाले की हालात क्या हैं यह कौन समझेगा?

विपक्ष का सवाल उठाना अधिकार है। लेकिन यह तो बताना ही पड़ेगा कि जब आम आदमी के घर का राशन खरीदने की क्षमता खत्म हो जायेगी तब उसका विकल्प क्या है? जब छोटे रोजगार धंधों में कर्मचारियों को सैलरी देने की क्षमता खत्म हो जायेगी तब उसका समाधान क्या है? जब मजदूरों को अपने राज्यों में समायोजन नहीं होगा तब उनका क्या होगा? यह बड़ा संकट सामने आने वाला है। वातानुकूलित कमरों की योजना में सैंकड़ों कोस की यात्रा करने वाले मजदूरों को स्थान कहां होगा? इसलिए आज का सबसे बड़ा सवाल यही है कि सरकारें विश्वास अर्जित नहीं करना चाहती हैं या फिर अश्विसनीय ही हो गईं हैं?

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