सत्ता के लिए हिंसा की राजनीति का केन्द्र बना बंगाल, ममता की राजनीति पर गंभीर सवाल?

[सुरेश शर्मा] यह नहीं कहा जा सकता है कि बंगाल की राजनीति में हिंसा का घालमेल ममता बनर्जी के दौर में ही शुरू हुआ है। वामदलों की राजनीति भी इसी हिंसा से शुरू होकर इसी प्रकार की हिंसा पर खत्म हुई थी। वाम सरकार का अन्त भी हिंसा करने वालों का ह्दय परिवर्तन होने के कारण हुआ था। लगता है इसका एक बार और दिल बदल रहा है। ममता सरकार हिचकौले ले रही है और मतदाता दबाव और हिंसा की राजनीति के भंवर से निकलना चाह रहा है। उसके सामने विकल्प नहीं था और लोकसभा के चुनाव में यह विकल्प साफ दिखाई देने लगा और भाजपा के पक्ष में मतदाता हिंसा की प्रवाह किये बिना चला गया। लोकसभा चुनाव में तृणमूल और भाजपा में कोई बड अन्तर नहीं था। मध्यप्रदेश की सरकार की भांति ही महज पांच सीटों का अन्तर था। लेकिन असल जंग तो विधानसभा के चुनाव को लेकर है जहां ममता तीसरी बार के लिए और भाजपा इस लालकिले में सेंधमारी के लिए काम कर रहे हैं। लेकिन सत्ता के लिए हिंसा इतने पैमाने पर होगी इसकी संभावना से सभी बेचैन हो उठे हैं। तब ममता की राजनीति पर सवाल उठ रहा है?
बंगाल की राजनीति के बारे में आम धारणा है कि वहां वामदलों ने ऐसे राजनीतिक प्लेटफार्म तैयार कर दिया था जहां हिंसा से सत्ता का पाया जाता रहा था। जिस भी राजनीतिक दल ने हिंसा को अपने साथ मिला लिया वह सरकार में आ जायेगा। कांग्रेस ऐसा करने में कामयाब नहीं हो रही थी। ममता को लगा कि कांग्रेस में रह कर वह कभी भी वामपंथियों की सरकार को नहीं हटा पायेगी। इसलिए उसने तृणमूल कांग्रेस के नाम से अपनी राजनीतिक पार्टी बनाई और सत्ता के लिए संघर्ष खड़ा किया। वह समय भी आ गया जब वाम सरकार का पतन हुआ और ममता की सरकार काबीज हुई। जब वाम सरकार जा रही थी। सभी विरोधी दल जिसमें भाजपा भी शामिल थी काफी खुशी हो रही थी। तब किसी ने भी ममता की हिंसा की राजनीति का विरोध नहीं किया था। क्योंकि वह हिंसा अच्छी लग रही थी। तब किसी भी राजनीतिक दल ने यह नहीं सोचा था कि वाम दलों को लेकर जो परेशानी थी वही इस नई सरकार के साथ भी पैदा होने वाली है। अब वहां वाम दल कमजोर हैं। कांग्रेस की क्षमता देश भर में समाप्त हो रही है। भाजपा का देशव्यापी विस्तार हो रहा है। इसलिए ममता और भाजपा में वैसा ही द्वंद्व चल रहा है जैसा कभी वाम पार्टियों और तृणमूल में चलता था। तब जनाधार गुंडों के कारण ममता की तरफ चला गया। अब वह भाजपा की ओर आता हुआ दिखाई दे रहा है। कई बार लगता है यह गुंडों के बंटवारे का दौर चल रहा है। लेकिन बंगाल की राजनीति में एक बड़ा बदलाव यह आ रहा है कि मतदाता दबाव से बाहर आ रहा है।
पंचायत चुनाव के वक्त जिस प्रकार की हिंसा देखने में आई थी उससे लोकतंत्र के पक्ष में काम करने वाली संस्थाएं बेचैन हो उठी थीं। खुद सर्वोच्च न्यायालय भी चुनाव में बीच में आ गया था और नामांकन पत्र रूबरू भरने का प्रावधान पहली बार समाप्त कर दिया गया था। यहीं से भाजपा के मन में सपना पलने लगा कि वह बंगाल की सरकार का संचालन कर सकती है। यहां दोहरी राजनीति हुई। पहली संघ के माध्यम से जनता के बीच जाने की और दूसरी संघर्ष के लिए संघर्ष की भाषा में जवाब देने की। इसमें हिंसा कितनी शामिल होगी इसकी जानकारी नहीं है। कैलाश विजयवर्गीय का चयन भी इसी आधार पर हुआ होगा। क्योंकि वे वही करते हैं जो दबाव रहित होता है। इसलिए मिशन बंगाल भाजपा के पहले सफे पर आ गया। पूर्वोत्तर में भाजपा की स्वीकार्यता का उसे बड़ा सहारा मिला। भाजपा के पक्ष में दो और मुख्य कारण गये। पहला हिन्दूत्व की भावना मतलब देश की अपनी भावना। दूसरा विकास के लिए पक्षपात रहित व्यवस्था। पिछले पांच साल की मोदी सरकार ने बिना धार्मिक भेदभाव के काम करके यह सिद्ध कर दिया है कि वे चाहे भारतीय संस्कृति के साथ देश को आगे लेकर जाने का विचार रखते हों लेकिन भारतीय संस्कृति का मतलब ही सभी का साथ लेकर बनता है। जहां भाजपा की प्रदेश सरकारें रही हैं वहां एक भी उदाहरण विरोधी नहीं ला पाये कि भेदभाव हुआ है। इसलिए जिन आरोपों के दम पर विरोधी मुस्लिम मतदाताओं को अपने पक्ष में करते थे वह आधार कमजोर हो चला था। इस चुनाव में साफ दिखाई दिया है कि मुस्लिम मतदाताओं ने भाजपा को स्वीकारा भी है यदि कहीं नहीं स्वीकारा है तब उसका विरोध नहीं किया।
ऐसे में ममता बनर्जी की सरकार को गंभीर खतरा हो चला। हिन्दू मतदाताओं के मन में ममता के काम करने के प्रति आशंका पनपी है। दूर्गा पूजा के समय जो व्यवहार राज्य सरकार का होता है उससे यह भाव ताकतवर हुआ। मोहरम और दूर्गा पूजा में भेदभापव ने ममता के खिलाफ भावनाओं को तैयार किया। उसे सहारा मिलते ही वह आग बनता चला गया। लोकसभा चुनाव में भारी हिंसा के बाद भी वह दिखाई दिया। राजनीति में हिंसा की स्थिति उन्हीं राज्यों में अधिक है जहां वाम दलों की सरकारें रही हैं। लेकिन त्रिपुरा में जिस सहज भाव से सरकार का बदलाव हुआ है वह इस प्रकार के उदाहरणों से अलग है। माणक सरकार के सरल और ईमानदार नेता के रूप में विरोधी भी मानते रहे हैं। लेकिन जब मोदी और माणक सरकार में से एक चुनने का मौका आया तब सरकार पीछे रह गये और मोदी आगे निकल गये। देश एक बार फिर मोदी के सरकार चलाने के फार्मूले को स्वीकार करना चाह रहा है। सरकार चलाने की पारदर्शिता, विकास का स्पष्ट विजन, विदेश नीति का जोरदार क्रियान्वयन और साफ सुथरी ईमानदार छवि का प्रभाव देश पर पड़ रहा है। जिस हरियाणा में एक तत्कालीन मुख्यमंत्री भर्तियों में भ्रष्टाचार के कारण जेल में है उसी हरियाणा में भाजपा की सरकार ने बिना लेनदेन के भर्तियां करके ऐसा उदाहरण पेश किया जिस पर वहां के लोग भी अच्चंभा कर रहे हैं। मतलब ऐसी सरकार भाजपा दे रही है जिसमें योग्यता के आधार पर बोली लगाये बिना नौकरियां मिल रही हैं।
ऐसे में बंगाल की ममता सरकार को बने रहने का खतरा बन गया है। लोकसभा चुनाव में मतदाताओं के निर्णय ने यह बता दिया है कि तृणमूल सरकार के जाने के दिन आ गये हैं। वे कैसे बच सकती हैं यही वे हिंसा के माध्यम से खोज रही हैं। इस हिंसा की आलोचना सभी तरफ से हो रही है। जिन नेताओं को वाम दलों की सरकार को गिराने में हुई हिंसा ऐतराज नहीं था वे भी आज की हिंसा की आलोचना कर रहे हैं। देश ने सरकारों का बदलाव देखा है। महाराष्ट्र और असल में कांग्रेस की पन्द्रह साल की सरकार आसानी से बदल गई। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ कीसरकार भी इतनीी ही पुरानी थी लेकिन आज वहां कांग्रेस सरकार में आ गई। कुछ राज्य ऐसे थे जहां स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने पर कम जनाधार वाले नेता मुख्यमंत्री बन गये लेकिन हिंसा नहीं हुई। बंगाल ही ऐसा राज्य है जहां सत्ता का बदलाव हिंसा के सहारे होता रहा है। अच्छा एक बात और इसी के साथ समझने की जरूरत है। अपनी पारियों में ममता सरकार ने ऐसा कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं किया जिसकी चर्चा मतदाताओं में होती हो। ठीक वैसी ही स्थिति ममता की भी है जैसी केजरीवाल की है। दिन भर शोर करो और शाम को बिना परिणाम के घर चले जाओ। हर घटना का मोदी पर आरोप लेकिन मोदी के साथ काम का मुकाबला नहीं करना। यही हाल ममता दीदी का है। हिंसा से सरकार को रोकना चाहती है काम पर सरकार में आने की उनकी कोई रणनीति नहीं है। लोकसभा चुनाव में मीडिया ने जिस कदर गरीबी और भुखमरी बंगाल में दिखाई है और चंद सहायता के लिए मरने को तैयार होने वाले लोग दिखाये हैं यह गंभीर चिन्ता की बात है। तभी ममता की राजनीति पर सवाल उठ रहे हैं।
                                                       संवाद इंडिया

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