सत्ता की ‘ख्वाहिशों’ के सहारे एकता के ‘प्रयास’

भोपाल। पन्दह साल की सत्ता कोई छोटी घटना नहीं होती है। और जब एक व्यक्ति उसमें से 13 बरस 17 दिन तक मुख्यमंत्री रह लें तो वह अपने को आजीवन मुख्यमंत्री समझने लगता है। उसका आचरण बदल ही नहीं पाता है। इसमें यदि उसका संगठन खुद को सत्ता के साथ ही जोड़कर देखता है तब चोट ऐसी ही लगता है जैसी कमलनाथ ने दी है। अपने 108 विधायकों को जोड़े रखने का फार्मूला भाजपा के पास सत्ता की ख्वाहिश दिखा कर चलना था। भाजपा का नेतृत्व पहले दिन से ही यह नहीं मान रहा है कि जनता ने उसे जनादेश विपक्ष में बैठने का दिया है। अन्य विपक्षी दल और निर्दलीय विधायक भाजपा के साथ आने को राजी नहीं हैं। कई बार सवाल यह उठता है कि यदि भाजपा अपने विधायकों को ताकतवर विपक्ष की भूमिका के लिए तैयार करती और नेतृत्व सरकार बनाने के सपने देखता तो शायद अधिक कारगर होता। लेकिन खुद भी सरकार बनाने के सपने देखे और अपने विधायकों को बांधे रखने के लिए उन्हें सरकार में जल्द आने के सपने दिखाये गये। एक जमाने के दिग्गज संगठन मंत्री रहे मेघराज जैन ने सोशल मीडिया पर लिखा है कि शरद कोल कांग्रेसी परिवार से हैं। एक दिन पहले भाजपा में आये और अगले दिन टिकिट दे दिया गया। मतलब टिकिट बांटने में घोर लापरवाही और मनमाने निर्णय की ओर उनका संकेत है।
गोवा के दस विधायक भाजपा में आ गये। कर्नाटक में चलती सरकार को कांग्रेसी विधायकों ने खूंटे पर टांग दिया तब मध्यप्रदेश में हर वह नेता जो पद पर है या पद पर उसका नाम चला है मुख्यमंत्री बनने के सपने देखने लग गया। लेकिन मुख्यमंत्री बनने और मुख्यमंत्री बनने के लिए पार्टी को किस प्रकार से संभाला जाता है यह गुर शिवराज से कोई समझ ही नहीं पाया। तीन नाम पर चर्चा करता हूं। गोपाल भार्गव नेता प्रतिपक्ष तो बन नहीं पाये मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं। उन्हें क्यों नेता प्रतिपक्ष बनाया गया उन्हें याद रखकर कदम बढ़ाना चाहिए थे। नरोत्तम मिश्रा को न तो प्रदेश का अध्यक्ष बनने दिया गया न ही नेता प्रतिपक्ष तब उन्हें मुख्यमंत्री बनने के लिए क्या करना चाहिए यह वे भी भूल गये? प्रबंधन में दक्ष होने के कारण उनका नाम चला और अब प्रबंधन फेल हो जाने पर उनकी संभावना क्यों होगी? राकेश सिंह तो अपने को मुख्यमंत्री मान ही बैठे हैं। जिनसे न विधायक संभल रहे हैं और न ही संगठन। लेकिन सपने बड़े है। इसलिए शिवराज को दूर करने का जोखिम उठाने लग गये और विधायक दूर हो गये।
नम्बर वन और टू की थ्योरी अपनी जगह है लेकिन प्रदेश में यह थ्योरी अपनाई ही नहीं गई। मध्यप्रदेश में भाजपा शिवराज से शुरू होती रही है और शिवराज पर ही खत्म। इसलिए यदि सरकार बनाने का फार्मूला कहीं दिवास्वप्र में है भी, तब भी वह शिवराज के माध्यम से ही पूरा होगा। कर्नाटक में येदुरप्पा और गोवा में पर्रिकर को ही लेकर आना पड़ा था। कद छांटने की बजाये कद बढ़ाने पर मोदी-शाह काम करेंगे तो भाजपा खड़ी होगी नहीं तो प्रा.लि. ही बनी रहेगी। 'ऑनरÓ बदलने का प्रयास नहीं करना चाहिए। जनता की भावनाओं के साथ तालमेल शिवराज और मोदी का है। बाकी नेता तो जनता के पास जाना ही नहीं चाहते हैं। सत्ता के सपने दिखाकर अपना नहीं बनाया जा सकता है। देख लिया ना।

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