‘संस्कार’ के सागर में कहां हैं दिल्ली की ‘पब्लिक’?

भोपाल (सुरेश शर्मा)। कोरोना महामारी के दौर से हम सब निकल कर सामान्य जीवन की ओर लौट रहे हैं। सबको यह पता है कि जब भी इस प्रकार की स्थिति उत्पन्न हाती हैं सबसे अधिक मरण होती है मध्यम श्रेणी के लोगों की। सरकार की फहरिस्त में यह मध्यम वर्ग फिट ही नहीं हो पाता है। वह न तो मुफ्त का राशन ले पाता है और न ही कतार में लगकर राहत का रसपान ही कर पाता है। इसलिए बेचारा ऊपर की पांत में जाने की जद्दोजहद में लटका हुआ रहता है। और लटके हुए व्यक्ति या श्रेणी को कौन पूछता है? इन दिनों वह नये शिक्षण सत्र की मार से दो-चार कर रहा है। एक समय था कि हमारे गुरूकुल श्रद्धा के केन्द्र होते थे और गुरू को भगवान से बड़ा दर्जा दिया जाता था। लेकिन क्या करें गुरू शिक्षक हो गये और अब वे वेतन के लिए काम करने वाले कामगार हो गये। भोपाल में जिन सबसे बड़े स्कूलों को हम पहचानते हैं उनका रिजल्ट इतना खराब गया है कि उनकी रेंक की समीक्षा करना चाहिए। कारण यह कि बच्चों को आनलाइन शिक्षा दी गई और फीस बटोरने के चक्कर में परीक्षा आफलाइन ले ली। अब दोष नौनिहालों पर डाल कर उन्हें कोरोना से भी अधिक डिप्रेशन में डाला जा रहा है। शिक्षा से संस्कार जब गायब हो गये तब संस्कारों के लिए फिर चाहे सागर में गौता लगा लीजिए सबका रिजल्ट एक ही प्रकार का है। तब दिल्ली वाली पब्लिक भी ऐसे ही परिणाम देगी।

एक बार शिक्षा मंत्री महोदय से कहा था कि शिक्षण संस्थानों की फीस की विवेचना करवाईये। जिला शिक्षा अधिकारी कुछ तो काम कर लेंगे। खबरों की तलाश करने वालों को पता ही होगा कि पिछले तीन साल में फीस बढ़ गई और शिक्षकों का वेतन कम हो गया। कई संस्थानों ने न्यायालय को भी चूना लगा दिया। आदेश था कि केवल टयूशन फीस ही लेंगे तो कम्प्युटर फीस का विलय टयूशन फीस में कर दिया और अब जब सब सामान्य मानकर सभी प्रकार के शुल्कों के साथ शिक्षण शुरू हुआ है तब शिक्षा विभाग यह देखना भूल गया कि टयूशन फीस में की गई मिलावट सुधारी गई या नहीं? स्कूलों से इस सुधार की उम्मीद क्यों करना चाहिए? क्योंकि ये गुरूकुल नहीं ये तो शिक्षा का व्यवसाय कर रहे हैं। एक वार्षिक शुल्क होता है जिसे सम्मान के साथ एन्युवल फीस कहा जाता है। बाल आयोग के सदस्य बृजेश चौहान ने एक शिक्षण संस्थान से पूछा कि इस एन्युवल फीस में क्या-क्या होता जरा अलग-अगल करके बताईये तब उसका जवाब नहीं मिला केवल इतना कहा गया कि कार्ड, डायरी और मैग्जिन आदि। मतलब इनकी वूसली 15 हजार कुछ तो ज्यादा नहीं हुई?

ये संस्थन सरकारों को राहत फंड में एक मुश्त देते हैं और पार्टियों को चंदा। इसलिए यह सब वाया पालक की जेब से जाता है, यह कोई नहीं समझना चाहता। यदि सरकारें और दल इन पालकों ही सीधे साध लें तो वोट पक्के मान लीजिए। यदि इन पालकों ने यह जान लिया कि इनकी जेब पर वाया हाथ डालने वालों के बारे में वे वोट के दिन विचार करेंगे तब क्या होगा? इसलिए कोरोना की महामारी ने यदि पालकों और उपभोक्ताओं को भी प्रभावित किया है तब सरकार और खासकर शिक्षा विभाग को इस बारे में विचार करना होगा अन्यथा आक्रोश ने जन्म तो ले ही लिया है।

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