‘संस्करण’ नया करना धरना कुछ नहीं सहानुभूति ‘बटोरो’

भोपाल (सुरेश शर्मा)। जिस प्रकार से गिद्ध पशुओं के मरने की प्रतीक्षा करता रहता है। मांगने वाला दाता से उम्मीद लगाए होता है। पत्रकार टवीट पर दृष्टि गड़ाए बैठा होता है और राजनेता किसी प्रकार से भी हो सहानुभूति बटोरने की ताक लगाए होता है। लखीमपुर खीरी में आन्दोलनकारियों पर गाड़ी चढ़ी नहीं कि नेता वहां जाने को टूट पड़े। अखिलेश यादव को सरकार की संभावना दिखाई दे रही है। ऐसे सपने देखना कोई बुरी बात नहीं है। प्रियंका को पांव में जान आने की उम्मीद लगती है। इसलिए उन्होंने तो अपने मुख्यमंत्री और एक उप मुख्यमंत्री को भी सहारे के लिए बुला लिया। बसपा भी क्यों चुप बैठेंगी? आप पंजाब के बाद यूपी में एक दो विधायक की चाहत रखेगी ही। अब सरकार की चिंता यह है कि वह आन्दोलन को संभाले? हिंसा में मारे गयेे लोगों का आक्रोश शांत करे? या फिर इन नेताओं की सहानुभूति बटोरने वाली राजनीति से दो-दो हाथ करे। न जाने क्यों ऐसा होता है कि नेताओं ने राजनीति के सबसे सस्ते और सरल संस्करण को अपना लिया है। किसान भी देश का है। संसाधन भी देश के हैं। तब क्या यह जरूरी है कि आग में घी डाल कर ही वोटों की फसल पकाई जाए? लेकिन मोदी सरकार के बाद विपक्ष के पास राजनीति करने का कोई पुराना तरीका तो बचा नहीं है इसलिए सहानुभूति के लिए गिद्ध दृष्टि लगी रहती है।

राजस्थान में भी किसानों को ठोका गया है। लेकिन किसी ने सहानुभूति नहीं दिखाई? क्योंकि सहानुभूति पाने के लिए विपक्षी एकता वालों की सरकार नहीं, भाजपा की सरकार होना जरूरी है। बंगाल में लोग मारे-काटे जा रहे हैं कोई भी देखने नहीं जाता क्योंकि वहां ममता की सरकार है और वे मोदी विरोध का बड़ा चेहरा हैं। किसानों के आन्दोलन को लेकर सर्वोच्च न्यायालय रोज एक ऐसी टिप्पणी कर रहा है जो आन्दोलन की जरूरत पर सवाल उठा रहा है। ऐसे में सहानुभूति की राजनीति करने वालों को कोई फर्क कहां पडऩे वाला है? यह सच है कि किसान आन्दोलन को समाप्त करने के लिए सभी स्तंभों को योगदान देना चाहिए। विधायिका पर सवाल है कि उनके कानूनों को चुनौती दी जा रही है। उसे किसानों को कानूनों की उपयोगिता के बारे में समझाना चाहिए। वे न माने यह उनकी समस्या है। ब्यूरोक्रेसी को अपनी दक्षता के साथ किसानों को आन्दोलन न करने के लिए प्रेरित करना चाहिए क्योंकि प्रशासकीय प्रबंधन उनकी जिम्मेदारी है। न्यायपालिका ने अपनी भूमिका खूब निभाई है। पहले कानून पर रोक लगाई, बाद में आन्दोलन के औचित्य पर सवाल उठा कर उन्हें समझाया जा रहा है।

अब बारी रहती है मीडिया की। मीडिया किसान आन्दोलन में सहयोगी है? विरोधी है? या फिर बंटा हुआ है कोई एक अनुमान लगाना कठिन है। मीडिया जनमानस को तैयार करता है। हिंसा होने से रोकने की क्षमता मीडिया में ही है क्योंकि बाकी स्तंभ बाद में काम शुरू करते हैं मीडिया पहले। इसलिए मीडिया को अपनी भूमिका को समझना होगा। टवीट की बाट देखने की बजाए मीडिया आन्दोलनों को कवर करने के मामले में कोई सर्वमान्य नीति पर विचार करे। जनहित और जनसरोकार उसकी प्राथमिकता में होना चाहिए। लेकिन वह तो नेताओं को सहारा देने का काम कर रहा है फिर वह सरकार ही क्यों न हो?

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