‘श्मशान’ रिपोर्टर की आज से संदर्भित ‘पत्रकारिता’

भोपाल (सुरेश शर्मा)। वह दिन याद है जब देश के एक बड़े पत्रकार ने कोरोना की शुरूआत में अपने आलेख में लिखा था कि कोरोना चिन्ता की बात है लेकिन हमें इस बात का गर्व है कि हम ऐसे कालखंड के पत्रकार हैं जिन्होंने महामारी को कवर किया होगा। सोचने पर बात प्रभावशाली लगती है। हम अनेकों प्रकार के समाचार और घटनाक्रमों के साक्षी बनते रहे हैं लेकिन किसी वैश्विक महामारी के साक्षी होकर अपनी बात लिखेंगे यह उससे भी अधिक गौरव की बात है। यह दुखद है कि इन दिनों मौतों का सिलसिला चल रहा है लेकिन पत्रकारिता के लिए यह एक ऐसा कालखंड है जिसमें भागीदारी इतिहास का हिस्सा बन रही है। यह एक पक्ष है जिस पर कभी विस्तार से लिखा जायेगा। लेकिन इस इतिहास को हमने किस दिशा और स्तर तक ला दिया यह अपने आप में एक वर्तांत से कम नहीं है। एक नेता से बात हो रही थी। नेता तो नेता होता है समझता सब है लेकिन बोलता जरूरत के हिसाब से ही है। उसने कहा सरकार कौन सा मुआवजा दे रही है कि लाशों की संख्या में हेराफेरी करेगी? यह तो हो सकता है कि संख्या कम ज्यादा हो लेकिन दहशत कम करने के लिए भी तो ऐसा प्रशासन कर सकता है। इसलिए पत्रकारिता को सामाजिक सरोकार के बारे में अधिक ध्यान देना चाहिए। इस महामारी में मौतों के लाइव प्रसारण का औचित्य कौन समझायेगा?

मान लिया सरकार लाशें कम बता रही है? मान लिया प्रशासन प्रबंधन के मामले में विफल भी हो रहा है? और यह भी मान लिया कि इस महामारी में शासन और प्रशासन प्रबंधन का अनुमान लगाने में फेल हो गया? तब क्या पत्रकारिता को सामाजि सरोकार से मूंह मोड़ लेना चाहिए? कुछ पत्रकार यह मान कर चल रहे हैं कि सच दिखाना उनका कत्र्तव्य है। तब ताज होटल के आतंकी हमले के बाद मीडिया और खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया को शर्मसार क्यों होना पड़ा था? जब अमेरिका में लादेन ने आतंकी हमला किया था तब वहां के मीडिया का नैतिक कत्र्तव्य यह नहीं था कि वे कितने लोग मरे और कितने का नुकशान हुआ इसकी जानकारी विश्व के सामने लाकर अपने को खोजी पत्रकार सिद्ध करते? लेकिन ऐसा नहीं हुआ? सच यह है कि भारतीय मीडिया जनसरोकार से परे होकर आलोचनाओं को खबरों की उपलब्धि मान बैठा है। पदों पर बैठे नेताओं के साथ फोटो सेशन करके अपना मान घटा रहा है। इसीलिए इस महामारी के दौर में अखबरों और चैनलों ने श्मशान संवाददाता तक नियुक्त कर दिये हैं।

चैनलों की प्रमुख खबरों में जलती चितायें। प्रतिदिन कोविड प्रोटोकाल और सामान्य मौतों के आकंड़े जारी किये जा रहे हैं? यदि पूछा जाये तो श्माशान संवाददाता मृतक का नाम बताने का दंभ भी भर सकते हैं। इस महामारी के दौर में हम जिस गौरव से रिपोटिंग करने की कल्पना कर रहे थे क्या वह यही है? अधिकांश पत्रकारों को यह तो लगता है कि शासन-प्रशासन के कान ऐंठने के धर्म से पीछे नहीं हटा जाये लेकिन जन सरोकार को तिलांजलि देकर पत्रकारिता की फहरिस्त में श्मशान रिपोर्ट का नया ओहदा ही बना दिया जाये यह तो उचित कदम नहीं कहा जा सकता है। क्या हम महामारी की इस पत्रकारिता की कल्पना कर रहे थे?

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