‘शिवसेना’ को सत्ता का सौदा पड़ रहा है ‘महंगा’

भोपाल। नागरिकता संशोधन कानून का विरोध करना चाहिए या समर्थन? यह शिवसेना के गले में उलझ रहा है। समर्थन करती है तो सरकार का खतरा और विरोध करती है तो विश्वास खत्म होने का खतरा। कोई भी रास्ता निकालती है तब उससे उसकी साख में गिरावट आती जा रही है। उद्धव ठाकरे का मुख्यमंत्री बनना तो भा रहा है लेकिन उनके बयानों से शिवसेना की  की सांसे कम होती जा रही हैं। देश में शिवसेना को लोग चाहते क्यों थे? उसकी प्रखर हिन्दूवादी छवि और अपनी बात को दमदारी से कहना ही शिवसेना की ताकत थी। जो बात वह बयान से नहीं कहती थी वह उसके मुखपत्र सामना में कह दी जाती थी। उद्धव ठाकरे ने मोदी सरकार का समर्थन भी किया लेकिन सामना ने उनकी आलोचना करने में भी कोई कोताही नहीं बरती। इससे भी खास बात यह थी कि मोदी-शाह और भाजपा ने कभी इसको लेकर नाराजगी भी नहीं जताई। यदि अन्दरखाने में जताई भी होगी तो वह इसलिए प्रमाणित नहीं हो पाया क्योंकि यह सिलसिला लगातार जारी रहा। लेकिन अब जब उद्धव ठाकरे ने सत्ता के लिए नीतियों का सौदा किया है तब से न तो बयान आ रहे हैं और न ही सामना की गर्जना सुनाई दे रही है। यह सौदा शिवसेना के लिए काफी महंगा सिद्ध होने वाला है। यदि उद्धव नागरिकता कानून के विरोध पर पुलिस कार्यवाही की तुलना जलियां वाले बाग की घटना ने करते हैं कोई क्या समझेगा?
जलियां वाला बाग कांड हमारे इतिहास का बदनूमा दाग है। यहां जनरल डायर ने निहत्थे भारतीयों को भून दिया था। आज का आन्दोलन उस नागरिकता कानून के विरोध में है जिसमें तीन देशों के अल्पसंख्यकों को नागरिकता देता है किसी भी धर्म के मानने वाले भारतीय की नागरिकता को छीनता नहीं है। आज आन्दोलनकारी हिंसक हो रहे हैं और बसों को आग लगा रहे हैं सरकारी संपत्ति को नुकशान पहुंचा रहे हैं तब निहत्थे थे और शान्त थे। आज एक समुदाय विशेष के लोग यह दिखाने का प्रयास कर रहे हैं कि वे ताकतवर हो गये हैं और देश का बंटवारा तक करा सकते हैं। जलियांवाला बाग में सभी समुदायों के लोग थे और देश की एकता के पक्षधर थे। इसलिए उद्धव ठाकरे के बयान को उनकी मूल विचारधारा से भटके हुये सत्ता लोभी नेता के रूप में देखी जा रही है। शिवसेना ने सत्ता के लिए कदम दर कदम गिरावट की स्थिति ही पैदा की है। वह मुख्यमंत्री बनने के लिए गिरती ही चली गई। यह उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री बनाने का प्रस्ताव भाजपा को दिया गया होता वह उसे सहर्ष स्वीकारती ऐसा माना जा सकता है।
ठाकरे परिवार के साथस अब पूर्व मुख्यमंत्री का तगमा जुड़ तो गया लेकिन खोया तिना है इसका अनुमान लगाना स्वभाविक है। देश में शिवसेना की साख चली गई। राजग के सहयोगियों का साथ न मिलना भी बता रहा है कि उसका विश्वास घटा है। जिन नेताओं की छाया में जाना कभी बाला साहब ठाकरे ने स्वीकार नहीं किया उनका नेतृत्व उनका पुत्र स्वीकार कर रहा है इसलिए यह कहा जाने लग गया है कि शिवसेना के लिए सत्ता का सौदा कुछ ज्यादा ही महंगा सिद्ध होने वाला है। हां एक बात जरूर है कि उद्धव जी मुख्यमंत्री के रूप में कुछ ऐसा कर जाते हैं जो अद्वितीय हो तो बात अलग होगी।

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